इंडिगो बार्ब के बिना घर और होटल में रखा एक्वेरियम अधूरा माना जाता है. ऐसा कहा जाता है कि एक्वेरियम में चार चांद इंडिगो बार्ब से ही लगते हैं. इंडिगो बार्ब कलर फुल एक छोटी सी मछली होती है. और ये समुद्र में पाई जाती है. लेकिन इंडिगो बार्ब को अब समुद्र में पकड़ना आसान नहीं है. अब ये लगातार अपनी जगह बदलती रहती है. इंडिगो बार्ब की संख्या भी समुद्र में काफी कम हो गई है. फिशरीज एक्सपर्ट का कहना है कि अभी तक इंडिगो बार्ब पूरी तरह से समुद्र पर निर्भर थी.
इंडिगो बार्ब दिखने में एक बौनी मछली है. खास बात ये है कि एक उंगली से भी छोटी इंडिगो बार्ब पूरी तरह से बड़ी होने के बाद भी उंगली से भी छोटी नजर आती है. जैतून हरे और भूरे रंग के शरीर पर दो धारी वाली इंडिगो बार्ब की पहचान सजावटी मछली के रूप में है. ना सिर्फ देश में बल्कि इंटरनेशन मार्केट में भी इसकी खासी डिमांड है.
ये हैं इंडिगो बार्ब से जुड़ी खास बातें
- इंडिगो बार्ब को (पेथिया सेटनाई) नाम से भी जाना जाता है.
- केरल यूनिवर्सिटी के सहायक प्रोफेसर अनवर अली ने इंडिगो बार्ब पर रिसर्च की है.
- रिसर्च के लिए इंडिगो बार्ब गोवा के समुद्र से लाई गई थी.
- इंडिगो बार्ब इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर (आईयूसीएन) की रेड लिस्ट में है.
- ये वो लिस्ट है जहां लुप्त हो रहीं मछलियों की डिटेल रखी जाती है.
इन दो राज्यों में पाई जाती है इंडिगो बार्ब
- भारतीय इंडिगो बार्ब कर्नाटक और गोवा के मीठे पानी में पाई जाती है.
- रिसर्च के तहत इंडिगो बार्ब को बनाए गए तालाब में रखा गया.
- एआई तकनीक की मदद से इंडिगो बार्ब का प्रजनन कराया गया.
- इस दौरान बार्ब को आउटडोर और इनडोर दोनों ही वातावरण के तालाबों में रखा गया.
- इंडिगो बार्ब पर यूनिवर्सिटी की ये रिसर्च पूरी तरह से कामयाब रही है.
- जल्द ही इस रिसर्च की तकनीक दूसरे लोगों को इंडिगो बार्ब की संख्या बढ़ाने के लिए दी जाएगी.
- अनवर अली का मानना है कि इस कामयाबी से गोवा-कर्नाटक ही नहीं दूसरे राज्यों को भी होगा.
- मछलियों की हैचरी चलाने वालों को इस तकनीक का बड़ा फायदा होगा और रोजगार बढ़ेगा.
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