Ground Report: गेहूं की सरकारी खरीद में देरी का असर, किसी को 75 हजार का नुकसान तो कोई कर्ज से परेशान

Ground Report: गेहूं की सरकारी खरीद में देरी का असर, किसी को 75 हजार का नुकसान तो कोई कर्ज से परेशान

मध्य प्रदेश में गेहूं की सरकारी खरीद में देरी ने किसानों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं. समर्थन मूल्य का इंतजार करते-करते किसान कम दाम पर फसल बेचने को मजबूर हो रहे हैं, जिससे उन्हें भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है.

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रवीश पाल सिंह
  • Bhopal,
  • Apr 07, 2026,
  • Updated Apr 07, 2026, 6:19 PM IST

मध्य प्रदेश में इस बार रबी सीजन में गेहूं की फसल अच्छी हुई है, लेकिन सरकारी खरीद शुरू न होने से किसानों में काफी नाराजगी है. खेतों में गेहूं के सुनहरे दाने लहलहा रहे थे, लेकिन इन दानों की चमक किसानों के चेहरों तक नहीं पहुंच पाई. इसका कारण है- सरकारी समर्थन मूल्य पर खरीदी की तारीखों का बार-बार टलना. ईरान युद्ध के बाद बारदानों की कमी का हवाला देते हुए सरकार ने खरीदी की तारीख तीन बार आगे बढ़ाई. नतीजा यह हुआ कि खेत से मंडी तक पहुंचे किसान समर्थन मूल्य का इंतजार करते-करते थक गए और औने-पौने दाम पर अपनी मेहनत बेचने को मजबूर हो गए. किसानों की इसी मजबूरी को करीब से देखने आज तक ने मध्यप्रदेश के 3 अलग-अलग जिलों में किसानों से बात की…

भोपाल की करोद मंडी में ऐसा था माहौल

सबसे पहले हमारी टीम भोपाल स्थित‍ कृषि उपज मंडी, करोद पहुंची. सुबह के नौ बजे मंडी में ट्रैक्टर-ट्रॉलियों की लंबी कतार लगी हुई थी. कई किसान ट्रॉली पर तिरपाल डालकर गेहूं ढकने की कोशिश कर रहे थे, क्योंकि बीते दिनों की बेमौसम बारिश और आंधी ने पहले ही फसल की क्वालिटी पर असर डाला था. मंडी परिसर में बैठे किसान एक ही बात दोहरा रहे थे “कब तक इंतजार करें?”. 

2100-22 रुपये क्विंटल बेचना पड़ा गेहूं

किसान सतीश पाल अपनी ट्रॉली के पास खड़े मिले, जिनके चेहरे पर थकान भी. उन्होंने कहा, “हमने 2640 रुपये प्रति क्विंटल के हिसाब से बेचने की तैयारी की थी. सोसायटी का कर्ज चुकाना है, खाद-बीज का उधार देना है. लेकिन घर में रखे-रखे गेहूं खराब हो रहा था. मजबूरी में 2100-2200 में बेचना पड़ रहा है”. 

मजदूरों की देनदारी का भी दबाव

सतीश की बात अधूरी ही थी कि पास खड़े दीपक दास बैरागी बोल पड़े, “सरकार तारीख पर तारीख दे रही है. पहले 16 मार्च कहा, फिर 1 अप्रैल, फिर 10 अप्रैल. हमें मजदूरों का पैसा देना है. ब्याज रोज बढ़ रहा है. हम इंतजार करें तो कैसे?” मंडी में बैठे-बैठे किसान बताते हैं कि कैसे हर एकड़ पर उन्हें गेहूं उगाने पर जो लागत आ रही है उसका आधा दाम भी उन्हें गेहूं बेचने पर नहीं मिल रहा है. 

मंदसौर में 2000 रुपये क्विंटल बिका गेहूं

वहीं, भोपाल से करीब 300 किलोमीटर दूर, मध्य प्रदेश-राजस्थान सीमा पर स्थित मंदसौर की मंडी में भी तस्वीर अलग नहीं है. यहां किसान मोहनलाल गुप्ता से मुलाकात हुई. उनके हाथ में बिक्री की पर्ची थी. उस पर साफ लिखा था 2000 और 2160 रुपये प्रति क्विंटल. 

