
पंजाब में खेती लगातार महंगी होती जा रही है और इसका सीधा असर किसानों की आमदनी पर पड़ रहा है. एक तरफ केंद्र सरकार किसानों को रासायनिक खाद और कीटनाशकों का कम इस्तेमाल करने की सलाह दे रही है. वहीं, दूसरी तरफ किसान बढ़ती लागत और घटती बचत को लेकर चिंता जता रहे हैं. इसी कड़ी में संगरूर जिले के किसानों ने धान की खेती के खर्च और आमदनी का हिसाब लगाते हुए बताया कि पिछले एक साल में खेती पर महंगाई की बड़ी मार पड़ी है.
किसानों के अनुसार, वर्ष 2025 में एक एकड़ धान की फसल तैयार करने में लगभग 56 हजार 140 रुपये खर्च आते थे, लेकिन अब 2026 में यही खर्च बढ़कर करीब 61 हजार 50 रुपये तक पहुंच चुका है. जमीन का ठेका, डीजल, मजदूरी, खाद, कीटनाशक और स्प्रे समेत लगभग हर चीज महंगी हुई है. किसानों ने बताया कि यह खर्च केवल बाजार से खरीदी गई चीजों का है, इसमें किसान और उसके परिवार की अपनी मेहनत शामिल नहीं है.
आंकड़ों के अनुसार, एक एकड़ जमीन का ठेका 42 हजार 500 रुपये से बढ़कर 45 हजार रुपये हो गया है. वहीं, डीजल, मजदूरी और कीटनाशकों के खर्च में भी भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई है. खेती में इस्तेमाल होने वाले यूरिया, जिंक फास्फेट और अन्य रसायनों की कीमतों में भी लगातार इजाफा हुआ है.
दूसरी ओर सरकार ने धान के न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी MSP में केवल 72 रुपये प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी की है. वर्ष 2025 में धान का MSP 2389 रुपये था जो अब 2026 में बढ़कर 2461 रुपये हुआ है. किसानों का कहना है कि यदि एक एकड़ में औसतन 30 क्विंटल धान निकलता है तो पिछले साल के मुकाबले किसान की कुल आय में केवल 2160 रुपये का ही इजाफा होगा, जबकि खेती का खर्च करीब 4910 रुपये बढ़ गया है. ऐसे में किसानों को लगभग 2750 रुपये का अधिक खर्च आएगा.
इसी कारण किसानों की वास्तविक कमाई घट रही है. किसानों के मुताबिक जहां 2025 में एक एकड़ से करीब 15 हजार 530 रुपये की बचत हो जाती थी, वहीं अब यह घटकर लगभग 12 हजार 780 रुपये रह गई है. किसानों का कहना है कि छह महीने की कड़ी मेहनत के बाद इतनी कम बचत होना खेती को घाटे का सौदा बना रहा है. किसानों ने यह भी कहा कि यह पूरा हिसाब तब का है जब फसल पर कोई प्राकृतिक आपदा या बीमारी का असर न पड़े. कई बार बेमौसम बारिश, ओलावृष्टि, बाढ़ या फसल रोग के कारण पूरी मेहनत बर्बाद हो जाती है. ऐसे हालात में किसान केवल सरकारी मुआवजे की उम्मीद पर रह जाता है.
प्रधानमंत्री की उस अपील पर भी किसानों ने प्रतिक्रिया दी, जिसमें रासायनिक खाद और फर्टिलाइजर का कम इस्तेमाल करने की बात कही गई थी. किसानों का कहना है कि वर्षों पहले सरकारों ने ही अधिक उत्पादन के लिए रासायनिक खेती को बढ़ावा दिया था और अब अचानक इसे छोड़ना आसान नहीं है. उनका कहना है कि यदि तुरंत रसायनों का इस्तेमाल कम किया गया तो फसल का उत्पादन घट सकता है, जिससे किसानों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ेगा. किसानों ने मांग की है कि यदि सरकार जैविक खेती की ओर बढ़ाना चाहती है तो पहले किसानों को आर्थिक सुरक्षा और वैकल्पिक सहायता दी जाए. (कुलवीर सिंह की रिपोर्ट)