मॉनसून की विदाई शुरू (AI Image)मॉनसून अब उत्तर-पश्चिम भारत से वापस लौटने लगा है. ऐसे में सीजन के आखिरी दिनों में पूर्वी और मध्य भारत में ज्यादा बारिश होने की संभावना है. Dolat Capital की एक रिपोर्ट के मुताबिक, बंगाल की खाड़ी में बना कम दबाव का क्षेत्र भी पूर्वी तट की ओर बढ़ रहा है, जिससे आने वाले दिनों में इन इलाकों में बारिश की गतिविधियां बढ़ सकती हैं. Dolat Capital की रिपोर्ट के अनुसार, मॉनसून की वापसी शुरू होने के साथ अब देश के पूर्वी और मध्य हिस्सों में सीजन की आखिरी बारिश देखने को मिल सकती है. बंगाल की खाड़ी में बना कम दबाव का क्षेत्र आगे बढ़ रहा है और इसके मजबूत होने की संभावना है. इससे पूर्वी और मध्य भारत में बारिश का दौर जारी रह सकता है. भारत मौसम विज्ञान विभाग यानी IMD के मुताबिक भी मॉनसून की वापसी उत्तर-पश्चिम भारत के कुछ हिस्सों से शुरू हो चुकी है. हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि देश के दूसरे हिस्सों में तुरंत बारिश पूरी तरह खत्म हो जाएगी.
रिपोर्ट के मुताबिक, इस सप्ताह देश में कुल मॉनसूनी बारिश की कमी करीब 15 फीसदी पर बनी रही. इससे पहले लगातार बारिश की कमी बढ़ रही थी, लेकिन इस सप्ताह कई क्षेत्रों में बारिश होने से स्थिति में कुछ सुधार हुआ. पूर्वी और उत्तर-पूर्वी भारत में बारिश की कमी 29 फीसदी से घटकर 27 फीसदी रह गई. दक्षिण प्रायद्वीपीय भारत में भी बारिश की कमी 28 फीसदी से घटकर 26 फीसदी हो गई. वहीं, मध्य भारत में बारिश की कमी करीब 6 फीसदी पर बनी रही. उत्तर-पश्चिम भारत में स्थिति थोड़ी कमजोर हुई और बारिश की कमी 9 फीसदी से बढ़कर 10 फीसदी हो गई.
रिपोर्ट में बंगाल की खाड़ी में बने कम दबाव के क्षेत्र को भी महत्वपूर्ण बताया गया है. यह सिस्टम पूर्वी तट की ओर बढ़ रहा है और इसके और मजबूत होने की संभावना जताई गई है. इससे पूर्वी और मध्य भारत में आने वाले दिनों में बारिश की गतिविधियां बनी रह सकती हैं. हालिया मौसम रिपोर्टों में भी बंगाल की खाड़ी की इस मौसम प्रणाली के कारण ओडिशा, पश्चिम बंगाल, झारखंड, छत्तीसगढ़ और आसपास के इलाकों में बारिश की संभावना बताई गई है.
बारिश के बीच खरीफ फसलों की बुवाई का काम भी आगे बढ़ा है. 18 सितंबर तक देश में कुल खरीफ फसलों की बुवाई 1,103.9 लाख हेक्टेयर तक पहुंच गई. पिछले साल इसी समय के मुकाबले बुवाई का अंतर भी थोड़ा कम हुआ है. इस सप्ताह यह कमी 15.1 लाख हेक्टेयर रह गई, जबकि इससे पहले यह 16 लाख हेक्टेयर थी. हालांकि, सभी फसलों की स्थिति एक जैसी नहीं है. कुछ फसलों की बुवाई में सुधार हुआ है, जबकि कुछ फसलों का रकबा अभी भी पिछले साल से पीछे चल रहा है.