किसानों को 75 हजार का घाटा

उन्होंने कहा, “समर्थन मूल्य 2640 है, लेकिन हमें 2160 में बेचना पड़ा. मजदूरों का भुगतान करना है, सोसायटी भरनी है. सरकार अच्छी है, लेकिन समय पर खरीदी चालू कर देती तो हम संतुष्ट हो जाते”. मोहनलाल की आंखों में नाराजगी से ज्यादा थकान थी. उन्होंने हिसाब लगाकर बताया “मेरे पास 150 क्विंटल गेहूं था. अगर 500 रुपये प्रति क्विंटल कम मिले, तो करीब 75 हजार रुपये का घाटा हुआ. इतना नुकसान हम जैसे छोटे किसान कैसे सहें?” 

मंदसौर मंडी में खड़े फूलचंद राठौर की मजबूरी और निजी थी. उन्होंने कहा, “घर में पोते की शादी है. पहले कहा मार्च में खरीदी होगी, फिर अप्रैल बताया. शादी टाल नहीं सकते. मंडी में भाड़ा भी लगता है, खर्च भी होता है. पैसे चाहिए थे, इसलिए बेच दिया.” 

गेहूं किसानों के सामने ये चिंताए

किसानों की यह मजबूरी सिर्फ आर्थिक नहीं, मानसिक भी है. गेहूं को घर में लंबे समय तक रखने का जोखिम है. बारिश, नमी, चूहे और खराब होती क्वालिटी किसानों के लिए बड़ी चिंता है. कई किसानों ने बताया कि वे हर दिन अनाज की बोरियां पलटते हैं, ताकि नमी न लगे. लेकिन कब तक? मंडी में एक बुजुर्ग किसान ने कहा, “बेटा, हम लड़ना नहीं चाहते. हमें बस समय पर खरीदी चाहिए.” उनकी आवाज में शिकायत कम, बेबसी ज्यादा थी.

इस तरह टलती रही सरकारी खरीद

आंकड़ों पर नजर डालें तो इस साल समर्थन मूल्य 2640 रुपये प्रति क्विंटल तय हुआ. खरीदी की शुरुआत पहले 16 मार्च से होनी थी. फिर इसे 1 अप्रैल किया गया. उसके बाद 10 अप्रैल से शुरू करने का आदेश आया. बारदानों की कमी के चलते तारीखें आगे बढ़ती रहीं. सरकार का तर्क है कि अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों, खासकर ईरान युद्ध के कारण सप्लाई चेन प्रभावित हुई है. लेकिन किसानों का सवाल है क्या वैश्विक संकट का पूरा बोझ वे ही उठाएं? 

शादी, फीस और खर्चों पर असर

मंदसौर मंडी के बाद हमारी टीम नें सीहोर का रुख किया. यहां गांवों में जाकर देखा तो कई घरों के आंगन में गेहूं की बोरियां करीने से रखी थीं. महिलाएं चिंतित थीं कि शादी-ब्याह, बच्चों की फीस और रोजमर्रा के खर्च कैसे निकलेंगे. एक किसान की पत्नी ने कहा, “जब गेहूं बिकेगा तभी घर चलेगा. अभी तो उधार में सब चल रहा है”.

मध्य प्रदेश देश के प्रमुख गेहूं उत्पादक राज्यों में है. यहां की मंडियों में हर साल लाखों टन गेहूं समर्थन मूल्य पर खरीदा जाता है. लेकिन, इस बार देरी ने किसानों की नकदी प्रवाह की पूरी गणित बिगाड़ दी है. बैंक का ब्याज, सोसायटी का कर्ज, साहूकार का उधार सबका दबाव एक साथ है. 

खेत से मंडी तक की इस यात्रा में यह साफ दिखाई दिया कि किसान नाराज जरूर है, लेकिन उन्‍हें सरकारी खरीद शुरू होने का अब भी इंतजार है. वे उम्मीद लगाए बैठे हैं कि शायद जल्‍द खरीदी शुरू हो जाए, शायद अगली ट्रॉली में उसे समर्थन मूल्य मिल जाए. लेकिन, जब तक ऐसा नहीं होता, तब तक हर दिन की देरी उसके लिए सीधे घाटे में बदल रही है. हर क्विंटल पर 400-600 रुपये का नुकसान सिर्फ आंकड़ा नहीं, उसके बच्चों की पढ़ाई, बेटी की शादी और परिवार के भविष्य से जुड़ा सवाल है.

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