छत्तीसगढ़ का 'जवांफूल' चावल बना सुपरहिट! ₹180 किलो दाम, रायपुर से दिल्ली तक जबरदस्त डिमांड

छत्तीसगढ़ का 'जवांफूल' चावल बना सुपरहिट! ₹180 किलो दाम, रायपुर से दिल्ली तक जबरदस्त डिमांड

रायगढ़ के लैलूंगा स्थित पाकरगांव का पारंपरिक जवांफूल चावल 175–180 रुपये प्रति किलो तक बिक रहा है.10 एकड़ में सामूहिक खेती करने वाले किसानों का यह सुगंधित चावल रायपुर, दिल्ली और मुख्यमंत्री निवास तक पहुंच रहा है.

धर्मेंद्र सिंह
  • Raipur ,
  • Aug 03, 2026,
  • Updated Aug 03, 2026, 8:01 AM IST

छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले का एक छोटा-सा गांव आज अपनी अनोखी पहचान बना चुका है. लैलूंगा विकासखंड का पाकरगांव पारंपरिक सुगंधित जवांफूल धान की खेती के कारण पूरे प्रदेश में चर्चा का विषय बन गया है.इस गांव का चावल न केवल रायपुर और दिल्ली जैसे बड़े शहरों तक पहुंच रहा है, बल्कि इसकी खुशबू मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के निवास तक भी पहुंच चुकी है.खास बात यह है कि यह चावल बाजार में 175 से 180 रुपये प्रति किलो तक बिक रहा है, जिससे किसानों की आय में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई है.

10 एकड़ में सामूहिक खेती से बनी सफलता की मिसाल

पाकरगांव के किसान निर्भय राम नायक, सेवक राम नायक, बूंद राम नायक, प्रदीप नायक और गणेश राम नायक सामूहिक रूप से करीब 10 एकड़ क्षेत्र में जवांफूल धान की खेती कर रहे हैं. वर्षों से इस पारंपरिक धान की किस्म को संरक्षित करते हुए किसान इसकी शुद्धता और गुणवत्ता बनाए हुए हैं. किसानों का कहना है कि स्वाद, खुशबू और बेहतर गुणवत्ता के कारण इसकी मांग हर साल बढ़ रही है और यह सामान्य धान की तुलना में कई गुना अधिक लाभ देने वाली फसल साबित हो रही है.

रायपुर से दिल्ली तक बढ़ी मांग

जवांफूल चावल की मांग अब स्थानीय बाजार तक सीमित नहीं रही। रायपुर, दिल्ली समेत कई बड़े शहरों में इसकी सप्लाई की जा रही है. उपभोक्ता सीधे गांव पहुंचकर भी किसानों से चावल खरीद रहे हैं. किसानों के अनुसार, बेहतर गुणवत्ता और प्राकृतिक तरीके से उत्पादन होने के कारण ग्राहकों का भरोसा लगातार बढ़ रहा है.

मुख्यमंत्री निवास तक पहुंच रही खुशबू

पाकरगांव के किसानों के लिए गर्व की बात यह है कि उनके खेतों में पैदा होने वाला जवांफूल चावल मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के निवास तक भी भेजा जाता है. इससे इस पारंपरिक धान की लोकप्रियता और गुणवत्ता का अंदाजा लगाया जा सकता है.

कम लागत में बेहतर मुनाफा

किसानों के अनुसार, जवांफूल धान की खेती में सामान्य धान की तुलना में अधिक सावधानी बरतनी पड़ती है.समय पर कृषि कार्य, शुद्ध बीज का चयन और गुणवत्तापूर्ण उत्पादन इसकी सफलता की कुंजी है. इस धान से प्रति एकड़ 12 से 15 क्विंटल उत्पादन प्राप्त होता है.मिलिंग के बाद लगभग 60 प्रतिशत चावल प्राप्त होता है.अच्छी कीमत मिलने के कारण उत्पादन भले ही कम हो, लेकिन किसानों को बेहतर मुनाफा मिलता है.

हरी खाद से बढ़ रही मिट्टी की उर्वरता

इस खरीफ सीजन में किसानों ने धान की रोपाई से पहले खेतों में ढैंचा की हरी खाद का उपयोग किया. ढैंचा को खेत में मिलाने से मिट्टी की जैविक उर्वरता बढ़ती है और फसल को प्राकृतिक पोषण मिलता है. किसानों को ढैंचा का बीज कृषि विभाग और ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारियों के माध्यम से उपलब्ध कराया गया.इससे खेती की लागत कम होने के साथ उत्पादन की गुणवत्ता भी बेहतर हो रही है.

प्राकृतिक खेती और पारंपरिक धान संरक्षण का मॉडल

पाकरगांव के किसानों की यह पहल केवल अच्छी आय तक सीमित नहीं है, बल्कि पारंपरिक सुगंधित धान की किस्मों के संरक्षण का भी बेहतरीन उदाहरण है. कृषि विभाग किसानों को उन्नत तकनीक, गुणवत्तापूर्ण बीज और आधुनिक कृषि प्रबंधन की जानकारी देकर इस मॉडल को आगे बढ़ाने में सहयोग कर रहा है.आने वाले समय में जवांफूल धान छत्तीसगढ़ की एक महत्वपूर्ण ब्रांडेड फसल के रूप में उभर सकती है.

 

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