तमिलनाडु बनाम केंद्र, MSP नीति पर सियासत तेज. (Photo: ITG)तमिलनाडु में गेहूं और धान पर बोनस को लेकर राज्य सरकार और केंद्र सरकार आमने-सामने आ गए हैं. यह विवाद तब शुरू हुआ जब तमिलनाडु के मुख्यमंत्री ने केंद्र सरकार के वित्त मंत्रालय की तरफ से जारी एक पत्र का जिक्र किया गया. इस पत्र में राज्यों को सलाह दी गई थी कि वो अपनी बोनस नीति को दालों, तिलहनों और मोटे अनाज को बढ़ावा देने के हिसाब से तय करें. यही बात अब राजनीतिक बहस का मुद्दा बन गई है- क्या यह सिर्फ सलाह है या राज्यों पर दबाव बनाने की कोशिश?
केंद्र सरकार का कहना है कि देश में खेती का संतुलन बिगड़ रहा है. खासकर उत्तर भारत और कई अन्य राज्यों में किसान ज्यादा गेहूं और धान की खेती कर रहे हैं. इसकी बड़ी वजह यह है कि इन फसलों पर MSP के साथ-साथ कई राज्यों में इसके अलावा भी बोनस दिया जाता है.
केंद्र के मुताबिक, इससे किसान दूसरी जरूरी फसलों- जैसे दालें, तिलहन और मोटे अनाज- की खेती से दूर हो जाते हैं. इसका असर देश की खाद्य सुरक्षा पर पड़ता है, क्योंकि इन फसलों की कमी होने पर भारत को आयात करना पड़ता है.
इसके अलावा, गेहूं और धान जैसी फसलें ज्यादा पानी और खाद मांगती हैं, जिससे पर्यावरण पर भी दबाव बढ़ता है. इसलिए केंद्र चाहता है कि खेती में विविधता आए और किसान अलग-अलग फसलें उगाएं.
दूसरी तरफ तमिलनाडु सरकार का कहना है को वो इस मुद्दे को किसानों के हित से जोड़कर देख रही है. राज्य का मानना है कि बोनस देना उसकी अपनी नीति का हिस्सा है और इससे किसानों को सीधा फायदा मिलता है.
राज्य सरकार का कहना है कि हर राज्य की खेती की परिस्थितियां अलग होती हैं-कहीं पानी ज्यादा है, कहीं कम, कहीं मिट्टी अलग है. ऐसे में एक जैसी नीति पूरे देश में लागू नहीं की जा सकती.
राज्य यह भी मानता है कि अगर बोनस कम किया गया या रोका गया, तो किसानों की आय पर असर पड़ेगा और वो आर्थिक रूप से कमजोर हो सकते हैं.
केंद्र सरकार ने साफ किया है कि यह पत्र सिर्फ एक सलाह था, कोई आदेश नहीं. लेकिन राजनीतिक तौर पर इसे अलग तरीके से देखा जा रहा है. विपक्षी दल और कुछ राज्य सरकारें इसे केंद्र द्वारा राज्यों के अधिकारों में दखल मान रहे हैं. उनका कहना है कि कृषि राज्य का विषय है और इसमें केंद्र को ज्यादा दखल नहीं देना चाहिए. वहीं केंद्र का तर्क है कि यह कदम देश के बड़े हित- खाद्य सुरक्षा, आत्मनिर्भरता और टिकाऊ खेती- को ध्यान में रखकर उठाया गया है. यहीं से यह मुद्दा सिर्फ कृषि नहीं, बल्कि केंद्र-राज्य संबंधों की राजनीति का हिस्सा बन गया है.
केंद्र सरकार किसानों की आय बढ़ाने के लिए प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि (PM-KISAN) योजना के तहत हर साल 6,000 रुपये की आर्थिक सहायता सीधे किसानों के खातों में भेजती है, जिससे देश के करोड़ों किसानों को नियमित वित्तीय सहारा मिलता है.
इसके साथ ही सरकार केवल नकद मदद तक सीमित नहीं है, बल्कि फसल विविधीकरण, बेहतर बीज, MSP नीति और प्रोसेसिंग इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने पर भी जोर दे रही है. सरकार का मानना है कि दालों, तिलहनों और मोटे अनाज की खेती बढ़ाने से किसानों की आय लंबे समय में अधिक स्थिर और सुरक्षित होगी. ऐसे में यह नीति सिर्फ तात्कालिक राहत नहीं, बल्कि किसानों के भविष्य को मजबूत करने की रणनीति के तौर पर देखी जा रही है.
राज्य सरकार का मानना है की इस पूरे विवाद का सीधा असर किसानों पर पड़ सकता है. अगर राज्य बोनस देना कम करते हैं, तो किसानों की आमदनी घट सकती है. अगर फसल बदलने का दबाव बढ़ता है, तो शुरुआत में किसानों को जोखिम उठाना पड़ेगा. लेकिन अगर सही तरीके से फसल विविधीकरण होता है, तो लंबे समय में किसानों को बेहतर दाम और स्थिर आय मिल सकती है.
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