मुद्दा खेती का, वार्ताकार मंत्री शहरी विकास का, किसानों को 'जख्म' देने वाले से कैसे जगी 'मरहम' की उम्मीद?

मुद्दा खेती का, वार्ताकार मंत्री शहरी विकास का, किसानों को 'जख्म' देने वाले से कैसे जगी 'मरहम' की उम्मीद?

जिन कृषि और अंतरराष्ट्रीय व्यापार नीतियों पर चर्चा के लिए कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान और वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल के साथ बातचीत होनी चाहिए थी, उसके लिए देश के शहरी विकास मंत्री को सामने किया गया है. मानो सरकार कृषि संकट की 'वोल्टेज' को बिना कृषि मंत्री के ही सीधे अपने मुख्य 'पावर ग्रिड' से नियंत्रित करना चाहती हो. द‍िलचस्प बात यह है क‍ि इसी मनोहर लाल खट्टर प्रशासन ने किसानों की 'किसान बचाओ पदयात्रा' और शांतिपूर्ण मार्च को बलपूर्वक रोकने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी. अब वही खट्टर क‍िसानों को मरहम लगाएंगे.

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मुद्दा खेती का, वार्ताकार मंत्री शहरी विकास का, किसानों को 'जख्म' देने वाले से कैसे जगी 'मरहम' की उम्मीद?आज किसानों की केंद्र सरकार के साथ बैठक (Shambhu Border File Photo)

राजनीति की बिसात पर गुरुवार शाम को गुरुग्राम में एक ऐसा अजूबा 'खेल' होने जा रहा है, जहां मोहरे किसी और खाने के हैं और चालें कोई और चल रहा है. संयुक्त क‍िसान मोर्चा (नॉन-पॉलिटिकल) के किसान नेता एमएसपी की कानूनी गारंटी और भारत-अमेरिका ट्रेड डील जैसे नीतिगत मुद्दों को लेकर केंद्रीय ऊर्जा और शहरी विकास मंत्री मनोहर लाल खट्टर के साथ बैठक करने जा रहे हैं. इस पूरे 'तमाशे' का सबसे बड़ा झोल यह है कि जिन मंत्रियों के जिम्मे देश की खेतीबाड़ी और व्यापारिक नीतियां हैं वो कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान और वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल, इस पूरी पंचायत से गायब हैं. यह कैसी चाल है कि बीमारी किसी और विभाग की है, इलाज का जिम्मा किसी और को दे द‍िया गया है. कहानी का एक मोड़ यह भी है कि किसान आज उसी चेहरे के सामने अपनी मांगें लेकर बातचीत करने जा रहे हैं, जिनके मुख्यमंत्री रहते हरियाणा की सड़कों पर अन्नदाताओं पर दमन का इतिहास लिखा गया था. 

बहरहाल, सरकार क‍िस मुद्दे पर क‍िस मंत्री से बातचीत करवाएगी यह उसका व‍िशेषााध‍िकार है. लेक‍िन, एक कड़वा सवाल क‍िसान नेताओं से है क‍ि आप अगर मनोहरलाल खट्टर से बातचीत कर सकते हैं तो फ‍िर भगवंत मान सरकार से क्यों परहेज है? यह वही मनोहर लाल खट्टर हैं जिनके शासनकाल में किसानों को दिल्ली जाने से रोकने के लिए नेशनल हाईवे पर गहरी खाइयां खोदी गईं, कटीले तारों की दीवारें खड़ी की गईं और बर्फीली ठंड में बुजुर्ग क‍िसानों पर पानी की बौंछारें की गईं. आंसू गैस के गोले दागे गए थे. आज सरकार ने उसी गैर-संबंधित मंत्री को संकटमोचक का मुखौटा पहनाकर वार्ता की मेज पर बैठा दिया है. 

किसान संगठनों का दोहरा मापदंड

इस पूरे घटनाक्रम ने किसान संगठनों के दोहरे मापदंड और अंतर्विरोधों को भी पूरी तरह बेनकाब कर दिया है. एक तरफ तो किसान नेता इस बात पर अड़े हैं कि वे पंजाब की भगवंत मान सरकार को बातचीत की चौखट पर भी नहीं चढ़ने देंगे और किसी भी त्रिपक्षीय वार्ता में उन्हें शामिल नहीं करेंगे, क्योंकि पंजाब पुलिस ने उनके तंबू उखाड़े थे और उनके मार्च को रोकने की कोशिश की थी. पंजाब पुलिस की इस कार्रवाई को किसान नेताओं ने 'विश्वासघात' का नाम देकर मान सरकार का बहिष्कार किया हुआ है। ऐसे में अब राजनीतिक विश्लेषक और आम किसान यह तीखा सवाल उठा रहे हैं कि जब पंजाब पुलिस की ज्यादती को 'दमन' मानकर राज्य सरकार से पूरी तरह दूरी बनाई जा सकती है तो मनोहरलाल खट्टर के बुलावे पर पलकें बिछाए दिल्ली जाने को कैसे तैयार हो गए? क्या पंजाब सरकार से दूरी सिर्फ राजनीतिक नाराजगी भुनाने का जरिया है और खट्टर से यह नजदीकी कोई गुप्त साठगांठ?

