अल नीनो की मार, कई फसलें बर्बादी की कगार परबारिश की कमी और अधिक तापमान ने खरीफ सीजन की प्रमुख फसलों पर संकट बढ़ा दिया है. कपास, सोयाबीन और दलहन की खेती करने वाले किसान सबसे ज्यादा परेशान नजर आ रहे हैं. खासकर महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश के कई इलाकों में किसान फसलों की कमजोर बढ़वार और रोग-कीट की समस्या से जूझ रहे हैं. चिंता यह भी है कि मॉनसून अपने अंतिम दौर में पहुंच चुका है. ऐसे में किसानों को फसलों को दोबारा संभालने लायक पर्याप्त बारिश की उम्मीद कम होती दिखाई दे रही है.
किसानों के लिए संकट सिर्फ मौजूदा फसल तक सीमित नहीं है. पिछली उपज का बेहतर भाव नहीं मिलने की शिकायत के बाद अब नई फसल के उत्पादन और क्वालिटी को लेकर चिंता पैदा हो गई है. ऐसे में कपास, सोयाबीन और दलहन की खेती करने वाले किसानों को एक साथ दो मोर्चों पर नुकसान का सामना करना पड़ सकता है.
इन फसलों का उत्पादन प्रभावित होने की आशंका व्यापक स्तर पर भी चिंता बढ़ा रही है. सोयाबीन देश की प्रमुख तिलहन फसल है तो तुअर दाल की घरेलू खपत में महत्वपूर्ण भूमिका है. कपास भी किसानों की प्रमुख नकदी फसलों में शामिल है. उत्पादन में बड़ी गिरावट घरेलू उपलब्धता और आयात की जरूरतों को प्रभावित कर सकती है.
महाराष्ट्र के प्रमुख कपास उत्पादक क्षेत्रों में शामिल अकोला में स्थिति चिंताजनक बताई जा रही है. यहां के किसान विट्ठल पाटील ने 'किसान तक' को बताया कि कम बारिश ने उनकी कपास की फसल को बुरी तरह प्रभावित किया है.
पाटील के मुताबिक उन्होंने करीब 10 एकड़ क्षेत्र में कपास लगाया है और प्रति एकड़ लगभग 22 हजार रुपये के हिसाब से अब तक करीब 2.20 लाख रुपये खर्च कर चुके हैं. मौजूदा फसल की हालत को देखते हुए उन्हें एक लाख रुपये की कमाई भी मुश्किल लग रही है.
उनका कहना है कि इस समय तक कपास के पौधों की लंबाई करीब पांच फीट तक होनी चाहिए थी, लेकिन उनके खेत में पौधे महज दो से ढाई फीट तक पहुंच पाए हैं. पौधों पर एक-दो फूल ही दिखाई दे रहे हैं और उनकी स्थिति भी स्वस्थ नहीं है. इससे उत्पादन में बड़ी गिरावट की आशंका है.
मध्य प्रदेश के बुरहानपुर में भी कपास की खेती करने वाले किसान ऐसी ही परेशानी बता रहे हैं. किसान सुनील महाजन के अनुसार उन्होंने अच्छी पैदावार की उम्मीद में कपास लगाया था, लेकिन कम बारिश और अधिक तापमान के कारण फसल की बढ़वार रुक गई है.
उनके मुताबिक कपास की फसल अभी करीब दो फीट तक ही बढ़ सकी है, जबकि सामान्य परिस्थितियों में इसे लगभग पांच फीट तक पहुंच जाना चाहिए था. किसानों की कोशिश पंप के माध्यम से सिंचाई कर फसल बचाने की है, लेकिन इससे भी उचित फायदा नहीं मिल रहा है.
इस स्थिति ने किसानों की लागत को लेकर चिंता बढ़ा दी है. कपास नकदी फसल है और इसकी खेती में बीज, खाद, कीटनाशक, मजदूरी और सिंचाई पर अच्छी-खासी रकम खर्च होती है. उत्पादन घटने की स्थिति में किसानों के लिए लागत निकालना मुश्किल हो सकता है.
