गुजरात के डांग में स्‍ट्रॉबेरी उत्‍पादन में 65 फीसदी बढ़ोतरी, फसल बदलने से किसानों की आय में जबरदस्‍त उछाल

गुजरात के डांग में स्‍ट्रॉबेरी उत्‍पादन में 65 फीसदी बढ़ोतरी, फसल बदलने से किसानों की आय में जबरदस्‍त उछाल

गुजरात के डांग जिले में स्ट्रॉबेरी खेती किसानों की आय बढ़ाने का बड़ा जरिया बन रही है. तीन साल में उत्पादन और खेती का रकबा तेजी से बढ़ा है. अब यहां की स्ट्रॉबेरी बड़े शहरों तक पहुंच रही है और किसानों को पारंपरिक खेती से ज्यादा कमाई मिल रही है.

Strawberry Farming DangStrawberry Farming Dang
क‍िसान तक
  • Noida,
  • May 21, 2026,
  • Updated May 21, 2026, 2:02 PM IST

गुजरात के आदिवासी बहुल डांग जिले में अब खेती की तस्वीर तेजी से बदल रही है. कभी सीमित स्तर पर होने वाली स्ट्रॉबेरी की खेती अब किसानों की आय बढ़ाने वाली प्रमुख बागवानी फसल बनती जा रही है. पिछले तीन वर्षों में जिले में स्ट्रॉबेरी उत्पादन में करीब 65 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई है. खेती के रकबे से लेकर उत्पादन और बाजार तक पहुंच, हर स्तर पर इस फसल ने किसानों को नई दिशा दी है. राज्य सरकार के मुताबिक, वित्त वर्ष 2023 में डांग जिले में करीब 20 हेक्टेयर क्षेत्र में स्ट्रॉबेरी की खेती होती थी, जो वित्त वर्ष 2026 तक बढ़कर लगभग 33 हेक्टेयर पहुंच गई है. इसी अवधि में उत्पादन भी 140 मीट्रिक टन से बढ़कर अनुमानित 233 मीट्रिक टन तक पहुंच गया. यह बढ़ोतरी करीब 65 से 66 फीसदी के आसपास रही है.

नई फसलों की ओर बढ़ रहे किसान

डांग जिले के किसान लंबे समय तक धान, नागली, उड़द और वरई जैसी पारंपरिक फसलों पर निर्भर रहे हैं. खेती से सीमित आमदनी होने के कारण कई परिवारों को मजदूरी के लिए दूसरे इलाकों में जाना पड़ता था. पानी की कमी, अनियमित बारिश और बाजार में सही दाम नहीं मिलने से खेती की स्थिति कमजोर बनी रहती थी. 'बिजनेसलाइन' की रिपोर्ट के मुताबिक, अब स्ट्रॉबेरी जैसी नकदी फसल किसानों के लिए बेहतर विकल्प बनकर उभरी है. स्ट्रॉबेरी उगाने वाले किसानों को प्रति हेक्टेयर सालाना करीब 7 से 8 लाख रुपये तक की आय हो रही है. इससे छोटे और सीमांत किसानों की आर्थिक स्थिति में भी सुधार देखने को मिल रहा है.

गांवों में विकसित हो रहे खेती के क्लस्टर

डांग जिले में स्ट्रॉबेरी की खेती अब अलग-अलग खेतों तक सीमित नहीं है. यहां कई गांवों में इसका समूह आधारित मॉडल (क्‍लस्‍टर) बना है. आहवा तालुका के भूरापानी, बोरिगावथा, गलकुंड, कोटामदार, मालेगांव, डाभास, सोनुनिया और वनार जैसे गांव इस खेती के बड़े केंद्र बन चुके हैं. वहीं, वाघई तालुका के कंचनपाड़ा, घोड़वाहल, मुरांबी और आसपास के गांवों में भी तेजी से स्ट्रॉबेरी उत्पादन बढ़ा है. क्लस्टर आधारित खेती से किसानों को बीज, खाद और अन्य जरूरतों की व्यवस्था आसान हुई है. साथ ही फसल को बाजार तक पहुंचाने में भी सुविधा मिली है.

अहमदाबाद और सूरत तक पहुंच रही डांग की स्ट्रॉबेरी

पहले डांग की स्ट्रॉबेरी मुख्य रूप से सापुतारा और आहवा जैसे स्थानीय बाजारों में बिकती थी. लेकिन अब बेहतर परिवहन और बढ़ती मांग के कारण यह फल अहमदाबाद, सूरत और भरूच जैसे बड़े शहरों तक पहुंच रहा है. इससे किसानों को पहले के मुकाबले बेहतर दाम मिल रहे हैं. पैकिंग और कोल्ड चेन की जानकारी बढ़ने से फसल खराब होने की समस्या भी कुछ हद तक कम हुई है. इससे किसानों को नुकसान घटाने में मदद मिली है.

मौसम और मिट्टी दोनों दे रहे खेती को सहारा

कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, डांग का मौसम और मिट्टी स्ट्रॉबेरी उत्पादन के लिए अनुकूल माने जाते हैं. यहां की रेतीली दोमट मिट्टी, जैविक पदार्थों की अच्छी मात्रा और 5.5 से 7.0 के बीच पीएच स्तर फसल के लिए उपयुक्त है. स्ट्रॉबेरी की अच्छी बढ़वार के लिए दिन का तापमान 22 से 25 डिग्री सेल्सियस और रात का तापमान 7 से 13 डिग्री सेल्सियस बेहतर माना जाता है. डांग का ठंडा मौसम इस जरूरत को पूरा करता है.

कई किस्मों की हो रही खेती

डांग जिले में किसान विंटर डॉन, अर्ली विंटर, कैमरोजा, स्वीट चार्ली, नभिला, नबाडी, सेल्वा, बेलरूबी और पजेरो जैसी कई किस्मों की खेती कर रहे हैं. इनमें विंटर डॉन सबसे ज्यादा पसंद की जाने वाली किस्म बनकर उभरी है. इस किस्म की खासियत यह है कि इसकी तुड़ाई दिसंबर से शुरू होकर फरवरी और मार्च तक चलती है.

इससे किसानों को लंबे समय तक बाजार में फल बेचने का मौका मिलता है. स्ट्रॉबेरी खेती बढ़ने से गांवों में रोजगार के अवसर भी बढ़े हैं. तुड़ाई, पैकिंग और फसल संभालने जैसे कामों में स्थानीय लोगों को रोजगार मिल रहा है. इससे मजदूरी के लिए बाहर जाने की जरूरत कुछ कम हुई है और गांवों में आर्थिक गतिविधियां बढ़ी हैं.

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