
देसी नस्ल की गायों के बारे में माना जाता है कि ये ऐवरेज दूध देती हैं. पशुपालकों का ऐसा मानना है कि देसी नस्ल की गाय सामान्य तौर पर 8 से 10 किलो तक दूध देती हैं. यही वजह है कि बहुत सारे पशुपालक देसी नस्ल के मुकाबले विदेशी नस्ल की जर्सी और एचएफ गाय को पालना ज्यादा पसंद करते हैं. लेकिन, हाल ही में राजस्थान में हुए एक मिल्किंग कॉम्पिटिशन में गिर और साहीवाल नस्ल की गायों ने दूध देने का रिकॉर्ड तोड़ दिया है.
दोनों ही नस्ल की गायों ने 20 किलो से ज्यादा दूध उत्पादन किया है. NDDB डेयरी सर्विसेज ने हाल ही में रंगीलो मिल्किंग कॉम्पिटिशन का आयोजन किया था. ये नेशनल डेयरी डेवलपमेंट बोर्ड (NDDB) की मालिकाना हक वाली संस्था है. मिल्किंग कॉम्पिटिशन का आयोजन श्री करण नरेंद्र एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी, जोबनेर (राजस्थान) में किया गया था. दो दिन चले इस कॉम्पिटिशन में होल्स्टीन फ्रिजियन (HF) नस्ल की गाय ने 65 किलो दूध देकर रिकॉर्ड कायम किया है.
मिल्किंग कॉम्पिटिशन के आयोजन से जुड़े एक्सपर्ट का कहना है कि देसी नस्ल की बहुत सारी गायों ने मिल्किंग कॉम्पिटिशन में हिस्सा लिया था. जिसमें अजमेर, राजस्थान के रहने वाले डेयरी किसान मुकेश कुमार चौधरी की गिर नस्ल की गाय ने 26.78 किलो दूध दिया. इस कैटेगिरी में इस रिकॉर्ड को नया बेंचमार्क बताया जा रहा है. दूसरी नस्लों की बात करें तो उन्होंने भी भरपूर दूध दिया है. साहीवाल गाय 23 किलो, थारपारकर 14 किलो, राठी 18 किलो, जर्सी 37 किलो दूध देकर रिकॉर्ड कायम किया है. अगर भैंसों की बात करें तो मुर्रा भैंस ने 23 किलो दूध देकर भैंसों की कैटेगरी में सबसे ज़्यादा दूध उत्पादन किया है.
इस मौके पर NDDB के चेयरमैन डॉ. मीनेश शाह ने कहा, “रंगीलो सिर्फ एक कॉम्पिटिशन या एग्िबसबिशन नहीं है, यह साइंटिफिक डेयरी मैनेजमेंट को जमीनी स्तर तक लाने की एक कोशिश है. जब दूध का प्रोडक्शन ट्रांसपेरेंट और साइंटिफिक तरीकों से रिकॉर्ड किया जाता है, तो इससे किसानों का कॉन्फिडेंस बढ़ता है और उन्हें अपने जानवरों की असली क्षमता का अंदाज़ा लगाने में मदद मिलती है. हमारा मकसद किसानों की इनकम में लगातार बढ़ोतरी पक्का करने के लिए देसी और बेहतर दोनों नस्लों की प्रोडक्टिविटी को बेहतर बनाना है.”
रंगीलो की एक खास बात यह थी कि दूध प्रोडक्शन की रिकॉर्डिंग तीन साइंटिफिक स्टेज में की गई, जिससे ट्रांसपेरेंसी और क्रेडिबिलिटी पक्की हुई. इस प्रोसेस से पशुपालकों को अपने जानवरों की असली प्रोडक्टिव क्षमता को समझने और बेहतर मैनेजमेंट के फैसले लेने में मदद मिली.
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