सारण जिले के मांझी और दरियापुर प्रखंड में पानी के दबाव के कारण माही और दाहा नदी के बांध टूट गए हैं. बांध टूटने से कई गांवों में बाढ़ का पानी फैल गया है और खेतों में खड़ी फसलों पर नुकसान का खतरा बढ़ गया है.
बिहार के मैदानी इलाकों में पहली बार एवोकाडो की सफल खेती ने नई उम्मीद जगाई है. RPCAU पूसा के वैज्ञानिकों ने 750 से 950 ग्राम तक के फल उगाकर आयातित एवोकाडो को टक्कर देने की संभावना पैदा की है.
बिहार ने मशरूम उत्पादन में देश का नंबर-1 राज्य बनने का गौरव हासिल किया है. 2013-14 में जहां उत्पादन मात्र 0.06 हजार मीट्रिक टन था, वहीं 2023-24 में यह बढ़कर 42.19 हजार मीट्रिक टन पहुंच गया. सरकारी योजनाओं, सब्सिडी, ट्रेनिंग और महिला किसानों की भागीदारी ने बिहार में मशरूम क्रांति को नई ऊंचाई दी है.
बिहार में गंगा समेत कई नदियों का जलस्तर बढ़ने से बाढ़ का खतरा बढ़ गया है. गंगा खतरे के निशान से ऊपर बह रही है, जिससे दियारा और कुर्जी इलाके में सब्जियों की फसल प्रभावित हुई है. किसानों को नुकसान के साथ बाजार में सब्जियों के दाम बढ़ने की चिंता सता रही है.
दरभंगा के हरसिनपुर नौवटोलिया गांव में मखाना फोड़ने वाले सहनी समाज के परिवार बीज और लावा के दाम में अचानक आई गिरावट से परेशान हैं. कई लोगों ने ऊंचे ब्याज पर कर्ज लेकर कारोबार शुरू किया था, लेकिन बीते 10-15 दिनों में मखाना बीज का भाव 25 हजार रुपये प्रति क्विंटल से गिरकर करीब 16 हजार रुपये प्रति क्विंटल पहुंच गया है. मखाने के वैश्विक कारोबार के बढ़ने के बावजूद कारीगरों और किसानों की आय पर संकट गहरा गया है.
बिहार में खरीफ मक्का की खेती इस साल किसानों के बीच काफी लोकप्रिय साबित हुई है. राज्य में 2.70 लाख हेक्टेयर के लक्ष्य के मुकाबले 2.55 लाख हेक्टेयर में बुवाई हो चुकी है, जिससे 94 प्रतिशत लक्ष्य हासिल कर लिया गया है. पूर्णिया, कटिहार, भागलपुर, बेगूसराय, सीवान समेत कई जिलों ने लक्ष्य के बराबर या उससे अधिक क्षेत्र में मक्के की खेती दर्ज की है.
बिहार में मॉनसून सामान्य से 36% कमजोर रहने के बावजूद अगस्त की शुरुआत में हुई अच्छी बारिश से खरीफ खेती को गति मिली है. धान की रोपनी 85% और मक्का की बुवाई 94% लक्ष्य तक पहुंच चुकी है, लेकिन कई इलाकों में किसान अभी भी पानी की कमी, गिरते भूजल स्तर और बाढ़ जैसी चुनौतियों से जूझ रहे हैं.
बिहार में गन्ना उत्पादन बढ़ाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया गया है. गन्ना उद्योग विभाग ने सभी जिलों के लिए खेती का रकबा और उत्पादन लक्ष्य तय कर दिया है. पश्चिमी चंपारण को सबसे अधिक 1.66 लाख हेक्टेयर का लक्ष्य मिला है, जबकि नई चीनी मिलों के लिए पर्याप्त गन्ना उपलब्ध कराने पर सरकार का फोकस है.
बिहार में सकरी और रैयाम चीनी मिलों के शिलान्यास की घोषणा के बाद गन्ना किसानों में नया उत्साह देखने को मिल रहा है. गन्ना विभाग के फसल विस्तार अभियान का असर यह है कि अब तक 9 हजार से अधिक किसानों ने ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन कराया है.
बिहार में 1 जून से 22 जुलाई के बीच सामान्य से 37 फीसदी कम बारिश दर्ज की गई है, लेकिन इसके बावजूद राज्य में धान की रोपनी लक्ष्य के 50 फीसदी तक पूरी हो चुकी है. सिवान राज्य का एकमात्र जिला है जहां सामान्य से 12 फीसदी अधिक बारिश हुई है, जबकि जहानाबाद में बारिश 70 फीसदी कम रही है. मौसम विभाग ने फिलहाल सूखे जैसे हालात से इनकार करते हुए जुलाई के अंत और अगस्त की शुरुआत में मॉनसून के फिर सक्रिय होने की संभावना जताई है.
बिहार में बंद पड़ी चीनी मिलों को दोबारा चालू करने की तैयारी के बीच सरकार गन्ना उत्पादन बढ़ाने पर जोर दे रही है. इसके लिए उच्च उत्पादकता वाली Co 0238 (करण-4) गन्ना किस्म और सेमी-पेरेनियल खेती पद्धति को बढ़ावा दिया जा रहा है. इस तकनीक से किसान 18 महीनों में एक ही खेत से दो फसलें ले सकते हैं, जबकि Co 0238 किस्म अधिक पैदावार, बेहतर चीनी रिकवरी और अच्छी क्वालिटी के गुड़ के लिए देशभर में लोकप्रिय हो चुकी है.
बिहार में सामान्य से कम बारिश के कारण अब तक केवल 12% क्षेत्र में धान की रोपनी हो सकी है, जबकि 90% नर्सरी तैयार है. आईसीएआर-पूर्वी अनुसंधान परिसर, पटना के निदेशक डॉ. अनूप दास ने किसानों के लिए सलाह जारी की है.
बिहार में मॉनसून की रफ्तार धीमी रहने और पर्याप्त बारिश नहीं होने के बीच डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा के वैज्ञानिकों ने किसानों को तिल, मक्का और अरहर जैसी खरीफ फसलों की खेती करने की सलाह दी है. पानी की कमी वाले ऊंचे क्षेत्रों में मध्य जुलाई तक तिल की बुवाई की जा सकती है, जबकि मक्का और अरहर की खेती के लिए भी यह समय उपयुक्त माना गया है. विशेषज्ञों का कहना है कि कम बारिश की स्थिति में ये फसलें किसानों के लिए बेहतर विकल्प साबित हो सकती हैं.
राजस्थान के नागौर जिले में कमजोर मॉनसून के बावजूद किसान मूंगफली की खेती पर ज्यादा भरोसा जता रहे हैं. अधिक पानी की जरूरत और जोखिम के बावजूद, बेहतर बाजार कीमत, तेल की मांग और चारे के उपयोग के कारण किसान मूंगफली का रकबा बढ़ा रहे हैं. वहीं, सरकारी आंकड़ों में इस साल तिलहन फसलों के रकबे में गिरावट भी दर्ज की गई है, जो खेती के बदलते रुझान को दर्शाता है.
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