
बिहार में नई सरकार की ताजपोशी होने जा रही है. नीतीश कुमार विदा हो गए हैं और सत्ता की कमान बीजेपी के हाथों जा रही है. इस बीच बिहार के कृषि जगत में एक बड़ी पहल देखी जा रही है. बिहार में ऐसा पहली बार होगा जब केंद्र की एजेंसियां चना, मसूर और सरसों जैसे कृषि जिंसों की खरीद करेंगी. अभी तक पैक्सों के जरिए केवल धान और गेहूं की सरकारी खरीद होती थी. सवाल है कि यह खरीद अब क्यों हो रही है, पहले क्यों नहीं होती थी?
इसकी दो मुख्य वजह है. पहली वजह-एमएसपी पर खरीद के लिए किसी भी राज्य को केंद्र के खाद्य मंत्रालय से MoU करना होता है. यानी राज्य और केंद्र के बीच करार होता है. इस करार में केंद्र और राज्य की जवाबदेही और बजट तय होता है, फिर FCI या अन्य एजेंसियां खरीद शुरू करती हैं. बिहार से अभी तक ऐसा कोई आग्रह केंद्र से नहीं होता था, इसलिए एमएसपी पर खरीद भी नहीं होती थी. अब बिहार सरकार का पैटर्न बदला है, लिहाजा खरीद शुरू होने जा रही है. इसके बारे में तत्कालीन खाद्य मंत्री राम विलास पासवान ने संसद में जानकारी दी थी.
दूसरी वजह-केंद्र सरकार दलहन और तिलहन में देश को आत्मनिर्भर बनाने का मिशन चला रही है. इसे देखते हुए जिस राज्य से जितना बन सके, उतनी अधिक खरीद को प्रोत्साहन दिया जा रहा है. इस मौके का फायदा अब बिहार के किसानों को भी मिलने जा रहा है.
इस बात को समझने के लिए हमें 11 मार्च 2016 को संसद में पूछे गए एक सवाल को देखना होगा जिसका जवाब तत्कालीन खाद्य मंत्री रामविलास पासवान ने दिया था.
पासवान ने बताया, सरकार की एक तय नीति है जिसके तहत पूरे देश में किसानों से अनाज खरीदा जाता है. साफ‑सी बात ये है कि अगर किसान तय समय में अपनी फसल सरकारी खरीद केंद्र पर लाते हैं और फसल सरकार के तय किए हुए मानकों पर ठीक उतरती है, तो सरकार उसे MSP (न्यूनतम समर्थन मूल्य) पर खरीद ही लेती है. यह खरीद सरकार की एजेंसियां करती हैं, जैसे FCI वगैरह.
हां, अगर किसान को बाजार में कहीं इससे अच्छा दाम मिल रहा है, तो वह अपनी फसल किसी व्यापारी या किसी और को बेच सकता है. उसमें कोई रोक नहीं है. किसानों को खेती में हौसला देने के लिए सरकार हर सीजन में MSP भी घोषित करती है. इस खरीद की भी दो तरह की व्यवस्था होती है.
पहली – जहां FCI सीधे शामिल होती है. इसमें कभी FCI खुद खरीद करती है, और कभी राज्य सरकार खरीद कर अनाज FCI को दे देती है. बाद में वही अनाज राशन जैसी सरकारी योजनाओं में इस्तेमाल होता है या दूसरे राज्यों में भेजा जाता है. राज्य सरकार ने जो खर्च किया होता है, वो पैसा FCI बाद में वापस कर देता है.
दूसरी – विकेंद्रीकृत खरीद (DCP) जिसमें पूरी जिम्मेदारी राज्य सरकार की होती है. राज्य सरकार ही खरीद करती है, भंडारण करती है और अपने राज्य में राशन और दूसरी योजनाओं के लिए अनाज बांटती है. अगर अनाज राज्य की जरूरत से ज्यादा हो जाए, तभी FCI उसे लेकर दूसरे राज्यों में भेजती है.
ऐसे में यह जानना जरूरी है कि बिहार में कौन सी व्यवस्था है जिसमें किसानों से एमएसपी पर उपज की खरीद नहीं हो पाती. बिहार यही वाली दूसरी वाली व्यवस्था (DCP) है. इसका मतलब है-धान और गेहूं की खरीद बिहार सरकार की एजेंसियां करती हैं. वही अनाज रखा जाता है और राज्य में राशन के तौर पर बांटा जाता है.
बिहार सरकार का इस बारे में केंद्र सरकार से समझौता भी है कि अगर किसी दूर-दराज इलाके में राज्य खुद खरीद न कर पाए, तो FCI से मदद मांग सकती है. लेकिन अभी तक खरीद का ऐसा कोई अनुरोध केंद्र से नहीं किया गया है. यही वजह है कि अभी तक बिहार में धान या चावल की खरीद सिर्फ राज्य सरकार ही कर रही है ताकि किसान मजबूरी में अपनी फसल सस्ते में न बेचें और उन्हें सही दाम मिले.
बिहार में पहले APMC अधिनियम (2006) चलता था जिसकी मदद से उपज की सरकारी खरीद होती थी. लेकिन बाद में नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री काल में APMC अधिनियम को हटा दिया गया जिसे "मंडियों" (बाजार यार्ड) की व्यवस्था खत्म हो गई. इससे पहले खरीद का काम आसानी से हो जाता था. मंडी न होने के कारण, छोटे किसानों को बिचौलियों को कम कीमतों पर अपनी फसल बेचने के लिए मजबूर होना पड़ता है.
इसके अलावा, पंजाब और हरियाणा जैसे राज्यों की तुलना में, खरीद केंद्रों और भंडारण के बुनियादी ढांचे में भारी कमी है, जिससे सरकार के लिए दूर-दराज के इलाकों से फसल खरीदना मुश्किल हो जाता है.
बिहार में नई सरकार के आगमन के बीज खरीद की पूरी व्यवस्था बदली है और केंद्र की एजेंसियां दलहन, तिलहन की खरीद करेंगी. राज्य के किसानों के लिए यह अच्छा संकेत है क्योंकि उनकी कमाई का सहारा बढ़ेगा. कुल मिलाकर, सरकार की खरीद व्यवस्था का मकसद यही है कि किसानों को उनकी फसल का उचित और भरोसेमंद दाम मिल सके और वे मजबूरी में सस्ते में फसल न बेचें.