
भारत को दूध उत्पादन में नंबर वन बनाने में एक खास योजना का बड़ा हाथ है. इस योजना को राष्ट्रीय गोकुल मिशन (RGM) के नाम से जाना जाता है. बीते 10 साल से पशुपालक इस योजना का फायदा उठा रहे हैं. पशुपालन से जुड़ी कई ऐसी योजनाएं हैं जो आरजीएम के अंडर में चल रही हैं. आरजीएम योजना का खास मकसद गाय-भैंस की सभी तरह की देसी नस्ल को बढ़ावा देना है. साथ ही दूध की बढ़ती डिमांड को देखते हुए दूध उत्पादन में बढ़ोतरी भी एक मकसद था.
और हुआ भी कुछ ऐसा ही. आठ साल में दुधारू पशुओं की संख्या आठ करोड़ से 12 करोड़ पर पहुंच गई्. आरजीएम के तहत देशी बोवाइन नस्लों के विकास, संरक्षण, बोवाइन आबादी की आनुवंशिक बढ़ोतरी, बोवाईन पशुओं के दूध उत्पादन और उत्पादकता में वृद्धि पर ध्यान दिया जाता है. आज भी पशुपालक और डेयरी संचालन आरजीएम योजना का फायदा उठा रहे हैं.
राष्ट्रीय गोकुल मिशन के तहत, पशुपालन और डेयरी विभाग 50 फीसद से कम कृत्रिम गर्भाधान कवरेज वाले जिलों में कृत्रिम गर्भाधान को बढ़ावा दे रहा है. जिससे देशी नस्लों सहित बोवाइन पशुओं के दूध उत्पादन और उत्पादकता बढ़े. कृत्रिम गर्भाधान सेवाएं किसानों के दरवाजे तक फ्री में पहुंचाई जा रही हैं. मौजूदा नए आंकड़ों के मुताबिक 7.3 करोड़ पशुओं को कवर किया जा चुका है. जिसमें 10.17 करोड़ कृत्रिम गर्भाधान किए गए हैं. देश में 4.58 करोड़ किसान लाभान्वित हुए हैं.
इस कार्यक्रम का उद्देश्य देशी नस्लों के सांडों सहित उच्च आनुवंशिक गुणता वाले सांडों का उत्पादन करना है. संतान परीक्षण को गोपशु की गिर, साहीवाल नस्लों और भैंसों की मुर्राह, मेहसाणा नस्लों के लिए काम किया जा रहा है. नस्ल चयन कार्यक्रम के अंतर्गत गोपशु की राठी, थारपारकर, हरियाना, कांकरेज नस्ल और भैंस की जाफराबादी, नीली रवि, पंढारपुरी और बन्नी नस्लों को शामिल किया गया है. अब तक चार हजार उच्च आनुवंशिक गुणवत्ता वाले सांडों का उत्पादन किया गया है और उन्हें वीर्य उत्पादन हेतु इस्तेमाल किया जा रहा है.
इस तकनीक का इस्तेमाल बोवइन पशुओं के तेजी से आनुवंशिक विकास के लिए किया जाता है और आईवीएफ तकनीक अपनाने में रुचि रखने वाले किसानों को हर बार सुनिश्चित गर्भावस्था पर पांच हजार रुपये का प्रोत्साहन दिया जाता है. देशी नस्लों के उत्कृष्ट पशुओं के प्रजनन के लिए विभाग ने 22 आईवीएफ प्रयोगशालाएं स्थापित की हैं.
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