
रंग ऐसा कि देखने वाले का मन खुश हो जाए, लेकिन इन्हीं फूलों को उगाने वाले किसानों की आंखों में आज गहरी मायूसी है. जिस गेंदा और गुलाब की खेती से अच्छी आमदनी की उम्मीद थी, वही अब आगर-मालवा के किसानों के लिए घाटे का सौदा बन गई है. जिले में फूलों की बंपर पैदावार हुई है, लेकिन बाजार में कमजोर मांग ने किसानों की कमर तोड़ दी है.
विशेषज्ञों और किसानों के मुताबिक, इस बार तापमान बढ़ने के कारण फूल समय से समय से पहले खिल गए. दूसरी तरफ, मंडियों में आवक अचानक बहुत बढ़ गई. आगर-मालवा जिले में करीब दो से तीन हजार बीघा जमीन पर गेंदा फूलों की खेती की गई है, और थोक मंडियों में रोजाना करीब 10 टन फूल पहुंच रहे हैं. लेकिन बड़े शहरों की मंडियों में उस अनुपात में खरीदारों की मांग नहीं बढ़ी, जिसके चलते गेंदा के भाव औंधे मुंह गिरकर 1 से 2 रुपये प्रति किलो पर सिमट गए.
किसान रूपनारायण माली ने करीब दो बीघा जमीन पर गेंदा फूल की उन्नत किस्म की खेती की थी. महंगे बीज और पौधे खरीदने से लेकर खेत तैयार करने, रोपाई करने, खाद डालने और सिंचाई करने तक उन्होंने भारी निवेश किया था. उन्हें पूरी उम्मीद थी कि इस सीजन में फसल बेचने से घर की आर्थिक स्थिति मजबूत होगी. लेकिन जब फसल कटाई और बेचने का वक्त आया, तो बाजार में कीमतें इतनी गिर गईं कि उनके सामने यह गंभीर सवाल खड़ा हो गया कि आखिर वे अपनी लागत कैसे निकालेंगे?
किसानों की परेशानी सिर्फ कम भाव मिलने तक सीमित नहीं है, बल्कि व्यावहारिक परेशानियां इससे कहीं ज्यादा बड़ी हैं. फूलों को खेत से सुरक्षित तोड़ने के लिए मजदूर लगाने पड़ते हैं, फिर उन्हें इकट्ठा कर पोटलियों या बोरियों में भरना होता है और मंडी तक पहुंचाना पड़ता है.
इस पूरी प्रक्रिया में समय और पैसा दोनों खर्च होते हैं. स्थिति यह है कि जब करीब 10 किलो फूल बेचने पर महज 30 से 40 रुपये मिलते हैं, तो यह सौदा पूरी तरह घाटे का साबित होता है. कई मामलों में मंडी तक पहुंचने वाले पेट्रोल या परिवहन (गाड़ी का भाड़ा) का खर्च बिक्री से मिलने वाली कुल रकम से भी ज्यादा बैठता है.
सबसे दर्दनाक तस्वीरें उन खेतों में दिखाई दे रही हैं, जहां गेंदा के फूल पूरी तरह तैयार खड़े हैं लेकिन उन्हें खरीदने वाला कोई नहीं है. जिन फूलों को चुन-चुनकर तोड़ने के लिए कभी मजदूर लगाए जाते थे, आज उन्हें खेतों से हटाना भी किसानों के लिए भारी पड़ रहा है.
मजबूरी में कई किसानों ने फूलों की तुड़ाई रोक दी है, तो कुछ किसान अपने ही हाथों से तैयार फसल को खेतों में छोड़ने या सड़कों पर क्विंटल के हिसाब से फेंकने को मजबूर हैं. यह नुकसान सिर्फ एक फसल का नहीं, बल्कि बीज से लेकर सिंचाई और मजदूरी तक लगाई गई उस पूरी पूंजी का है, जिसे किसान ने अपनी उम्मीदों के साथ बोया था.
आगर-मालवा के किसान अब सरकार और प्रशासन से मदद की गुहार लगा रहे हैं. एक बीघा खेती पर औसतन 25 हजार रुपये खर्च करने वाला किसान आज अपनी मूल लागत वसूलने के लिए भी संघर्ष कर रहा है. सवाल यह है कि जब किसान की मेहनत और लागत का उचित मूल्य ही नहीं मिलेगा, तो वह अगली फसल के लिए पूंजी और हिम्मत कहां से जुटाएगा? गेंदा के इन पीले-नारंगी खेतों में आज सिर्फ फूल नहीं खिले हैं, बल्कि अन्नदाता के सामने खड़ा एक बड़ा आर्थिक संकट साफ नजर आ रहा है.(प्रमोद कारपेंटर की रिपोर्ट)