
बिहार में पुरानी चीनी मिलों को दोबाार शुरू करने की कवायद चल रही है. उससे पहले सरकार ने गन्ने की खेती को बढ़ाने का अभियान चलाया है. मिलें शुरू होने के साथ ही बड़ी मात्रा में गन्ने की जरूरत होगी, इसलिए उन्नत किस्मों की खेती पर जोर दिया जा रहा है. इसके साथ ही, गन्ने की उत्पादकता बढ़ाने और किसानों की आय में सुधार करने के लिए सेमी-पेरेनियल (अर्ध-बारहमासी) गन्ना खेती की शुरुआत की गई है. खेती के इस नए तरीके से किसान एक ही खेत से 18 महीनों के भीतर गन्ने की दो फसलें काट सकते हैं.
इस पहल की शुरुआत समस्तीपुर जिले के रोसेरा ब्लॉक के धरहा गांव में की गई, जहां बिड़ला ग्रुप के सीईओ पंकज सिंह ने स्थानीय किसानों के खेतों में CO 0238 गन्ना किस्म की रोपाई का उद्घाटन किया.
Co 0238 (करण 4) ज्यादा पैदावार और ज्यादा चीनी की मात्रा वाली किस्म है, जिसे Co LK 8102 और Co 775 के क्रॉस से विकसित किया गया है. इस किस्म को गन्ना प्रजनन संस्थान, क्षेत्रीय केंद्र, करनाल में विकसित किया गया था और 2009 में उत्तर-पश्चिम क्षेत्र (NWZ) में कमर्शियल खेती के लिए जल्दी पकने वाली किस्म के रूप में जारी किया गया था. NWZ में हरियाणा, पंजाब, पश्चिमी और मध्य उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और राजस्थान राज्य शामिल हैं.
NWZ में 2006-08 के दौरान AICRP (गन्ना) के तहत 7 जगहों पर Co 0238 के बारे में जानकारी जुदाई गई थी. गन्ने की पैदावार (81 टन/हेक्टेयर) में यह पहले स्थान पर, चीनी की पैदावार में दूसरे स्थान पर और सुक्रोज की मात्रा (%) में पांचवें स्थान पर रही. NWZ की एक जानी-मानी जल्दी पकने वाली किस्म CoJ 64 की तुलना में, इसने गन्ने की पैदावार, चीनी की पैदावार और सुक्रोज में क्रमशः 19.96, 15.83 और 0.50% का सुधार दिखाया. Co 0238 का गुड़ हल्के पीले रंग का और A1 क्वालिटी का होता है.
यह किस्म रेड रॉट रोगजनक की प्रचलित किस्मों के प्रति मध्यम रूप से प्रतिरोधी है. यह किस्म खेतों में बहुत तेजी से फैली है क्योंकि इसमें गन्ने की ज्यादा पैदावार और बेहतर रस की क्वालिटी दोनों का मेल है, इसलिए किसान और चीनी उद्योग दोनों ही इसे पसंद कर रहे हैं. 2009-10 से सभी पांच प्रमुख गन्ना उत्पादक राज्यों - पंजाब, हरियाणा, उत्तराखंड, यूपी और बिहार - में Co 0238 के तहत क्षेत्र तेजी से बढ़ रहा है. हालांकि, इस किस्म को NWZ (उत्तर-पश्चिम क्षेत्र) के लिए जारी और अधिसूचित किया गया था, लेकिन यह इस क्षेत्र की सीमाओं को पार करके पूर्वी यूपी, बिहार, मध्य प्रदेश और ओडिशा तक पहुंच गई.
2015-16 के दौरान, उत्तर भारत में गन्ने के कुल रकबे (21,77,802 हेक्टेयर) का लगभग 20.5% हिस्सा Co 0238 (4,47,459 हेक्टेयर) के अंतर्गत था. पंजाब में इसका सबसे ज्यादा कवरेज (70% क्षेत्र) था, इसके बाद हरियाणा (29%), यूपी (19.6%), बिहार (6%) और उत्तराखंड (8.4%) का स्थान था.
यूपी के 20 जिलों में गन्ने की पैदावार और चीनी रिकवरी (%) अधिक रही, क्योंकि 2013-14 में Co 0238 के तहत रकबा 72,623 हेक्टेयर (3.1%) से बढ़कर 2014-15 में 1,76,763 हेक्टेयर (8.3%) हो गया था.
मौजूदा हालात में, इस किस्म ने चीनी मिलों के नुकसान को कुछ हद तक कम करने में मदद की है. 2014-15 के दौरान, अकेले उत्तर प्रदेश में Co 0238 किस्म की वजह से किसानों और चीनी मिलों को 137.5 करोड़ रुपये का अतिरिक्त फायदा हुआ. 2015-16 सीजन के दौरान, उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले की एक मिल ने 21 दिसंबर, 2015 को सबसे ज्यादा चीनी रिकवरी (12.1%) दर्ज की, जो उप-उष्णकटिबंधीय (sub-tropical) भारत में अब तक की सबसे ज्यादा रिकवरी रही.
उत्तर प्रदेश में चीनी रिकवरी पर Co 0238 के इस ऐतिहासिक असर की खबर फैलने के बाद, ICAR-गन्ना प्रजनन संस्थान (Sugarcane Breeding Institute) को महाराष्ट्र, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश जैसे कई राज्यों से Co 0238 के बीज की भारी मांग मिली.