
चीनी उद्योग और गन्ना किसानों के सामने एक नई चुनौती खड़ी हो गई है. सरकार के हालिया फैसले के बाद अब चीनी मिलें गन्ने के रस, गन्ना सिरप और शीरे से इथेनॉल बनाकर तेल कंपनियों को नहीं बेच सकेंगी. यह फैसला फिलहाल एक साल के लिए लागू किया गया है, लेकिन इसका असर लंबे समय तक देखने को मिल सकता है.
सरकार ने यह कदम देश में चीनी की उपलब्धता बनाए रखने और कीमतों को नियंत्रित करने के मकसद से उठाया है. हालांकि, किसान संगठनों और चीनी उद्योग से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि इससे मिलों की आय पर बड़ा असर पड़ेगा, जिसका सीधा प्रभाव गन्ना किसानों पर भी पड़ सकता है.
महाराष्ट्र के किसान नेता राजू शेट्टी ने 'किसान तक' से बातचीत में कहा कि केवल इस एक फैसले से महाराष्ट्र की चीनी मिलों को करीब 7,000 करोड़ रुपये का नुकसान होने का अनुमान है. उनका कहना है कि मिलें पहले से कई आर्थिक चुनौतियों का सामना कर रही थीं और अब इथेनॉल खरीद बंद होने से उनकी स्थिति और कमजोर होगी.
शेट्टी के अनुसार, जब चीनी मिलों की आय घटेगी तो किसानों को गन्ने का भुगतान समय पर करना भी मुश्किल हो सकता है. इससे किसानों की आर्थिक स्थिति पर दबाव बढ़ेगा और भविष्य में कई किसान गन्ने की खेती से दूरी बना सकते हैं.
राजू शेट्टी ने बताया कि देशभर की चीनी मिलों ने सरकार की इथेनॉल ब्लेंडिंग नीति को देखते हुए इथेनॉल उत्पादन क्षमता बढ़ाने में लगभग 35,000 करोड़ रुपये का निवेश किया है. इसके लिए कई मिलों ने बैंकों और वित्तीय संस्थाओं से बड़े पैमाने पर कर्ज लिया है.
मिलों का मानना है कि सरकार ने इथेनॉल खरीद की गारंटी दी थी, जिसके आधार पर उद्योग ने निवेश किया. अब यदि गन्ने से बने इथेनॉल की खरीद बंद रहती है तो मिलों को कर्ज और ब्याज चुकाने में दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है.
हाल ही में सरकारी तेल कंपनियों ने करीब 11 अरब लीटर इथेनॉल खरीदने के लिए नया टेंडर जारी किया है. किसान संगठनों का आरोप है कि इस टेंडर में गन्ने से बनने वाले इथेनॉल का कोई जिक्र नहीं किया गया है. इससे यह संकेत मिल रहा है कि आगामी एक साल तक गन्ना आधारित इथेनॉल की खरीद नहीं होगी.
इस फैसले से महाराष्ट्र और कर्नाटक के गन्ना उत्पादक किसानों और चीनी मिलों में नाराजगी बढ़ गई है. कई किसान संगठनों ने इसे उद्योग और किसानों दोनों के लिए नुकसानदायक बताया है.
महाराष्ट्र और कर्नाटक में किसान संगठन गन्ने के बेहतर दाम और इथेनॉल की कीमत बढ़ाने की मांग को लेकर आंदोलन कर रहे हैं. किसानों की मांग है कि गन्ने का पहला भुगतान 5,000 रुपये प्रति टन किया जाए. इसके अलावा चीनी का न्यूनतम बिक्री मूल्य 31 रुपये प्रति किलो से बढ़ाकर 50 रुपये प्रति किलो किया जाए.
किसान इथेनॉल का खरीद मूल्य बढ़ाकर 70 रुपये प्रति लीटर करने की भी मांग कर रहे हैं. वहीं, तमिलनाडु की तरह गन्ना किसानों को प्रति टन 500 रुपये की अतिरिक्त सहायता देने की मांग भी उठ रही है.
इस वर्ष 2026-27 का गन्ना पेराई सीजन सामान्य समय से पहले शुरू कर दिया गया है. आमतौर पर 1 नवंबर से शुरू होने वाला पेराई सत्र इस बार 15 अक्टूबर से ही शुरू हो गया. किसानों का कहना है कि जल्दी पेराई शुरू होने से चीनी रिकवरी कम हो सकती है, जिससे मिलों और किसानों दोनों को नुकसान होगा.
इसके अलावा, कई इलाकों में कम बारिश और सूखे जैसी स्थिति के कारण गन्ने की फसल प्रभावित हुई है. किसानों का कहना है कि उत्पादन लागत बढ़ रही है, जबकि आय घटने का खतरा लगातार बढ़ता जा रहा है.
गन्ना उत्पादक किसानों ने कई जगहों पर रास्ता रोको आंदोलन शुरू कर दिया है. महाराष्ट्र के प्रमुख गन्ना उत्पादक क्षेत्रों में किसानों ने हाईवे जाम कर सरकार के खिलाफ प्रदर्शन किया है.
किसानों ने चेतावनी दी है कि यदि उनकी मांगों पर जल्द फैसला नहीं लिया गया तो वे चीनी मिलों का संचालन बंद कराने तक का आंदोलन कर सकते हैं. उनका कहना है कि जरूरत पड़ने पर चीनी की सप्लाई रोकने जैसे कदम भी उठाए जाएंगे.
हालांकि केंद्रीय मंत्री प्रहलाद जोशी ने किसानों को भरोसा दिलाया है कि उनकी मांगों और चिंताओं पर सरकार गंभीरता से विचार करेगी और जल्द समाधान निकालने का प्रयास किया जाएगा.