जुलाई में अचानक क्यों थम गई बारिश? समझिए मॉनसून ब्रेक, अल नीनो और फसलों पर असर

जुलाई में अचानक क्यों थम गई बारिश? समझिए मॉनसून ब्रेक, अल नीनो और फसलों पर असर

जुलाई की शुरुआत में अच्छी बारिश के बाद अचानक मॉनसून की रफ्तार थम गई है, जिससे किसानों और आम लोगों की चिंता बढ़ गई है. मौसम विभाग के अनुसार यह मॉनसून का सामान्य "ब्रेक फेज" है, जब मानसूनी ट्रफ पहाड़ी क्षेत्रों की ओर खिसक जाती है और मैदानी इलाकों में बारिश कम हो जाती है. हालांकि अगले कुछ दिनों में उत्तर-पश्चिम भारत में फिर से बारिश की संभावना जताई गई है.

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जुलाई में अचानक क्यों थम गई बारिश? समझिए मॉनसून ब्रेक, अल नीनो और फसलों पर असरमॉनसून ब्रेक खरीफ फसलों के लिए घातक साबित हो रहा है

अचानक से बरसता मॉनसून कहां चला गया? जुलाई में बारिश की रफ्तार पर क्यों ब्रेक लग गया? क्या ये अल नीनो का असर है या फिर से सूखा पड़ने वाला है? मॉनसून पर लगा ये ब्रेक फसलों के लिए कितना नुकसानदायक होगा? ये सभी सवाल लोगों को परेशान कर रहे हैं क्योंकि बारिश नहीं होगी तो मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ेगा. पिछले हफ्ते का मौसम देखें तो शानदार बारिश हुई जिससे लगा कि देर से ही सही लेकिन मॉनसून जब आया तो झूमकर बरसा. किसानों को लगा कि उनकी फसलों की बंपर पैदावार होगी.

किन दो दिन में ही ये चिलचिलाती धूप निकल आई. भीषण गर्मी के साथ उमस. ऐसा लगता है कि जैसे मई जून फिर से लौट आया हो. सवाल है कि बारिश अचानक से कहां चली गई. मॉनसून पर ये ब्रेक क्यों लगा?

जुलाई की बारिश से रिकवरी नहीं

मौसम विभाग के मुताबिक मॉनसून में बारिश अक्सर स्पेल में यानी कि अलग अलग अवधि में होती है. 2 जुलाई से 9 जुलाई तक अच्छी बारिश हुई, फिर ब्रेक हो गया. वजह ये है कि जब मॉनसून साउथ में रहता है तो भारत के मैदानी क्षेत्रों में अच्छी बारिश होती है फिर मॉनसून पहाड़ों की तरफ खिसकता है तो बारिश रुक जाती है. मौमस विभाग के मुताबिक अभी यही स्थिति है. अब सवाल है कि आगे बारिश कब होगी, तो मौसम विभाग बता रहा है कि अगले 5 दिनों तक बारिश की संभावना नहीं है. लेकिन 19 जुलाई से से दोबारा उत्तर पश्चिम भारत यानी कि पंजाब, हरियाणा, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, जम्मू कश्मीर में बारिश की पूरी संभावना है.

इस बारे में मौसम वैज्ञानिक डॉ. शशिकांत बताते हैं कि यह ब्रेक कोई असाधारण घटना नहीं है. जब मॉनसून साउथ में रहता है, तो भारत के मैदानी क्षेत्रों में अच्छी खासी बारिश देखने को मिलती है. और जैसे ही ये नॉर्थ की तरफ जाता है, तो बारिश रुक जाती है. 14 जुलाई की स्थिति की बात करें तो मॉनसून का जम्मू, देहरादून, बारांबकी से प. बंगाल में जा रहा है. यानी जो पश्चिमी सिरा है वो सामान्य तौर पर पहाड़ों पर है. इससे पहाड़ी क्षेत्र, जम्मू, उत्तराखंड, हिमाचल में बारिश होती है. लेकिन सवाल है कि इससे नुकसान कितना हुआ. अब इसे भी समझिए.

जून में बारिश की 40 परसेंट कमी थी. फिर जुलाई के पहले हफ्ते में अच्छी बारिश हुई तो ये कमी घटकर अब 19 परसेंट रह गई है. यानी 21 परसेंट की रिकवरी हुई है. ये उम्मीद थी कि जुलाई में ठीक ठाक बारिश होगी तो ये पूरी कमी कवर हो जाएगी. लेकिन ऐसा नहीं हुआ.

कम बारिश से पिछड़ी फसलों की बुवाई

अब सवाल है कि कहीं ये पूरा डेफिसिट (कमी) बढ़ता ना चला जाए क्योंकि बारिश कम होने का मतलब है कि सबकुछ कम होना. ये पूरा का पूरा एक दुश्चक्र है, जो सबको प्रभावित करता है. एक्सपर्ट बता रहे हैं कि इसका लंबा असर देश की जीडीपी पर पड़ सकता है. ये समझने से पहले आप ये जानिए कि कैसे कम बारिश फसलों पर असर डाल रही है. आम तौर पर जुलाई से सितंबर के सीजन में खरीफ की फसल 1104 लाख हेक्टेयर में बोई जाती है. 2025 में 10 जुलाई तक 632 लाख हेक्टेयर पर फसल की बुवाई हुई थी जो 2026 में 16% घटकर सिर्फ 531 लाख हेक्टेयर रह गई. सबसे ज्यादा असर दलहनों पर हुआ.