बारिश की कमी का असर केवल कपास तक सीमित नहीं है. प्रमुख तिलहन फसल सोयाबीन भी इसकी चपेट में है. मध्य प्रदेश के रायसेन कृषि विज्ञान केंद्र के हेड स्वनील दुबे के अनुसार सोयाबीन में रोग और कीटों का प्रकोप बढ़ा है. कई जगह फसल में येलो मोजैक की समस्या देखी जा रही है.
दुबे के मुताबिक कम पानी और अधिक तापमान जैसी परिस्थितियों में रोग और कीट फसल को अधिक नुकसान पहुंचा सकते हैं. उनका सुझाव है कि बदलती मौसमी परिस्थितियों को देखते हुए किसानों को मक्का जैसी उन फसलों पर भी ध्यान देना चाहिए जो अपेक्षाकृत कम पानी में पैदा की जा सकती हैं और प्रतिकूल परिस्थितियों को बेहतर तरीके से सहन कर सकती हैं.
सोयाबीन के उत्पादन में संभावित कमी इसलिए भी अहम है क्योंकि इसका सीधा संबंध खाद्य तेल क्षेत्र से है. यदि घरेलू उत्पादन में बड़ी गिरावट आती है तो उद्योग की आयात पर निर्भरता बढ़ सकती है.
सोयाबीन प्रोसेसर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया यानी SOPA के अध्यक्ष डीएन पाठक ने 'किसान तक' को बताया कि महाराष्ट्र के हर क्षेत्र में नुकसान की स्थिति एक जैसी नहीं है. हालांकि मराठवाड़ा और विदर्भ के कई इलाकों में सोयाबीन की फसल को गंभीर नुकसान हुआ है.
उनके मुताबिक जिन फसलों को बहुत अधिक नुकसान हो चुका है, उनके पूरी तरह से सुधरने की संभावना कम है. हालांकि कुल उत्पादन में कितनी गिरावट आएगी, इस पर अभी स्पष्ट आकलन करना जल्दबाजी होगी.
सोया तेल की कीमतों पर तुरंत कितना असर पड़ेगा, यह भी अभी स्पष्ट नहीं है. पाठक का मानना है कि उत्पादन और बाजार की परिस्थितियों को देखते हुए अगले साल सोया तेल के भाव पर दबाव दिखाई दे सकता है.
महाराष्ट्र में कपास और सोयाबीन के अलावा तुअर की फसल को लेकर भी किसान चिंतित हैं. तुअर देश की प्रमुख दलहन फसलों में शामिल है और इसकी कीमतें अक्सर बाजार में चर्चा का विषय रहती हैं.
यदि प्रमुख उत्पादक क्षेत्रों में तुअर की पैदावार प्रभावित होती है तो घरेलू मांग पूरी करने के लिए आयात की जरूरत बढ़ सकती है. इससे एक तरफ आयात खर्च बढ़ने का जोखिम होगा, वहीं दूसरी तरफ घरेलू बाजार में दालों की कीमतों पर भी नजर रखनी होगी.
मौजूदा हालात ने किसानों के सामने दोहरी चुनौती खड़ी कर दी है. एक तरफ खरीफ की नई फसल बारिश की कमी और प्रतिकूल मौसम से जूझ रही है, दूसरी ओर किसानों की शिकायत है कि पिछली फसल में भी उन्हें उपज का अपेक्षित भाव नहीं मिला.
कपास, सोयाबीन और दलहन जैसी फसलों की खेती में किसान बड़ी रकम लगाते हैं. बेहतर पैदावार के साथ अच्छा बाजार भाव मिलने पर ही उनकी लागत और आमदनी का गणित संतुलित हो पाता है. लेकिन यदि उत्पादन और कीमत दोनों मोर्चों पर नुकसान होता है तो इसका सीधा असर किसान की आय पर पड़ता है.
फिलहाल सबसे बड़ी निगाह मौसम पर है. अगर प्रभावित क्षेत्रों को पर्याप्त बारिश नहीं मिलती और फसल की स्थिति में सुधार नहीं आता, तो किसानों की परेशानी आगे और बढ़ सकती है. इसका असर केवल खेत तक सीमित नहीं रहेगा. सोयाबीन और तुअर जैसी फसलों के उत्पादन में बड़ी कमी अंततः खाद्य तेल और दालों की घरेलू उपलब्धता, आयात और बाजार कीमतों के समीकरण को भी बिगाड़ सकती है.
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