
भारत में बेशक सबसे ज्यादा भैंस के दूध की डिमांड होती है, लेकिन हकीकत ये है कि विश्वभर में सबसे ज्यादा गाय पाली जाती हैं. और संख्या भी सबसे ज्यादा गायों की ही है. हमारे देश में ही गायों की 50 से ज्यादा रजिस्टर्ड नस्ल हैं. देश में जर्सी और एचएफ दो ऐसी भी नस्ल हैं जो विदेशी हैं, लेकिन दूध उत्पादन को देखते हुए उन्हें बहुत पाला जाता है. दोनों नस्ल का दूध उत्पादन किसी से छिपा नहीं है. लेकिन देसी नस्ल की गायों की बात करें तो गाय का दूध ही नहीं घी भी बहुत पौष्टि क माना जाता है. भैंस के मुकाबले गाय के दूध को कहीं ज्यादा गुणकारी बताया गया है. देश के सभी राज्यों में कुछ ऐसी भी नस्ल हैं जो रजिस्टर्ड नहीं हैं. देश के कुल दूध उत्पादन में गाय के दूध की हिस्सेदारी करीब 50 फीसद है.
इसमे विदेशी नस्ल की गाय शामिल नहीं हैं. गायों पर रिसर्च के लिए मेरठ, यूपी में देश का सबसे बड़ा कैटल रिसर्च सेंटर बनाया गया है. रेट के मामले में भी बात करें तो देसी गाय का घी सबसे ज्यादा महंगा बिकता है. इसलिए गायों की देखभाल और ज्यादा जरूरी हो जाती है. एनिमल एक्सपर्ट की मानें तो गायों को 9 ऐसी बीमारी हैं जो ज्यादा होती हैं. ऐसी बीमारियों के लक्षण देखकर घर पर भी उनका इलाज किया जा सकता है.
सांस लेने में दिक्कत, गले में सूजन होती है. एंटीबायोटिक दवा और इंजेक्शन इलाज है. साथ ही बरसात के मौसम से पहले वैक्सीनेशन कराना चाहिए.
थनों में दिक्कत, दूध में छर्रे आना, थनों में सूजन इस बीमारी के लक्षण है. अलग-अलग दवाएं दी जाती हैं. पशु के दूध और थन की समय-समय पर जांच करते रहना चाहिए.
106-107 डिग्री तक बुखार होना, पशु के पैरों में सूजन, पशु का लंगड़ा कर चलना. बरसात से पहले वैक्सीनेशन करवाना और बीमार पशुओं को हेल्दी पशुओं से दूर रखना.
शरीर का तापमान कम हो जाना, सांस लेने में परेशानी होना. प्रसव के 15 दिन तक पूरा दूध न निकालें और पशु को कैल्शियम से भरा आहार और सप्लीमेंट दें.
मुंह और खुर में दाने होते हैं, दाने छाला बनकर फट जाते हैं और घाव गहरा हो जाता है. फौरन ही डॉक्टर को दिखाना चाहिए बरसात से पहले टीकाकरण कराना चाहिए और बारिश में पशु को खुले में चरने नहीं देना चाहिए.
पेशाब और गोबर में खून आना, तेज बुखार होना. पशु चिकित्सक से संपर्क कर स्थिति के हिसाब से उपचार करना चाहिए. इस रोग से बचाने के लिए वक्त रहते टीकाकरण करा लेना चाहिए.
पशु सुस्त हो जाता है, सूखी खांसी और नाक से खून आने लगता है. रोग के लक्षण दिखते ही पशु को अस्पताल में भर्ती कराना चाहिए. पशु के आहार का खास ध्यान रखना चाहिए.
पांच-छह महीने में योनिमुख से तरल गिरता है, बच्चे होने के लक्षण दिखते हैं, लेकिन गर्भपात हो जाता है. पशु की ठीक से सफाई करनी चाहिए, डीवॉर्मिंग करनी चाहिए और पशु चिकित्सक से संपर्क करना चाहिए. छह से आठ महीने के पशु को ब्रुसेला का टीका लगवाना चाहिए.
पशु का बायां पेट फूल जाता है, पेट को थपथपाने पर ढोलक की आवाज आती है.
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