El Nino के बीच चारा संकट से ऐसे बचें पशुपालक, ICAR के वैज्ञानिकों ने दिए अहम सुझाव

El Nino के बीच चारा संकट से ऐसे बचें पशुपालक, ICAR के वैज्ञानिकों ने दिए अहम सुझाव

अल नीनो के असर से कम बारिश और सूखे की आशंका के बीच पशुपालकों के सामने चारे का संकट खड़ा हो सकता है. ऐसे में ICAR के वैज्ञानिकों ने समय रहते अतिरिक्त हरे चारे को सुरक्षित रखने और फसल अवशेषों का बेहतर इस्तेमाल करने की सलाह दी है.

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अंक‍ित कुमार स‍िंह
  • Patna,
  • Aug 31, 2026,
  • Updated Aug 31, 2026, 1:32 PM IST

जलवायु परिवर्तन और बदलते मौसम के बीच पशुओं के लिए पूरे साल अच्छा चारा जुटाना मुश्किल होता जा रहा है. वहीं, इस साल अल नीनो के असर से बारिश कम हो सकती है, गर्मी बढ़ सकती है और लंबे समय तक सूखा पड़ सकता है. जिसके चलते  हरा चारा की कमी, चारागाह कमजोर और फसलों की पैदावार सीधा असर देखने को मिलेगा. भारत में पशुपालन काफी हद तक मौसमी हरे चारे, फसल अवशेष और चरागाह पर टिका है. भारतीय चरागाह एवं चारा अनुसंधान संस्थान के आकलन के अनुसार, देश में हरे चारे की करीब 11 प्रतिशत और सूखे चारे की करीब 23 प्रतिशत कमी पहले से है. सूखे दिनों में यह फासला और बढ़ सकता है. इसलिए सिर्फ चारे की मात्रा नहीं, उसकी समय पर उपलब्धता, पोषण और किसानों तक पहुंच भी देखनी होगी.

अतिरिक्त चारे को समय रहते बचाएं

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के पूर्वी अनुसंधान परिसर, पटना के वैज्ञानिक अभिषेक कुमार और नीति लखानी कहते हैं कि जब मौसम अनुकूल हो और हरा चारा ज्यादा हो, तब उसे बर्बाद ना होने दें. मक्का, ज्वार और कुछ चारा घासों से साइलेज बनाया जा सकता है. घास और दलहनी चारे को सुखाकर ‘हे’ (Hay) के रूप में रखा जा सकता है. सही समय पर कटाई, अच्छे से सुखाना और सुरक्षित भंडारण से चारे की गुणवत्ता बनी रहती है. सूखे के दिनों में यही बचा हुआ चारा काम आता है. इससे चरागाह पर दबाव कम होता है और महंगा चारा खरीदने की जरूरत भी घटती है. थोड़ी तैयारी पहले कर ली जाए तो पशु भूखे नहीं रहते.

फसल अवशेष से चारा बनाएं

वैज्ञानिकों के अनुसार, धान और गेहूं का भूसा, मक्का के अवशेष और दलहनी फसलों के पौधे चारे की कमी में बहुत काम आते हैं. इन्हें जलाने की बजाय इकट्ठा कर सही जगह रखें. कुट्टी करने से बर्बादी कम होती है और पशु चारा बेहतर खाते हैं. यूरिया उपचार और पोषक पूरक से भूसे की पाचनशक्ति और पौष्टिकता बढ़ाई जा सकती है. फसल अवशेष का सही इस्‍तेमाल खेत और पशु दोनों को जोड़ता है. पोषक तत्व फिर मिट्टी में लौटते हैं और लागत भी कुछ कम पड़ती है.

सूखा सहने वाली फसलें उगाएं

कम पानी और ज्यादा गर्मी सहने वाली चारा फसलों को बढ़ावा देना जरूरी है. एक ही फसल पर निर्भर रहने से जोखिम बढ़ता है. मक्का के साथ लोबिया जैसी मिश्रित खेती से ज्यादा चारा और बेहतर पोषण दोनों मिल सकते हैं. छोटी अवधि की फसलें खाली समय में भी लगाई जा सकती हैं. खेत की मेड़, सीमा और घर के आसपास भी चारा उगाया जा सकता है. समय पर बुवाई, नमी बचाने वाले उपाय और मल्चिंग से अल नीनो जैसे मौसम में भी कुछ उत्पादन बचाया जा सकता है.

चारा वृक्षों से मिलेगा सहारा

सुबबूल, ग्लिरिसिडिया, सेसबेनिया, अकेशिया और सहजन जैसे पेड़-झाड़ियां सूखे दिनों में हरा चारा और प्रोटीन दे सकते हैं. इन्हें मेड़, बाड़ और घर के पास लगाया जा सकता है, जिससे अनाज की जमीन कम नहीं होती. इनकी जड़ें गहरी होती हैं, इसलिए नीचे की नमी का इस्‍तेमाल कर पाती हैं. मौसमी फसलें जब सूख जाती हैं, तब ये पेड़ कुछ हरा चारा देते रहते हैं. घास और दलहन के साथ इनका मेल साल भर विविध चारा उपलब्ध करा सकता है और खेती को मौसम के झटके से कुछ बचाव भी मिलता है.

गांव स्तर पर चारा बैंक बनाएं

अभिषेक कुमार और नीति लखानी का सुझाव है कि अल नीनो से पहले ही गांव या समूह स्तर पर चारा बैंक बनाना फायदेमंद है. जब चारा ज्यादा हो, तब हे, भूसा और साइलेज इकट्ठा कर सुरक्षित रखें. जरूरत पड़ने पर यही भंडार काम आता है. पशुओं की साल भर की जरूरत का अनुमान पहले लगाएं और कम से कम कुछ भंडार जरूर रखें. मौसम की चेतावनी पर ध्यान दें और वैकल्पिक चारे की पहचान पहले कर लें. राहत के इंतजार से बेहतर है कि पहले से तैयारी हो. मात्रा के साथ चारे की क्‍वालिटी और संतुलित आहार पर भी ध्यान देना होगा. समय पर योजना और स्थानीय साधनों के सही इस्‍तेमाल से अल नीनो का असर काफी हद तक कम किया जा सकता है.

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