अल नीनो पर बड़ा अपडेट (AI Image)देश पर अल नीनो का खतरा मंडरा रहा है. इससे कई राज्य प्रभावित होंगे. मैदानी राज्यों से लेकर पहाड़ी राज्यों तक. इसी में जम्मू कश्मीर भी है जहां बड़ी संख्या में सैलानी पर्यटन के लिए जाते हैं. लेकिन अल नीनो की वजह से घाटी का पर्यटन प्रभावित हो सकता है क्योंकि वहां भी तेज गर्मी महसूस की जाएगी. विशेषज्ञों का कहना है कि 2026 के मध्य तक आने वाला अल नीनो कश्मीर के मौसम पर असर डाल सकता है, जिससे सामान्य से कम बारिश होगी, तापमान बढ़ेगा और पानी के स्रोतों पर अतिरिक्त दबाव पड़ेगा.
विश्व मौसम विज्ञान संगठन ने संकेत दिया है कि अल नीनो की स्थितियां भारत के बड़े हिस्सों में दक्षिण-पश्चिम मॉनसून को कमजोर कर सकती हैं.
श्रीनगर में मौसम विभाग के निदेशक मुख्तार अहमद ने कहा, "उम्मीद है कि अल नीनो 2026 के दक्षिण-पश्चिम मॉनसून के दौरान भारत के कई हिस्सों में सामान्य से कम बारिश लाएगा. इसका असर जम्मू और कश्मीर में भी महसूस किया जाएगा, हालांकि लद्दाख में इसका असर ज्यादा नहीं होगा."
अल नीनो में समुद्र की सतह का तापमान असामान्य रूप से गर्म हो जाता है, जबकि ला नीना में स्थितियां ठंडी होती हैं.
जम्मू में राष्ट्रीय जल विज्ञान संस्थान के जल विज्ञानी (हाइड्रोलॉजिस्ट) रियाज अहमद मीर ने कहा कि ऐसी स्थितियां आमतौर पर कश्मीर में मौसम को सामान्य से अधिक गर्म बना देती हैं.
मीर ने कहा, "इससे ऊंची जगहों पर बर्फ और ग्लेशियरों के पिघलने की गति तेज हो जाती है, जिससे मौसम की शुरुआत में नदियों में पानी का बहाव बढ़ जाता है और गर्मियों के बाद के दिनों में यह कम हो जाता है." उन्होंने आगे कहा, "इस बदलाव से पानी की कमी का संकट बढ़ता है और अचानक आने वाली बाढ़, बर्फ पर बारिश, ढलानों के अस्थिर होने और जंगल की आग जैसे जोखिम बढ़ जाते हैं. साथ ही, इससे खेती पर भी बुरा असर पड़ता है."
क्लाइमेट एक्सपर्ट सोनम लोटस ने कहा कि मौसम के कई मॉडल इस बात की ओर इशारा कर रहे हैं कि आने वाले मॉनसून के दौरान अल नीनो की स्थिति बन सकती है.
लोटस ने कहा, "ज्यादातर प्रमुख मौसम मॉडल, जिनमें ECMWF, NCEP और MMCFS (भारत) शामिल हैं, संकेत दे रहे हैं कि 2026 के मॉनसून के मौसम में एक मजबूत अल नीनो एक्टवि हो सकता है."
उन्होंने आगे कहा, "भारत मौसम विज्ञान विभाग ने अपने ताजा पूर्वानुमान में बारिश को सामान्य के लगभग 92 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया है. यह चिंता की बात है, क्योंकि अल नीनो का संबंध अक्सर कम बारिश और सामान्य से अधिक तापमान से होता है."
लोटस ने कहा कि जम्मू और कश्मीर की ज्योग्राफिकल बनावट के कारण यहां अल नीनो का प्रभाव अलग-अलग हो सकता है.
उन्होंने कहा, "जम्मू के मैदानी इलाकों में बारिश का लगभग 77 प्रतिशत हिस्सा मॉनसून के दौरान होता है, जबकि कश्मीर घाटी में आमतौर पर यह केवल लगभग 17 प्रतिशत ही होता है." लोटस ने आगे कहा, “मार्च और अप्रैल के दौरान लगभग सामान्य बारिश और बर्फबारी से ऊंचे इलाकों में बर्फ का अच्छा जमाव हुआ है, जो पानी की सप्लाई के लिए फायदेमंद है.”
उन्होंने कहा, “मई के मध्य से जून तक ज्यादा स्पष्ट अनुमान आने की संभावना है, क्योंकि अल नीनो और इंडियन ओशन डाइपोल (IOD) की स्थिति बदल रही है.”
लोटस ने आगे कहा, “हालांकि अभी घबराने की कोई तत्काल वजह नहीं है, लेकिन सूखे जैसी स्थितियों पर बारीकी से नजर रखना जरूरी है. अभी निश्चित रूप से इनका आकलन करना जल्दबाजी होगी.”
दुनिया भार में, यह घटना हर दो से सात साल में दोहराई जाती है और आमतौर पर नौ से 12 महीने तक चलती है, जिससे अक्सर दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया के कुछ हिस्सों में सूखा पड़ता है, जबकि अन्य जगहों पर बारिश बढ़ जाती है. भारत में, यह आमतौर पर कमजोर मॉनसून बारिश से जुड़ा होता है.
कश्मीर में इस सर्दियों में पहले ही लंबे समय तक सूखा रहा है.
नवंबर और फरवरी के बीच, इस क्षेत्र में सामान्य 320.1 mm के मुकाबले सिर्फ 106.7 mm बारिश दर्ज की गई, जो 67 प्रतिशत की कमी है, जिसे ‘बड़ी कमी’ की श्रेणी में रखा गया है.
फरवरी विशेष रूप से सूखा और गर्म रहा, जिसके बाद 10 मार्च के आसपास पश्चिमी विक्षोभों ने कुछ राहत दी.
बीच-बीच में बारिश के दौर के बावजूद, बारिश सामान्य से कम ही रही.
अधिकारी ने कहा, “मार्च में, केंद्र शासित प्रदेश में सामान्य 115.9 mm के मुकाबले 100.7 mm बारिश दर्ज की गई,” और कहा कि अप्रैल में भी बारिश में कमी रहने की उम्मीद है, हालांकि यह बहुत ज्यादा नहीं होगी.
अधिकारियों ने सर्दियों में बारिश की कमी का कारण अल नीनो से जुड़े समुद्र की सतह के बढ़ते तापमान को बताया, जिसने पूरा मौसम बदल दिया और पूरे हिमालयी क्षेत्र में बारिश और बर्फबारी कम कर दी.
मौसम विभाग के एक अधिकारी ने कहा, “घटती बारिश और कम होते पानी में कृषि, बागवानी और पनबिजली को प्रभावित कर सकते हैं, जबकि आगे चलकर भूजल का कम होना और ग्लेशियरों के लिए जोखिम पैदा हो सकते हैं.”
चूंकि जून के मध्य तक स्थितियों में बदलाव की उम्मीद है, इसलिए विशेषज्ञों ने कहा कि अधिकारियों को मौसम के पैटर्न पर बारीकी से नजर रखने और पूरी घाटी में पानी को स्रोतों पर पड़ने वाले दबाव के लिए तैयार रहने की जरूरत होगी.
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