
वैज्ञानिकों ने खरीफ मौसम में बोई जाने वाली मूंग की एमएच 1142 किस्म को भारत के उत्तर-पश्चिम और उत्तर-पूर्व के मैदानी इलाकों में खेती के लिए सलाह दी है. इन क्षेत्रों में उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, राजस्थान, उत्तराखंड, बिहार, झारखंड, पश्चिमी बंगाल और असम राज्य शामिल हैं. इस किस्म की फलियां काले रंग की होती हैं और बीज मध्यम आकार के हरे और चमकीले होते हैं.
मूंग की एमएच 1142 किस्म का पौधा कम फैलावदार, सीधा और सीमित बढ़वार वाला है, जिससे इसकी कटाई आसान हो जाती है. यह किस्म अलग-अलग राज्यों में 63 से 70 दिनों में पककर तैयार हो जाती है और इसकी औसत पैदावार मौसम की परिस्थितियों के अनुसार 12 क्विंटल से 20 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक आंकी गई है.
मूंग की इस किस्म में सबसे घातक बीमारी पीला मरोड़ (येलो मोजेक) वायरस का अटैक नहीं होता. यह किस्म इस वायरस के प्रति बहुत अधिक प्रतिरोधी है. इसके अलावा, यह एंथ्राक्नोज और पाउडरी मिल्ड्यू जैसे रोगों को भी सहने की मध्यम क्षमता रखती है. इस किस्म की सबसे खास बात है कि इसके पौधे सीधे और सीमित बढ़वार वाले होते हैं, जिससे फलियां एक साथ पकती हैं और कटाई-तुड़ाई में किसानों को आसानी होती है.
जायद और खरीफ, दोनों सीजन में इस किस्म की खेती की जाती है. जायद में 8-10 किलो प्रति एकड़ बीज की जरूरत होती है जबकि खरीफ (बरसात) में यह मात्रा 5-6 किलो प्रति एकड़ होती है. बुवाई से पहले बीज उपचार जरूरी है जिसमें प्रति किलो बीज को 3 ग्राम थायरम या कार्बेन्डाजिम फफूंदनाशक से उपचारित करना होता है. इसके बाद राइजोबियम कल्चर से बीजों को उपचारित करके बोएं तो अच्छी पैदावार मिलती है.
जायद में 15 मार्च से 15 अप्रैल तक इसकी बुवाई की जाती है जबकि खरीफ में 25 जून से 15 जुलाई तक जरूर खेती कर देनी चाहिए. इसकी बुवाई सीड ड्रिल मशीन से कतारों में करनी चाहिए और कतार से कतार की दूरी 30 सेमी (जायद में) और खरीफ में 45 सेमी की दूरी रखनी चाहिए. पौधे से पौधे की दूरी लगभग 10 सेमी रखनी चाहिए. बीज को मिट्टी में 3-4 सेमी गहरा बोएं.
मूंग एक दलहन फसल है, इसलिए अधिक नाइट्रोजन की जरूरत नहीं होती क्योंकि इसकी जड़ें हवा से नोइट्रोजन सोखती हैं और मिट्टी में जमा करती हैं. हालांकि बुवाई के समय बेसल डोज के रूप में 15-18 किलो प्रति एकड़ यूरिया देनी चाहिए. सिंगल सुपर फास्फेट की मात्रा 100 किलो प्रति एकड़ या 35 किलो डीएपी इस्तेमाल कर सकते हैं. खेत में 8 किलो दानेदार सल्फर जरूर डालें जिससे दाने में चमक और प्रोटीन की मात्रा बढ़ती है. खरीफ के मौसम में सिंचाई की जरूरत नहीं होती. अगर बारिश अधिक हो तो खेत से पानी निकालने का जरूर प्रबंध करें.
दूसरी किस्म एम.एच.1762 है जिसे वैज्ञानिकों ने खरीफ में बुवाई के लिए सलाह दी है. यह किस्म पीला मोजैक और अन्य रोगों के लिए प्रतिरोधी है. यह किस्म बसंत और गर्मियों में भारत के उत्तर पश्चिमी मैदानी क्षेत्रों में बिजाई के लिए के लिए बताई गई है. एम.एच.1762 लगभग 60 दिनों में पक कर तैयार हो जाती है. इनके दाने चमकीले हरे रंग के मध्यम आकार के होते हैं. ये किस्म सभी प्रचलित किस्मों से 10-15 प्रतिशत अधिक पैदावार देती है.