
देश में पोषण सुरक्षा को मजबूत बनाने के उद्देश्य से विकसित की गई रंगीन आलू की किस्में अब किसानों और उपभोक्ताओं के बीच तेजी से लोकप्रिय हो रही हैं. भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान (ICAR-CPRI) द्वारा विकसित बैंगनी और लाल रंग के विशेष आलू न केवल आकर्षक दिखते हैं, बल्कि इनमें सामान्य आलू की तुलना में कई महत्वपूर्ण पोषक तत्व भी अधिक मात्रा में पाए जाते हैं.
इन्हीं किस्मों में सबसे चर्चित नाम कुफरी जामुनिया का है, जिसे वर्ष 2024 में आधिकारिक रूप से जारी किया गया. यह बायोफोर्टिफाइड किस्म अपने बैंगनी गूदे, उच्च एंटीऑक्सीडेंट क्षमता और बेहतर पोषण क्वालिटी के कारण खास पहचान बना रही है.
ICAR-CPRI ने अब तक कई पोषक तत्वों से समृद्ध रंगीन आलू की किस्में विकसित की हैं.
कुफरी नीलकंठ को वर्ष 2018 में जारी किया गया था. यह संस्थान की पहली विशेष बैंगनी छिलके वाली आलू की किस्म थी. पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, बिहार, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में इसकी खेती की सिफारिश की गई है. यह किस्म अपने उच्च एंटीऑक्सीडेंट गुणों के लिए जानी जाती है.
इसके बाद वर्ष 2021 में कुफरी माणिक को जारी किया गया. यह गहरे लाल रंग के आकर्षक कंद पैदा करती है. इसके कंद गोल आकार के होते हैं और इनमें एंथोसायनिन, जिंक और आयरन की उच्च मात्रा पाई जाती है.
वहीं, कुफरी जामुनिया इन दोनों किस्मों से एक कदम आगे मानी जा रही है. इसमें एस्कॉर्बिक एसिड (विटामिन-सी), एंथोसायनिन और कैरोटीनॉयड का स्तर अधिक पाया गया है. साथ ही इसमें जिंक और आयरन की मात्रा भी ज्यादा है, जो इसे पोषण के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण बनाती है.
कुफरी जामुनिया एक मध्यम अवधि में तैयार होने वाली आलू की किस्म है. इसके पौधे मध्यम ऊंचाई वाले होते हैं और खेत में अर्ध-सघन चंदवा (कैनोपी) विकसित करते हैं. इसके कंद बाहर से गहरे बैंगनी रंग के और अंदर से भी बैंगनी गूदे वाले होते हैं.
कंद आकार में आयताकार, उथली आंखों वाले और भुरभुरी बनावट वाले होते हैं. प्रत्येक पौधे में औसतन 10 से 12 मध्यम या बड़े आकार के आलू विकसित होते हैं. इसका अनोखा रंग इसे सामान्य आलू से अलग पहचान देता है और अलग-अलग खाद्य उत्पादों और व्यंजनों में इसके उपयोग की संभावनाएं बढ़ाता है.
कुफरी जामुनिया केवल पोषण के मामले में ही नहीं, बल्कि उत्पादन क्षमता के लिहाज से भी किसानों के लिए लाभकारी साबित हो सकती है.
अनुशंसित कृषि तकनीकों के साथ इसकी औसत उपज 32 से 35 टन प्रति हेक्टेयर तक हासिल की जा सकती है. वहीं, 90 दिन की अवधि वाले परीक्षणों में इसकी उपज लगभग 49 टन प्रति हेक्टेयर तक दर्ज की गई.
इस किस्म की एक और बड़ी विशेषता यह है कि कुल उत्पादन का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा खरीद-बिक्री की श्रेणी में आता है. इसके अलावा इसमें 6 से 8 सप्ताह की मध्यम सुप्तावस्था (डोरमेंसी) होती है, जिससे कंद जल्दी अंकुरित नहीं होते और भंडारण के दौरान क्वालिटी बनी रहती है.
कम सड़न और न्यूनतम वजन हानि के कारण इसकी स्टोरेज क्षमता भी बेहतर मानी जाती है, जिससे किसानों को लंबे समय तक भंडारण और बेहतर बाजार मूल्य मिलने की संभावना रहती है.
अलग-अलग कृषि-जलवायु परिस्थितियों में किए गए परीक्षणों में कुफरी जामुनिया का प्रदर्शन संतोषजनक पाया गया है. इसके आधार पर इसे उत्तर भारतीय मैदानी क्षेत्रों में खेती के लिए अनुशंसित किया गया है.
यह किस्म विशेष रूप से उन राज्यों के लिए उपयुक्त मानी जाती है जहां बड़े पैमाने पर आलू की खेती होती है. उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, बिहार, उत्तराखंड और अन्य आलू उत्पादक क्षेत्रों में इसके विस्तार की अच्छी संभावनाएं देखी जा रही हैं.
विशेषज्ञों का मानना है कि बढ़ती स्वास्थ्य जागरुकता और पोषक तत्वों से भरपूर खाद्य पदार्थों की मांग के बीच कुफरी जामुनिया जैसी बायोफोर्टिफाइड किस्में आने वाले समय में किसानों की आय बढ़ाने के साथ-साथ देश की पोषण सुरक्षा को भी मजबूत कर सकती हैं.