
छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले के सीतापुर विकासखंड के ग्राम चलता निवासी दयासागर ने तकनीकी मार्गदर्शन और वैज्ञानिक पशुपालन को अपनाकर अपने पारंपरिक गौपालन को बेहतर आय के साधन में बदलने की दिशा में कदम बढ़ाया है.पशुपालन विभाग की सलाह पर उन्होंने कृत्रिम गर्भाधान (एआई) के जरिए नस्ल सुधार कराया. इसके साथ ही पशुओं के पोषण, देखभाल और प्रबंधन पर ध्यान दिया.इसका असर उनके दुग्ध उत्पादन पर दिखाई देने लगा है.
दयासागर कई वर्षों से देसी गायों का पालन कर रहे थे. पशुपालन विभाग के अधिकारियों और मैदानी अमले ने उन्हें कृत्रिम गर्भाधान के माध्यम से नस्ल सुधार की जानकारी दी. विभाग की सलाह पर उन्होंने अपनी गायों में एआई कराया. इसके बाद उन्हें बेहतर नस्ल के बछड़े-बछिया प्राप्त हुए.वर्तमान में उनके पास एचएफ, गिर और साहीवाल जैसी नस्लों की गायें भी हैं.
नस्ल सुधार के साथ दयासागर ने पशुओं की बेहतर देखभाल, पोषण और प्रबंधन पर भी विशेष ध्यान दिया. इसका सकारात्मक असर दूध उत्पादन पर पड़ा.उनके अनुसार, वर्तमान में उनके यहां प्रतिदिन करीब 15 से 20 लीटर दूध का उत्पादन हो रहा है.इससे नियमित आमदनी बढ़ी है और परिवार के दैनिक खर्चों को पूरा करने के साथ बचत करना भी संभव हो रहा है.
दयासागर बताते हैं कि पहले वे मुख्य रूप से देसी गायों का पालन करते थे.विभागीय अधिकारियों की सलाह पर एआई तकनीक अपनाने के बाद उन्हें अच्छी नस्ल के पशु मिले. समय-समय पर मिलने वाले विभागीय मार्गदर्शन से पशुओं की देखभाल और प्रबंधन में भी सुविधा हुई है.
दयासागर अब केवल नस्ल सुधार ही नहीं, बल्कि वैज्ञानिक तरीके से पशुपालन, बेहतर पोषण और पशु प्रबंधन को भी अपना रहे हैं.उनका अनुभव बताता है कि सही नस्ल, उचित देखभाल और विशेषज्ञों की सलाह से पशुपालन से नियमित आय बढ़ाई जा सकती है.उनकी कहानी ग्रामीण क्षेत्रों में तकनीकी मार्गदर्शन और पशुपालन विभाग की सेवाओं के उपयोग से पारंपरिक आजीविका को अधिक व्यवस्थित और आयकारी बनाने की संभावना को दिखाती है. नस्ल सुधार के साथ बढ़ा दुग्ध उत्पादन दयासागर के परिवार की आर्थिक स्थिति को मजबूत करने में सहायक बना है.
दयासागर के पशुपालन में बदलाव की अहम कड़ी कृत्रिम गर्भाधान (एआई) के जरिए नस्ल सुधार रही. पशुपालन विभाग की सलाह पर उन्होंने अपनी गायों में एआई कराया, जिससे बेहतर नस्ल के बछड़े-बछिया प्राप्त हुए. वर्तमान में उनके पास एचएफ, गिर और साहीवाल जैसी नस्लों की गायें हैं. नस्ल सुधार के साथ पशुओं के पोषण और देखभाल पर ध्यान देने से उनके यहां दूध उत्पादन करीब 15 से 20 लीटर प्रतिदिन तक पहुंचा है.
दयासागर का अनुभव बताता है कि नस्ल सुधार, संतुलित पोषण, उचित देखभाल और विशेषज्ञों का मार्गदर्शन पशुपालन को अधिक लाभकारी बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं. अब वे अपने अनुभव के जरिए दूसरे ग्रामीणों को भी वैज्ञानिक तरीके से पशुपालन अपनाने के लिए प्रेरित कर रहे हैं.