2025 की तुलना में किसानों ने दालों की 23% कम बुवाई की है. इसी तरह से मोटे अनाज की 22% कम, तिलहन की 21 परसेंट कम, कपास की 15 परसेंट कम और धान की 9 परसेंट कम बुवाई की है. खरीफ में ज्यादातर ऐसी फसलें हैं, जिनमें ज्यादा पानी की जरूरत होती है. और पानी बरस ही नहीं रहा तो किसान इन फसलों की बुवाई ही नहीं कर पा रहे हैं. सरकार खुद किसानों को सलाह दे रही है कि किसान अब कम अवधि वाली फसलों को प्राथमिकता दें.

जुलाई की अच्छी बारिश से अब बुवाई की संभावना बढ़ गई है. पिछले साल इस समय तक 442 लाख 80 हजार हेक्टेयर में बुवाई हुई थी. लेकिन अभी धीमी चल रही है. मॉनसून में देरी के कारण, तुअर, सोयाबीन और कपास की बुवाई पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है. किसानों को सलाह है कि अब मक्का, बाजरा और मूंग वाली कम अवधि वाली फसलों को प्राथमिकता दें. सरकार की किसानों को दी गई ये राय भी बता रही है कि हालात ठीक नहीं हैं. एक्सपर्ट बता रहे हैं कि इसका सीधा असर देश के जीडीपी पर पड़ सकता है. अगर मॉनसून में ठीक से बारिश नहीं हुई तो महंगाई भी बढ़ सकती है.

अल नीनो पर क्या कहते हैं वैज्ञानिक

जलवायु वैज्ञानिक प्रो. एस के ढाका कहते हैं, मॉनसून में बारिश कम होती है तो दलहनों पर इसका प्रभाव पड़ेगा. प्रोडक्शन कम होगा तो जीडीपी पर असर होगा. 17-18 परसेंट कृषि से आता है और 40 परसेंट की वर्कफोर्स पर निर्भर है. तो इन चीजों को ध्यान में रखकर देखें तो महंगाई बढ़ेगी तो 4-5 परसेंट बढ़ सकती है. लंबा चेन रिएक्शन शुरू होगा. मॉनसून की कमी बड़ा प्रभाव डालने वाली है.

यानी मॉनसून में कम बारिश बहुत ज्यादा नुकसान दायक हो सकती है. बारिश कम मतलब, फसल कम, मतलब तिलहन, दलहन आयात करना पड़ेगा. लेकिन क्या ये कम बारिश अल नीनो की वजह से हो रही है. अल नीनो के साथ आपको एक और टर्म समझना होगा, इंडियन ओशन डायपोल यानी IOD.

दरअसल दुनिया भर के वैज्ञानिकों की नजर इस समय प्रशांत महासागर में बन रहे अल नीनो सिस्टम और इंडियन ओशन डायपोल यानी IOD पर है. अल नीनो यानी पूर्व में प्रशांत महा सागर की सतह गर्म चलने वाली हवाओं के चक्र से दुनिया भर के मौसम पर होने पर असर और इंडियन ओशन डायपोल की स्थिति ये तय करेगी कि भारत में मॉनसून कैसा होगा. वैज्ञानिक कह चुके हैं की प्रशांत महासागर में अल नीनो की स्थिति उत्पन्न हो गई है जिसका असर एशिया प्रायद्वीप में सितंबर महीने के बाद दिखना शुरू हो सकता है. लेकिन हिंद महासागर में आयओडी की स्थिति क्या होगी, इस पर स्पष्टता आने में अभी महीने भर के समय और लग सकता है.

इंडियन ओशन डायपोल अगर पॉजिटिव है, तो बारिश अच्छी होती है. भारत के दक्षिण पश्चिम में सैकड़ों किलोमीटर दूर अफ्रीका के पास अगर समंदर की सतह गर्म है तो वही द. पूर्व इंडोनेशिया के पास समंदर की सतह ठंडी है, तो इसे पॉजिटिव इंडियन ओशन डायपोल कहा जाता है. क्योंकि इसी हिंद महासागर के ऊपर से नमी लेकर हवाएं अरब सागर के ऊपर से अतिरिक्त नमी इकट्ठा करके भारत में प्रवेश करती हैं, तो मॉनसून को मजबूती मिलती है. लेकिन इस बार प्रशांत महासागर की गर्म सतह अल नीनो का खतरा लेकर के आ रही है, तो सवाल इस बात पर है कि क्या ये आयओडी संकट दूर हो सकता है. इसका जवाब 1997 और 2023 में जवाब मिलता है.

अल नीनो से कहां कितना नुकसान?

एक्सपर्ट ये मान रहे हैं कि देश को अल नीनो के प्रभाव के लिए तैयार रहना चाहिए. भले ही उसका असर सितंबर के बाद महसूस किया जाएगा. लेकिन अगर अल नीनो आया तो फिर सूखा ही सूखा है. एक्सपर्ट पूरी तैयारी करने को कह रहे हैं. यूनिवर्सिटी ऑफ मैरीलैंड के मौसम वैज्ञानिक डॉ. रघु मुर्तुगुड्डे बताते हैं, मौसम विभाग की भविष्यवाणियां हफ्तों और महीनों के लिए आती रहेंगी और सरकार और प्राइवेट सेक्टर संकट का प्रबंधन करने के लिए इनका इस्तेमाल करेंगे, जैसे कि खाना, ऊर्जा, पानी वगैरह वगैरह. लेकिन जैसे ही ये आएगा हमें इसके साथ ही काम चलाना होगा. सबसे खराब स्थिति के लिए तैयार रहें, अच्छे की उम्मीद करें, लेकिन संसाधनों और आपदाओं के संभालने के लिए चेतावनियों को देखते रहें, ताकि जीवन की, जानवरों की, कारोबार की और आपकी संपत्तियों की रक्षा हो सके. इस साल यही करना है.

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