
लुधियाना में प्रोग्रेसिव डेयरी फार्म एसोसिएशन (PDFA) ज्यादा दूध देने वालीं गाय-भैंस का मेला आयोजित करती है. हर साल बड़ी संख्या में पशुपालक अपनी गाय-भैंस लेकर इस मेले में आते हैं. जहां तीन दिन तक ज्यादा से ज्यादा दूध देने की प्रतियोगिता चलती है. जीतने पर बड़े-बड़े इनाम भी मिलते हैं. इनाम जीतने वाली गाय-भैंस का दूध उत्पादन देखकर लोग दांतों तले उंगली दबा लेते हैं. और हो भी क्यों ना, आखिर हर एक पशुपालक की ये ख्वाहिश होती है कि उसकी गाय-भैंस ज्यादा से ज्यादा दूध दे.
हालांकि प्रतियोगिता में इनाम जीतने वाले पशुपालकों का कहना है कि गाय-भैंस से ज्यादा दूध लेना कोई मुश्किल काम नहीं है. जरूरत है बस उनकी देखभाल सही तरीके से की जाए और उनकी खुराक में जरूरत के हिसाब से सभी तरह की चीजों को शामिल किया जाए. प्रतियोगिता में 80 से 82 लीटर तक दूध देकर इनाम जीतने वाली गायों के पशुपालकों ने ज्यादा दूध उत्पादन के लिए कुछ जरूरी टिप्स दिए हैं.
मोगा, पंजाब के रहने वाले हरप्रीत प्रतियोगिता में कई बार पहला इनाम जीत चुके हैं. उन्होंने बताया कि उनके पास इस वक्त करीब 250 गाय हैं. इसमे से 150 के करीब दूध दे रही हैं. 15-20 ऐसी गाय हैं जो 70 लीटर और उससे ज्यादा दूध दे रही हैं. गायों के ज्यादा दूध देने के पीछे जो वजह है वो कोई एक नहीं है. इसमे हमने विदेशी मॉडल भी अपनाया है. जैसे हम हर वक्त गायों को खुला रखते हैं. फार्म पर गाय यहां-वहां आराम से घूमती रहती हैं.
इस दौरान उनके चारा खाने और पानी पीने पर कोई रोक-टोक नहीं होती है. सुबह ही ऑटोमैटिक गाड़ी चारा खाने वाली जगह पर चारा डाल दिया जाता है. एक गाय को करीब 70 किलो वजन तक की खुराक दिनभर में दी जाती है. इसमे हरा और सूखा चारा, दाना और मिनरल्स खाने को दिए जाते हैं. दिनभर पर चारा गायों के सामने रहता है. जब दिल करता है खाती हैं. और जब दिल करता है तो पानी पीती हैं. इसमे से शाम तक एक-दो फीसद चारा ही बचता है.
हरप्रीत का ये भी कहना है कि हम हरा चारा, सूखा चारा और मिनरल्स अलग-अलग खाने को नहीं देते हैं. मशीन से मिलाकर टोटल मिक्स राशन (टीएमआर) की शक्ल में गायों को उनकी खुराक दी जाती है. हम सालभर हरे चारे पर निर्भर नहीं रहते हैं. ज्यादातर हम मक्का के साइलेज का इस्तेमाल करते हैं. क्योंकि गाय खुल्ला घूमती हैं तो इसके चलते वो तनाव मुक्त रहती हैं. इससे दूध उत्पादन तो बढ़ता ही है, साथ में बीमारियां भी कम हो जाती हैं और दवाईयों की लागत ना के बराबर रह जाती है.
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