
बकरी पालन की बात करें तो ये सीधे तौर पर दूध और मीट के लिए किया जाता है. हालांकि कुछ वक्त पहले तक दूध की कम और मीट की डिमांड ज्यादा थी, लेकिन अभी दूध की डिमांड भी खूब बढ़ रही है. लेकिन इसके साथ ही बकरी पालन में जिसकी डिमांड बढ़ी है वो है बकरी के बच्चे. खासतौर से बकरे. सभी जानते हैं कि घरेलू बाजार में रोजाना भी मीट की डिमांड खासी है. साथ ही बकरीद और दुर्गा पूजा पर भी बकरों की बहुत डिमांड रहती है. बकरीद के दौरान तो करोड़ों की संख्या में बकरे बिक जाते हैं.
बहुत सारे ऐसे लोग हैं जो सिर्फ बकरीद के लिए दो-चार और 10 तक बकरे पालते हैं. ऐसे लोग दो से छह महीने की उम्र वाले छोटे बच्चे खरीदकर ले आते हैं और उन्हें एक साल की उम्र तक पालकर बकरीद पर बेच देते हैं. बकरीद पर कुर्बानी के लिए एक साल से कम उम्र का बकरा नहीं बिकता है. केन्द्रीय पशुपालन मंत्रालय की ओर से जारी आंकड़ों की मानें तों देश के कुल मीट उत्पादन में बकरे-बकरियों के मीट का 15 फीसद से ज्यादा का योगदान है.
गोट एक्सपर्ट का कहना है कि वैसे तो अपने इलाके के हिसाब से मौजूद बकरे और बकरियों की नस्ल पालनी चाहिए. क्योंकि वही नस्ल अच्छी तरह से ग्रोथ करेगी. लेकिन खासतौर पर मीट के लिए पसंद किए और पाले जाने बकरों की जो नस्ल हैं उसमे बरबरी, जमनापरी, जखराना, ब्लैक बंगाल, सुजोत प्रमुख रूप से हैं. इन्हें पालने से दोहरी इनकम होती है. क्योंकि बरबरी, जमनापरी और जखराना नस्ल की बकरियां दूध भी खूब देती हैं.
अभी तक होता यह था कि एक्सपोर्ट के दौरान बकरे के मीट की केमिकल जांच होती थी. कई बार ऐसा हुआ कि मीट कंसाइनमेंट लौटकर आए हैं. यह इसलिए होता था कि बकरों को जो चारा खिलाया जाता था उसमे कहीं न कहीं पेस्टीसाइड का इस्तेमाल हुआ होता था. लेकिन अब सीआईआरजी ने आर्गनिक चारा उगाना शुरू कर दिया है. इस चारे को बकरों ने भी खाया. लेकिन जब उनके मीट की जांच हुई तो वो केमिकल नहीं मिले जिनकी शिकायत पहले आती थी. इस पर हमारे संस्थान में और कई तरह की रिसर्च चल रही हैं.
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