इस सीजन में तिलहन की बुवाई में अच्छी प्रगति हुई है. रिपोर्ट के अनुसार, तिलहन का रकबा पहली बार पिछले साल की समान अवधि के मुकाबले थोड़ा आगे निकल गया है. दलहन की बुवाई भी लगभग स्थिर बनी हुई है. किसानों के लिए यह स्थिति इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि खरीफ सीजन में तिलहन और दलहन दोनों प्रमुख फसलें हैं. बुवाई का रकबा बढ़ने से इन फसलों के उत्पादन पर भी असर पड़ सकता है.
धान की बुवाई में अभी भी कमी बनी हुई है. 18 सितंबर तक देश में धान की बुवाई 429.3 लाख हेक्टेयर हुई थी. पिछले साल इसी अवधि में यह रकबा 445.9 लाख हेक्टेयर था. यानी इस साल धान की बुवाई करीब 16.6 लाख हेक्टेयर पीछे है. रिपोर्ट के अनुसार, धान के रकबे में कमी पिछले सप्ताह की तुलना में और बढ़ी है. ऐसे में देर से होने वाली बारिश धान की फसल के लिए महत्वपूर्ण हो सकती है, खासकर उन क्षेत्रों में जहां खेतों में अभी पर्याप्त नमी नहीं है.
कपास की बुवाई भी पिछले साल के मुकाबले पीछे चल रही है. इस साल 18 सितंबर तक करीब 109.6 लाख हेक्टेयर में कपास की बुवाई हुई है. पिछले साल इसी समय यह रकबा 110.6 लाख हेक्टेयर था. यानी करीब 1 लाख हेक्टेयर की कमी बनी हुई है. वहीं, गन्ने और जूट-मेस्टा की बुवाई के रकबे में खास बदलाव नहीं हुआ है.
रिपोर्ट के मुताबिक, मध्य और पश्चिम भारत के जलाशयों में पानी का स्तर 10 साल के औसत से ऊपर बना हुआ है. इससे इन क्षेत्रों में पानी की उपलब्धता को लेकर स्थिति कुछ बेहतर है. हालांकि, दक्षिण प्रायद्वीपीय भारत में बुवाई की रफ्तार और जलाशयों में पानी का स्तर दोनों ही अपेक्षाकृत पीछे हैं. ऐसे में इस क्षेत्र में बारिश की स्थिति पर नजर बनी हुई है.
मॉनसून के साथ-साथ अल नीनो को लेकर भी रिपोर्ट में महत्वपूर्ण बात कही गई है. Dolat Capital के अनुसार, अल नीनो की स्थिति काफी मजबूत हुई है और इसके 2027 तक बने रहने की संभावना है. रिपोर्ट ने इसे संभावित रूप से मजबूत अल नीनो घटनाओं में से एक बताया है. अल नीनो प्रशांत महासागर के समुद्री पानी के असामान्य रूप से गर्म होने से जुड़ी जलवायु स्थिति है, जिसका दुनिया के अलग-अलग हिस्सों के मौसम पर असर पड़ सकता है. भारत में भी यह मॉनसून के पैटर्न को प्रभावित कर सकता है, हालांकि किसी एक मौसम या क्षेत्र में इसका असर एक जैसा होना जरूरी नहीं है.
मॉनसून सीजन अब अपने अंतिम दौर में है. ऐसे में पूर्वी और मध्य भारत में होने वाली बारिश खेती के लिए महत्वपूर्ण हो सकती है. जहां कुछ इलाकों में बारिश की कमी बनी हुई है, वहीं अधिक बारिश वाले क्षेत्रों में फसल और खेतों में जलभराव का खतरा भी रह सकता है. कुल मिलाकर, खरीफ बुवाई आगे बढ़ रही है, लेकिन धान और कपास जैसी कुछ प्रमुख फसलें अभी भी पिछले साल के मुकाबले पीछे हैं. ऐसे में आने वाले दिनों की बारिश और मौसम की स्थिति किसानों के लिए काफी अहम रहने वाली है. (ANI)
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