
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने प्रदेश के भविष्य की अर्थव्यवस्था से जुड़े तीन महत्वपूर्ण विषयों, उत्तर प्रदेश डाटा सेंटर क्लस्टर (यूपीडीसीसी) तथा गेहूं के इन-हाउस प्रसंस्करण को बढ़ावा देने के लिए मंडी शुल्क एवं मंडी सेस में संभावित छूट जैसे महत्वपूर्ण विषयों की उच्च स्तरीय समीक्षा की. मुख्यमंत्री योगी ने गेहूं के इन-हाउस प्रसंस्करण को बढ़ावा देने की रणनीति पर भी विस्तृत चर्चा की. उन्होंने मंडी टैक्स और मंडी शुल्क व्यवस्था में सुधार की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि प्रदेश की मंडियों को आधुनिक, स्वच्छ और आकर्षक बनाया जाना चाहिए. सीएम ने निर्देश दिए कि मंडियों में साफ-सफाई, रंगाई-पुताई, पर्वों के दौरान लाइटिंग, अतिक्रमण हटाने और बेहतर प्रबंधन की व्यवस्था सुनिश्चित की जाए.
मुख्यमंत्री ने अल नीनो के संभावित प्रभाव का उल्लेख करते हुए कहा कि आगामी वर्षों में फसलों पर इसका असर पड़ सकता है, इसलिए प्रदेश को खाद्यान्न सुरक्षा के लिए अभी से तैयार रहना होगा. उन्होंने कहा कि राज्य के खाद्यान्न भंडार पर्याप्त और मजबूत होने चाहिए. बैठक में बताया गया कि उत्तर प्रदेश देश का सबसे बड़ा गेहूं उत्पादक राज्य है. वर्ष 2025-26 में प्रदेश में 372 लाख मीट्रिक टन गेहूं उत्पादन का अनुमान है, जबकि कुल उपलब्धता 407 लाख मीट्रिक टन तक पहुंचती है.
प्रदेश में लगभग 2.88 करोड़ किसान गेहूं उत्पादन से जुड़े हैं. इसके बावजूद सीमित प्रसंस्करण क्षमता के कारण बड़ी मात्रा में गेहूं कच्चे अनाज के रूप में दूसरे राज्यों में चला जाता है, जिससे मूल्य संवर्धन, जीएसटी राजस्व और रोजगार के अवसर प्रदेश से बाहर चले जाते हैं. प्रदेश में 559 रोलर फ्लोर मिल्स हैं जिनकी कुल मिलिंग क्षमता 218.4 लाख मीट्रिक टन है, लेकिन वास्तविक उपयोग केवल 126.45 लाख मीट्रिक टन तक सीमित है.
इसके अलावा 40 हजार से अधिक आटा चक्कियां भी संचालित हैं. रिपोर्ट में कहा गया कि यदि राज्य के भीतर ही गेहूं प्रसंस्करण को बढ़ावा मिले तो रोजगार, बिजली खपत, जीएसटी संग्रह और खाद्य उद्योगों में बड़ा विस्तार हो सकता है. समिति ने सुझाव दिया कि उत्तर प्रदेश में पंजीकृत मिलों द्वारा राज्य के भीतर प्रसंस्करण हेतु खरीदे गए गेहूं पर मंडी शुल्क एवं विकास उपकर में छूट दी जाए, लेकिन व्यापारिक गतिविधियों पर यह छूट लागू न हो.
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