
उत्तर प्रदेश सरकार और इंडिया टुडे ग्रुप के साझा प्रयास से आयोजित “किसान तक किसान कारवां” प्रदेश के किसानों के लिए जागरूकता, संवाद और समाधान का बड़ा मंच बनकर उभरा है. यह कारवां केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि किसानों की समस्याओं को समझने और उनके समाधान तक पहुंचाने की अनूठी पहल साबित हो रहा है.
29 दिसंबर 2025 को अमरोहा से शुरू हुआ यह किसान कारवां अब प्रदेश के सेंट्रल प्लेन जोन तक पहुंच चुका है. अब तक यह कारवां 3562 किलोमीटर की यात्रा कर प्रदेश के 32 जिलों तक पहुंचा और हजारों किसानों से सीधा संवाद स्थापित किया. सेंट्रल प्लेन जोन के 9 जिलों में पहुंचकर किसान कारवां ने खेती, पशुपालन, बागवानी और नई कृषि तकनीकों की ऐसी तस्वीर दिखाई, जो बदलते ग्रामीण भारत की कहानी बयां करती है।
सेंट्रल प्लेन जोन में लखनऊ, उन्नाव, रायबरेली, अमेठी, कन्नौज ,सीतापुर, हरदोई, बाराबंकी समेत कुल 9 जिलों के 45 गांवों तक किसान कारवां पहुंचा. इस दौरान करीब 1162 किलोमीटर की यात्रा कर कारवां ने 7500 से अधिक किसानों से संवाद किया.
इन गांवों में किसानों ने पहली बार ऐसा मंच देखा, जहां कृषि वैज्ञानिक, पशुपालन विभाग, उद्यान विभाग और कृषि अधिकारी एक साथ मौजूद रहे और किसानों की समस्याओं का समाधान मौके पर ही बताया गया. किसानों ने इस पहल के लिए उत्तर प्रदेश सरकार और इंडिया टुडे ग्रुप का आभार भी जताया.
सेंट्रल प्लेन जोन में खेती अब केवल गेहूं और धान तक सीमित नहीं रही. यहां किसान अब परंपरागत खेती के साथ-साथ सब्जियों, फलों और बागवानी की खेती की ओर तेजी से बढ़ रहे हैं.
इस जोन में किसान कारवां को ऐसे कई प्रगतिशील किसान मिले जिन्होंने मंच से अपनी सफलता की कहानी साझा की. किसानों ने बताया कि आधुनिक तकनीक, बेहतर बाजार और सरकारी योजनाओं के सहारे उनकी आय में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है.
लखनऊ के मोहनलालगंज में किसान कारवां पहुंचा तो किसानों में भारी उत्साह देखने को मिला. यहां किसानों को खेती के साथ पशुपालन और उद्यान विभाग की योजनाओं की भी विस्तृत जानकारी दी गई.
जनपद के मुख्य पशु चिकित्सा अधिकारी डॉ. सुरेश कुमार ने बताया कि जिले में नंदिनी योजना और मिनी नंदिनी योजना का लाभ बड़ी संख्या में किसान उठा रहे हैं. किसान दूध उत्पादन के साथ-साथ गोबर से जैविक खाद बनाकर अपनी खेती की लागत घटा रहे हैं और मिट्टी की उर्वरता भी बढ़ा रहे हैं.
उन्होंने बताया कि एक लाभार्थी किसान ने नंदिनी योजना की मदद से न केवल अपनी पैदावार दोगुनी की बल्कि मिट्टी की गुणवत्ता में भी बड़ा सुधार किया.
ग्रामीण क्षेत्रों में ऐसे कई परिवार हैं जिनके पास न खेती है और न ही नियमित आय का कोई साधन. ऐसे परिवारों के लिए उत्तर प्रदेश सरकार की मुख्यमंत्री सहभागिता योजना मददगार साबित हो रही है.
अमेठी में पशुपालन विभाग के चिकित्सक डॉ. राज नारायण ने बताया कि इस योजना के तहत गौशाला से निराश्रित गोवंश लेकर उनका पालन करने वाले परिवारों को सरकार प्रति पशु ₹50 प्रतिदिन की सहायता देती है.
उन्होंने बताया कि यदि कोई परिवार 8 पशुओं का पालन करता है तो उसे लगभग ₹12 हजार प्रति माह की सहायता मिलती है, जिससे ग्रामीण परिवारों की आर्थिक स्थिति मजबूत हो रही है.
