
बकरी के दूध की डिमांड बीते कुछ साल से ही बढ़ी है, जबकि बकरे-बकरियों को खासतौर पर मीट के लिए पाला जाता है. इसलिए ये जरूरी हो जाता है कि जो बकरे-बकरी पाले गए हैं उनकी तेजी से और अच्छी ग्रोथ हो. क्योंकि जिस बकरे की ग्रोथ अच्छी होगी तो उसका वजन भी बढ़ेगा. ग्रोथ के चलते ही बकरा तंदरुस्त भी नजर आएगा. बकरी पालकों की ख्वाहिश भी यही होती है कि उसके बकरे तंदरुस्त दिखें जिससे बाजार में उनके अच्छे दाम मिल जाएं. लेकिन इसके लिए ये जरूरी है कि बकरे-बकरियों का पेट सही रहे. क्योंकि गोट एक्सपर्ट के मुताबिक बकरे-बकरियों का पेट बहुत जल्दी-जल्दी खराब होता है.
पेट खराब होने की एक वजह जहां बकरे की खुराक है तो वहीं पीने का पानी भी बड़ी वजह में से एक है. अगर बकरे-बकरियों को पिलाया जा रहा पीने का पानी साफ नहीं है तो पशु के बीमार पड़ने और उत्पादन घटने की आशंका ज्यादा बढ़ जाती है. वहीं साफ-सफाई के साथ पानी नहीं पिलाया जा रहा है, पानी में मौजूद टीडीएस को कंट्रोल नहीं किया गया है तो भेड़-बकरियों का पेट खराब होना 100 फीसद तय मान लिजिए. जिसके चलते उनकी ग्रोथ भी तेजी से नहीं होगी.
गोट एक्सपर्ट ने पशुओं को पीने के पानी से जुड़ी टिप्स देते हुए कहा है कि हर संभव कोशिश की जाए कि पशुओं को ताजा पानी ही पीने के लिए दें. जैसे सुबह उस बर्तन या जगह से पानी को खाली कर दें जहां पशु पानी पीता है. पानी खाली करने के बाद उस बर्तन और जगह की अच्छी तरह से सफाई कर दें.
अगर पानी की उस जगह पर अल्गी और गंदगी लगी है तो उसे अच्छी तरह से साफ कर दें. जब ये लगे कि सफाई अच्छी तरह से हो गई है तो उसमे ताजा पानी भर दें. अगर सर्दियों का मौसम है तो एकदम ठंडा यानि खुले में रखा रात का पानी बिल्कुल भी न पिलाएं. नलकूप का निकला ताजा पानी ही पशुओं को पिलाएं.
जब पशुओं में पानी की कमी हो जाती है तो कई तरह के लक्षण से इसे पहचाना जा सकता है. जैसे पशुओं को भूख नहीं लगती है. सुस्ती और कमजोर हो जाना. पेशाव गाढ़ा होना, वजन कम होना, आंखें सूख जाती हैं, चमड़ी सूखी और खुरदरी हो जाती है और पशुओं का दूध उत्पादन भी कम हो जाता है. और सबसे बड़ी पहचान ये है कि जब हम पशु की चमढ़ी को उंगलियों से पकड़कर ऊपर उठाते हैं तो वो थोड़ी देर से अपनी जगह पर वापस आती है.
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