सरकारी योजनाओं पर किसानों ने दी मिलीजुली प्रतिक्रियापंजाब में भूजल संरक्षण को लेकर सरकार और कृषि विभाग लगातार किसानों को धान की सीधी बिजाई (डीएसआर) अपनाने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं. इस योजना के तहत पंजाब सरकार किसानों को 1500 रुपये प्रति एकड़ की प्रोत्साहन राशि भी दे रही है. इसके साथ ही कृषि विभाग को अलग-अलग जिलों के लिए लक्ष्य निर्धारित किए गए हैं.
संगरूर जिले में इस साल धान की सीधी बिजाई का लक्ष्य 33 हजार एकड़ रखा गया है. लेकिन मौजूदा स्थिति को देखें तो संगरूर और मलेरकोटला जिलों को मिलाकर भी यह आंकड़ा अभी 5 हजार एकड़ तक नहीं पहुंच पाया है. हालांकि, कई किसान बिना सरकारी प्रोत्साहन के भी इस तकनीक को अपनाने की कोशिश कर रहे हैं.
गांव कांझला के किसान गुरजीत सिंह ने बताया कि उन्होंने कोरोना काल के दौरान भी धान की सीधी बिजाई की थी. अब कृषि मशीनों में तकनीकी सुधार आने के बाद उन्होंने दोबारा इस पद्धति को अपनाना शुरू किया है. उनका मानना है कि नई तकनीक के कारण सीधी बिजाई पहले की तुलना में अधिक आसान और प्रभावी हो गई है.
कृषि विशेषज्ञों के अनुसार धान की सीधी बिजाई से सिंचाई के लिए कम पानी की जरूरत पड़ती है, जिससे भूजल की बड़ी मात्रा में बचत होती है. इसके अलावा जमीन में पानी का प्राकृतिक रिचार्ज भी बेहतर होता है. यही कारण है कि सरकार इस तकनीक को बड़े स्तर पर बढ़ावा देने का प्रयास कर रही है.
यदि संगरूर की बात करें तो यह पंजाब का सबसे बड़ा धान उत्पादक क्षेत्र माना जाता है, लेकिन यहां सीधी बिजाई अपनाने वाले किसानों की संख्या अपेक्षाकृत कम है. इसके विपरीत फाजिल्का जिला इस तकनीक को अपनाने में राज्य का अग्रणी जिला बनकर उभरा है, जहां लगभग 80 हजार एकड़ क्षेत्र में किसान धान की सीधी बिजाई कर रहे हैं.
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किसानों को तकनीकी जानकारी, समय पर मशीनें और पर्याप्त बढ़ावा दिया जाए तो संगरूर जैसे बड़े धान उत्पादक जिलों में भी सीधी बिजाई का रकबा तेजी से बढ़ सकता है. इससे न केवल किसानों की सिंचाई लागत कम होगी बल्कि पंजाब के घटते भूजल स्तर को बचाने में भी मदद मिलेगी.
संगरूर के गांव कांझला के किसान हरप्रीत सिंह का कहना है कि केंद्र में बीजेपी सरकार के 12 वर्षों के कार्यकाल के दौरान किसानों को कुछ योजनाओं का लाभ जरूर मिला है, लेकिन खेती की बढ़ती लागत के मुकाबले यह लाभ काफी सीमित है. उन्होंने बताया कि पराली प्रबंधन के लिए केंद्र सरकार द्वारा कई योजनाएं चलाई गई हैं, जिनके तहत किसानों को कृषि यंत्रों पर सब्सिडी भी दी जाती है. खुद उन्होंने पिछले साल सब्सिडी पर पराली की गांठें बनाने वाला बेलर खरीदा था.
हालांकि, हरप्रीत सिंह का कहना है कि इन योजनाओं का लाभ हर किसान तक नहीं पहुंच पाता क्योंकि सब्सिडी पाने की प्रक्रिया काफी जटिल और कागजी कार्रवाई से भरपूर है. कई किसान जरूरी दस्तावेजों और प्रक्रियाओं को पूरा नहीं कर पाते, जिसके कारण वे योजनाओं से वंचित रह जाते हैं. उन्होंने कहा कि सब्सिडी योजनाओं के अलावा केंद्र सरकार से किसानों को कोई बड़ा आर्थिक लाभ नहीं मिला. पिछले कुछ वर्षों में डीजल, खाद और अन्य कृषि इनपुट की कीमतों में लगातार वृद्धि हुई है, जिससे खेती की लागत काफी बढ़ गई है. दूसरी ओर, न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) में होने वाली बढ़ोतरी किसानों के खर्चों के मुकाबले बहुत कम है.
किसानों का कहना है कि आज खेती से होने वाली आमदनी और खर्च के बीच का अंतर लगातार कम होता जा रहा है. बढ़ती महंगाई और उत्पादन लागत के कारण किसानों की आर्थिक स्थिति पर दबाव बढ़ रहा है. उन्होंने कहा कि किसान आंदोलन के दौरान भी किसानों ने लंबे समय तक दिल्ली की सीमाओं पर संघर्ष किया, लेकिन सरकार किसानों के लिए खेती का कोई व्यवहारिक और टिकाऊ वैकल्पिक मॉडल प्रस्तुत नहीं कर सकी.
हरप्रीत सिंह ने चिंता जताते हुए कहा कि यदि खेती की वर्तमान परिस्थितियां इसी तरह बनी रहीं तो आने वाले समय में युवा खेती से दूर हो जाएंगे और किसानों का अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है. उनका मानना है कि किसानों को केवल सब्सिडी नहीं, बल्कि खेती को लाभकारी बनाने वाली दीर्घकालिक नीतियों की जरूरत है.(कुलवीर सिंह का इनपुट)
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