सेंट्रल प्लेन जोन में अब किसानों का रुझान बागवानी की ओर तेजी से बढ़ रहा है. उन्नाव, रायबरेली, सीतापुर और बाराबंकी जैसे जिलों में अमरूद और अन्य फलदार पौधों की खेती किसानों की आय का बड़ा स्रोत बन रही है.
उन्नाव के जिला कृषि अधिकारी शशांक चौधरी ने बताया कि जिले में अब अमरूद के बाग तेजी से बढ़ रहे हैं.पहले किसान गांव में ही ₹10 प्रति किलो के भाव पर फल बेचते थे, लेकिन अब हाईवे किनारे सीधे ग्राहकों को ₹60 प्रति किलो तक अमरूद बेच रहे हैं.इससे किसानों की आमदनी में कई गुना वृद्धि हुई है.
कन्नौज में किसान कारवां किसानों के लिए समस्या समाधान का मंच बन गया.यहां टमाटर उत्पादक किसानों ने बताया कि उनकी फसल खेत में ही सड़ने लगती है.
इस समस्या पर कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिक डॉ. सुशील कुमार ने किसानों को सलाह दी कि टमाटर की खेती बेड बनाकर करें.इससे जल निकासी बेहतर होगी और फसल सड़ने की समस्या कम होगी.
उन्होंने स्टेकिंग विधि अपनाने की भी सलाह दी, जिससे उत्पादन बढ़ेगा और फलों का आकार भी बेहतर होगा. वहीं मक्का किसानों को पौधों के बीच 15 से 20 सेंटीमीटर की दूरी रखने की सलाह दी गई ताकि बेहतर उत्पादन प्राप्त हो सके
कई किसान बिना वैज्ञानिक सलाह के दुकानदारों के कहने पर कीटनाशकों का अधिक मात्रा में उपयोग कर रहे हैं, जिससे फसल और स्वास्थ्य दोनों को नुकसान पहुंच रहा है.
हरदोई कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिक डॉ. पंकज कुमार नौटियाल ने किसानों को चेतावनी देते हुए बताया कि आम के बागों में लाल स्टीकर वाली दवाओं का प्रयोग बेहद खतरनाक हो सकता है.उन्होंने किसानों से ऐसी जहरीली दवाओं के प्रयोग से बचने और केवल वैज्ञानिक सलाह के अनुसार ही कीटनाशक उपयोग करने की अपील की.
किसान कारवां में केवल जानकारी ही नहीं, बल्कि मनोरंजन के माध्यम से भी किसानों को जागरूक किया गया.जादूगर ने अपने अनोखे अंदाज में किसानों को हंसाया भी और खेती-पशुपालन से जुड़ी महत्वपूर्ण बातें भी सरल भाषा में समझाईं.
रायबरेली के प्रगतिशील किसान यशवंत त्रिपाठी ने किसान कारवां की सराहना करते हुए कहा कि गांवों में इस तरह के कार्यक्रम किसानों के लिए बेहद लाभकारी हैं और इससे किसानों की सोच बदल रही है.
किसान कारवां के मंच से कृषि विशेषज्ञों ने हरित क्रांति के दौर की दिलचस्प कहानियां भी साझा कीं.
सीतापुर के इफको डीसीएम एस.सी. मिश्रा ने बताया कि एक समय ऐसा था जब किसान रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग करने को तैयार नहीं होते थे. उस समय अधिकारियों को रात में चोरी-छिपे किसानों के खेतों में उर्वरक डालना पड़ता था ताकि किसान उसके फायदे समझ सकें.
बाराबंकी के कृषि विशेषज्ञ एस.के. सिंह ने बताया कि लगभग 40 साल पहले किसानों को अनाज बेचने पर जबरदस्ती खाद भी दी जाती थी ताकि वे खेतों में उसका उपयोग कर उत्पादन बढ़ा सकें.
किसान कारवां ने सेंट्रल प्लेन जोन में खेती की बदलती तस्वीर को सामने लाने का काम किया है. यह मंच किसानों के लिए केवल जानकारी का माध्यम नहीं, बल्कि नई सोच, नई तकनीक और बेहतर भविष्य की उम्मीद बन चुका है.
खेती, पशुपालन, बागवानी, जैविक खाद, वैज्ञानिक सलाह और सरकारी योजनाओं की जानकारी से किसानों में नई ऊर्जा देखने को मिली. गांव-गांव पहुंचकर किसान कारवां अब किसानों की आवाज और उनके समाधान का सशक्त मंच बन चुका है.