Bluetongue Disease: बरसात के दौरान छोटी भेड़-बकरियों को जल्दी चपेट में ले लेती है ये बीमारी

Bluetongue Disease: बरसात के दौरान छोटी भेड़-बकरियों को जल्दी चपेट में ले लेती है ये बीमारी

Bluetongue Disease नीली जीभ (ब्ल्यू टंग) बीमारी किसी एक भेड़ या बकरी को हुई तो उसके बाद पूरे झुंड को अपनी चपेट में ले लेती है. इस बीमारी का सीधा असर भेड़-बकरी के दूध और प्रजनन उत्पादन पर असर पड़ता है, वहीं बकरे की ग्रोथ भी रुक जाती है.

नासि‍र हुसैन
  • New Delhi,
  • Aug 03, 2026,
  • Updated Aug 03, 2026, 5:54 PM IST

बरसात का मौसम वैसे तो सभी तरह की भेड़-बकरियों के लिए परेशानियों से भरा होता है. लेकिन, खासतौर पर छोटी उम्र की भेड़-बकरियां इस मौसम में जल्दी बीमारियों की चपेट में आ जाती हैं. हालांकि इस मौसम में कई तरह की संक्रमण वाली बीमारियां होती हैं, लेकिन आमतौर नीली जीभ (ब्ल्यू टंग) जल्दी अटैक करती है. गोट-शीप एक्सपर्ट के मुताबिक ये बीमारी कम होती है, लेकिन बरसात के दिनों में इसके फैलन की संभावना ज्यादा बढ़ जाती है. और ये कम उम्र की भेड़-बकरियों को जल्दी शि‍कार बनती है. 

ये एक संक्रमण वाली बीमारी है. बीमारी के इलाज पर होने वाले खर्च के चलते इस बीमारी के होते ही पशुपालक की लागत बढ़ जाती है. एक्सपर्ट की मानें तो देश में भेड़-बकरियों के बीच ये तेजी से पनपने वाली बीमारी है. मच्छर की मदद से बीमारी का वायरस भेड़-बकरियों में फैलता है. और जल्द ही दूसरी हेल्दी भेड़ और बकरियों में भी फैल जाती है. ये वो बीमारी है जो भेड़-बकरी पालकों के मुनाफे को कम कर देती है. 

ऐसे पता चलेगी नीली जीभ बीमारी

  • बुखार और निमोनिया का होना. 
  • उदास रहना और खाना खाना. 
  • नाक-मुंह की श्लेष्मा झिल्ली का लाल होना और सूजन आना.
  • नाक और मुंह से लगातार लार टपकना. 
  • होठों, मसूड़ों, मुख म्यूकोसा और जीभ पर सूजन आना. 
  • भेड़-बकरी की जीभ का नीला पड़ना.
  • गर्दन का एक ओर झुकना (टेढ़ी गर्दन).
  • पैरों में लंगड़ापन आने के चलते ठीक से ना चलना. 
  • बॉडी पॉर्टस की कोरोनरी बैंड का लाल होना और सूजन आना. 
  • कंजंक्टिवल श्लेष्मा झिल्ली पर जमाव और पलकों का उलझना.
  • पीडि़त भेड़-बकरी द्वारा बदबूदार दस्त का करना. 
  • सांस लेने में परेशानी होना और खर्राटे लेना. 

ये है नीली जीभ बीमारी का इलाज 

  • बीमार पशुओं को अलग रखा जाना चाहिए.
  • बीमारी से प्रभावित पशुओं को सूरज की रोशनी से दूर रखें. 
  • पीडि़त पशु को पूरा आराम करने दें. 
  • पीडि़त पशुओं को चावल, रागी और कंबू से बना दलिया खिलाना चाहिए.
  • छालों वाली जगह पर ग्लिसरीन या एनिमल फैट लगाएं.
  • घरेलू उपचार के साथ पास के पशु चिकित्सक से सलाह लेते रहें. 
  • पीडि़त पशुओं को चराने के लिए ना ले जाएं. 
  • एक लीटर पानी में घोले गए पोटेशियम परमैंगनेट से दिन में दो-तीन बार पशुओं का मुंह धोएं.
  • पीडि़त पशु के टीकाकरण के लिए पशु चिकित्सक से सलाह लें. 

ऐसे होती है नीली जीभ बीमारी 

  • भेड़-बकरी के मेमनों को जब सही मात्रा में कोलोस्ट्रम पीने को नहीं मिलता है. 
  • खासतौर पर बरसात और अक्टूबर, नवम्बर और दिसम्बर के महीनों में शेड में गंदगी होने से. 
  • ये बीमारी आर्थ्रोपोडा जनित ऑर्बी वायरस के कारण होती है, जो मच्छर की खास प्रजाति है. 
  • क्यूलिकोइड्स वंश का काटने वाला कीड़ा पशु का रक्त चूसते समय वायरस फैलाता है. 
  • मच्छर और अन्य बाह्य परजीवी जैसे शीप केड, मेलोफैगस ओविनस भी इस बीमारी को फैलाते हैं.
  • गर्मियों का खत्म होने वाला वक्त और सर्दी की शुरुआत का वक्त इन्हें पनपने का मौका देता है.  
  • वीर्य और प्लेसेंटा के रास्ते ये तेजी से फैलता है इसलिए सफाई का खास ख्याल रखें.

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