
डेयरी और पशुपालन के क्षेत्र में एक बड़ा सर्वे हुआ है. सर्वे रिपोर्ट के मुताबिक देश के करीब 38 फीसद पशुपालक ऐसे हैं जो बाजार में दूध बेचने के लिए पशुओं को नहीं पालते हैं. सर्वे में ये भी खुलासा हुआ है कि भैंस और क्रॉस-ब्रीड नस्ल के मवेशियों को पालने वाले 50 फीसद से ज्यादा पशुपालक पशुओं में होने वाली बीमारियों, तनाव और उनकी मौत के लिए जलवायु परिवर्तन का असर महसूस कर रहे हैं. काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वॉटर (CEEW) के सर्वे में ये खुलासा हुआ है. गौरतलब रहे देश के 15 राज्यों में सात हजार से ज्यादा पशुपालकों के बीच ये सर्वे हुआ है.
डेयरी एक्सपर्ट का कहना है कि इस सर्वे रिपोर्ट ने पशुपालन और डेयरी से जुड़े साइंटिस्ट को और दूसरे मुद्दों पर भी सोचने को मजबूर कर दिया है. क्योंकि एक ओर तो प्रति पशु दूध उत्पादन बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर जलवायु परिवर्तन पशुपालन पर गहरा असर डाल रहा है. गौरतलब रहे पशुपालन से आठ करोड़ से ज्यादा परिवार जुड़े हुए हैं, वहीं भारत की जीडीपी में ये सेक्टर 5 फीसद का योगदान देता है.
CEEW के डायरेक्टर अभिषेक जैन का कहना है कि भारत के डेयरी सेक्टर की नीतियां मुख्य रूप से दूध उत्पादन पर केंद्रित हैं, जबकि जमीनी स्तर पर पशुपालन एक व्यापक आजीविका तंत्र की तरह काम करता है. वहीं जैसा कि सर्वे रिपोर्ट में सामने आया है कि अलग-अलग राज्यों और पशुपालक श्रेणियों में पशुपालन के मौजूदा हालात, चुनौतियां और प्रेरणा में काफी फर्क है. मौजूदा हालात के साथ सरकारी निवेश का तालमेल लाने के लिए एक समान डेयरी रणनीतियों की जगह पर अलग-अलग और प्रतिक्रियाशील नीतियों की दिशा में जाने की जरूरत है. जिसमें यह भी शामिल हो कि परिवार वास्तव में मवेशियों को किस तरह से महत्व देते हैं, उन्हें किन बाधाओं का सामना करना पड़ता है, और पशुपालन क्षेत्र के लिए जलवायु जोखिम किस तरह से बड़ा हो रहा है.
रुचिरा गोयल, प्रोग्राम एसोसिएट, CEEW का कहना है कि सभी क्षेत्रों में पशुपालन के लिए चारे की कमी बनी हुई है. लेकिन चारे के लिए विभिन्न उपायों को अपनाने की दर काफी कम है. चारे के लिए बेहतर आपूर्ति श्रृंखलाओं के माध्यम से इन कमियों को दूर करने पर छोटे पशुपालकों को तत्काल लाभ मिल सकता है. पशुपालन क्षेत्र को जलवायु परिवर्तन के बढ़ते दबाव से सुरक्षित बनाने के लिए, बजट आवंटन को प्रजनन और टीकाकरण कार्यक्रम से आगे बढ़कर चारे के लिए बड़ा करना चाहिए.
स्थानीय उपायों को सहायता देनी चाहिए. ये समाधान स्थानीय जरूरतों के हिसाब से होने चाहिए. उदाहरण के लिए, सूखे और जमीन की कमी वाले क्षेत्रों में हाइड्रोपोनिक्स और अजोला की खेती को प्रोत्साहन और असम जैसे राज्यों में चारागाहों को सुरक्षित बनाना चाहिए. ऐसे निवेश पशुपालन की उत्पादकता, लचीलापन और पर्यावरणीय सततशीलता में एक साथ सुधार ला सकते हैं.
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