जिसके विरोध में खुदवा दिए थे हेलीपैड... 

यह वही खट्टर हैं जिनके अड़ियल रुख के खिलाफ जब गुस्सा फूटा था, तो आंदोलनकारी किसानों ने हर‍ियाणा के कैंमला और गोहाना में अपनी पूरी ताकत से उनके हेलीपैड तक को मिट्टी में मिला दिया था. किसानों ने अपने हाथों से जमीन खोद डाली थी, ताकि वो उनके गांवों की मिट्टी पर उतर न सके. यही वह दौर था जब हरियाणा के गांव-गांव के बाहर बकायदा बोर्ड टांग दिए गए थे कि "बीजेपी और जेजेपी के नेताओं का आना सख्त मना है." सवाल यह है क‍ि क्या समय के साथ आपके वो पुराने घाव भर गए हैं नेताजी? क्या करनाल के बस्तारा टोल प्लाजा पर सड़कों पर बहे उस बुजुर्ग किसान के खून के दाग और पुलिस की लाठियों के निशान आपके जेहन से मिट गए हैं?

शुभकरण की शहादत और 'टेबल टॉक' 

इस पूरे घटनाक्रम पर जब हमने संयुक्त किसान मोर्चा (नॉन-पॉलिटिकल) के युवा नेता अभिमन्यु कोहाड़ से बात की तो उन्होंने कहा क‍ि "हम मनोहर लाल खट्टर को एक व्यक्ति के रूप में नहीं, बल्कि केंद्र सरकार के आधिकारिक प्रतिनिधि के रूप में देख रहे हैं." कोहाड़ का कहना है कि जब सरकार लिखित न्योता दे रही हो तो लोकतांत्रिक आंदोलन में बातचीत का रास्ता नहीं ठुकराया जा सकता.

लेकिन, सवाल ये भी है कि उस मां को कैसे समझाओगे जिसके 21 साल के इकलौते बेटे शुभकरण सिंह की शहादत खट्टर के कार्यकाल में हुए क‍िसान आंदोलन के दौरान हुई थी. उन युवाओं के आंसुओं का क्या, जिनकी आंखों की रोशनी पेलेट गन के छर्रों ने हमेशा के लिए छीन ली? बहरहाल, खट्टर सरकार के कार्यकाल में क‍िसानों के साथ क्या-क्या हुआ उसे एक बार याद कर लीज‍िए.

  • नवंबर 2020 में पंजाब और हरियाणा के किसानों को दिल्ली जाने से रोकने के लिए खट्टर सरकार ने अंबाला (शंभू बॉर्डर) और जींद (खनौरी बॉर्डर) पर नेशनल हाईवे को कई फीट गहरा खुदवा दिया था.
  • हाईवे पर भारी-भरकम सीमेंट के बोल्डर, कटीली तारें और सड़कों पर नुकीली लोहे की कीलें ठोक दी गईं, ताकि किसानों के ट्रैक्टर आगे न बढ़ सकें.
  • नवंबर 2020 की कड़ाके की ठंड के बावजूद, शंभू बॉर्डर पर आगे बढ़ रहे बुजुर्ग और युवा किसानों पर हरियाणा पुलिस ने भारी वाटर कैनन (ठंडे पानी की बौछारें) चलाई थीं.
  • फरवरी 2024 में किसान आंदोलन पार्ट-2 के दौरान, भारत के इतिहास में पहली बार किसानों पर ड्रोन के जरिए आसमान से आंसू गैस के गोले गिराए गए.
  • अगस्त 2021 में करनाल के बस्तारा टोल प्लाजा पर मुख्यमंत्री खट्टर का विरोध कर रहे किसानों पर पुलिस ने बेरहमी से लाठियां बरसाईं, जिसमें दर्जनों किसान लहूलुहान हुए और एक किसान की मौत का दावा किया गया.
  • करनाल लाठीचार्ज के दौरान वहां के तत्कालीन ड्यूटी मजिस्ट्रेट (IAS आयुष सिन्हा) का एक वीडियो वायरल हुआ, जिसमें वे पुलिसकर्मियों को ऑन-कैमरा निर्देश दे रहे थे कि "जो भी किसान बैरिकेड पार करे, उसका सिर फोड़ देना."
  • आंदोलनकारी किसानों और उनके नेताओं पर हत्या के प्रयास, देशद्रोह और दंगे भड़काने जैसी गंभीर धाराओं में हजारों मुकदमे दर्ज किए गए.
  • फरवरी 2024 में शंभू और खनौरी बॉर्डर पर हरियाणा पुलिस ने पंजाब की सीमा के भीतर तक पेलेट गन और रबर बुलेट्स चलाईं, जिससे कई किसानों की आंखों की रोशनी चली गई.
  • खनौरी बॉर्डर पर हरियाणा पुलिस के साथ झड़प के दौरान गोली लगने से 21 वर्षीय युवा किसान शुभकरण सिंह की मौत हो गई, जिसे लेकर खट्टर सरकार पर चौतरफा आरोप लगे.
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