Blue Tongue: बरसात के मौसम में जानलेवा होती है भेड़-बकरियों के लिए ये बीमारी 

Blue Tongue: बरसात के मौसम में जानलेवा होती है भेड़-बकरियों के लिए ये बीमारी 

Blue Tongue एक बार नीली जीभ (ब्ल्यू टंग) बीमारी किसी एक भेड़ या बकरी को हुई तो उसके बाद दूसरी हेल्दी भेड़ और बकरियां भी इसकी चपेट में जाती हैं. ये वो बीमारी है जो भेड़-बकरी पालकों के मुनाफे को कम कर देती है. इसके चलते जहां भेड़-बकरी के दूध और प्रजनन उत्पादन पर असर पड़ता है, वहीं बकरे की ग्रोथ भी रुक जाती है.

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नासि‍र हुसैन
  • New Delhi,
  • Jun 29, 2026,
  • Updated Jun 29, 2026, 12:39 PM IST

दो दिन बाद जुलाई का महीना शुरू हो जाएगा. ये वो महीना है जब मौसम बदलता है. यानि की गर्मी के बाद बारिश का मौसम. लेकिन इसी के साथ उमस भी शुरू हो जाती है. एनिमल एक्सपर्ट की मानें तो इस तरह का मौसम पशुओं को बीमार करने वाला होता है. खासतौर से छोटे पशु जैसे भेड़-बकरियां एक खास बीमारी नीली जीभ (ब्ल्यू टंग) की चपेट में आ जाते हैं. नीली जीभ बीमारी के बरसात के दिनों में फैलने की संभावनाएं ज्यादा रहती हैं. ये जानलेवा बीमारी कम उम्र की भेड़-बकरियों को जल्दी शि‍कार बनती है. 

भेड़-बकरी के बीच वैसे तो बहुत सारी बीमारियां आम हैं. लेकिन बरसात के दिनों में होने वालीं बीमारियां जानलेवा होती हैं. बीमारी के इलाज पर होने वाले खर्च के चलते पशुपालक की लागत भी बढ़ जाती है. एक्सपर्ट की मानें तो भेड़-बकरियों के बीच ये बीमारियां तेजी से पनपती हैं. इसमे कुछ बीमारियां ऐसी हैं जो संक्रमण से फैलती हैं. इसी तरह नीली जीभ बीमारी का वायरस मच्छर की मदद से भेड़-बकरियों में फैलता है. 

ये लक्षण बताएंगे नीली जीभ बीमारी हुई है

  • बुखार और निमोनिया का होना. 
  • उदास रहना और खाना खाना. 
  • नाक-मुंह की श्लेष्मा झिल्ली का लाल होना और सूजन आना.
  • नाक और मुंह से लगातार लार टपकना. 
  • होठों, मसूड़ों, मुख म्यूकोसा और जीभ पर सूजन आना. 
  • भेड़-बकरी की जीभ का नीला पड़ना.
  • गर्दन का एक ओर झुकना (टेढ़ी गर्दन).
  • पैरों में लंगड़ापन आने के चलते ठीक से ना चलना. 
  • बॉडी पॉर्टस की कोरोनरी बैंड का लाल होना और सूजन आना. 
  • कंजंक्टिवल श्लेष्मा झिल्ली पर जमाव और पलकों का उलझना.
  • पीडि़त भेड़-बकरी द्वारा बदबूदार दस्त का करना. 
  • सांस लेने में परेशानी होना और खर्राटे लेना. 

नीली जीभ बीमारी का ऐसे करें इलाज  

  • बीमार पशुओं को अलग रखा जाना चाहिए.
  • बीमारी से प्रभावित पशुओं को सूरज की रोशनी से दूर रखें. 
  • पीडि़त पशु को पूरा आराम करने दें. 
  • पीडि़त पशुओं को चावल, रागी और कंबू से बना दलिया खिलाना चाहिए.
  • छालों वाली जगह पर ग्लिसरीन या एनिमल फैट लगाएं.
  • घरेलू उपचार के साथ पास के पशु चिकित्सक से सलाह लेते रहें. 
  • पीडि़त पशुओं को चराने के लिए ना ले जाएं. 
  • एक लीटर पानी में घोले गए पोटेशियम परमैंगनेट से दिन में दो-तीन बार पशुओं का मुंह धोएं.
  • पीडि़त पशु के टीकाकरण के लिए पशु चिकित्सक से सलाह लें. 

ऐसे होती है नीली जीभ बीमारी

  • भेड़-बकरी के मेमनों को जब सही मात्रा में कोलोस्ट्रम पीने को नहीं मिलता है. 
  • खासतौर पर बरसात और अक्टूबर, नवम्बर और दिसम्बर के महीनों में शेड में गंदगी होने से. 
  • ये बीमारी आर्थ्रोपोडा जनित ऑर्बी वायरस के कारण होती है, जो मच्छर की खास प्रजाति है. 
  • क्यूलिकोइड्स वंश का काटने वाला कीड़ा पशु का रक्त चूसते समय वायरस फैलाता है. 
  • मच्छर और अन्य बाह्य परजीवी जैसे शीप केड, मेलोफैगस ओविनस भी इस बीमारी को फैलाते हैं.
  • गर्मियों का खत्म होने वाला वक्त और सर्दी की शुरुआत का वक्त इन्हें पनपने का मौका देता है.  
  • वीर्य और प्लेसेंटा के रास्ते ये तेजी से फैलता है इसलिए सफाई का खास ख्याल रखें.

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