राजस्थान में नहर प्रोजेक्ट का विरोध (सांकेतिक तस्वीर)राजस्थान में ईसरदा से बंध बारेठा तक प्रस्तावित खुली नहर के लिए खेती की जमीन के अधिग्रहण को लेकर विरोध के स्वर उठने लगे हैं. किसान महापंचायत के राष्ट्रीय अध्यक्ष रामपाल जाट ने शुक्रवार को मुख्यमंत्री भजन लाल शर्मा को पत्र लिखकर प्रोजेक्ट को लेकर विरोध दर्ज कराया है. उन्होंने मांगे पूरी नहीं होने पर आंदोलन की चेतावनी भी दी है. रामपाल जाट ने सीएम से मांग की है कि वह खुली नहर का प्रोजेक्ट रद्द कर अंडरग्राउंड पाइपलाइन के प्रस्ताव को मंजूरी दें.
उन्होंने कहा कि खुली नहर 189 किलोमीटर लंबी और 150 मीटर चौड़ी है. इससे टोंक, सवाई माधोपुर, करौली, दौसा और भरतपुर जिलों की 13 तहसीलों के 100 गांव प्रभावित हो रहे हैं. संगठन का कहना है कि 11,404 बीघा कृषि भूमि के अधिग्रहण से हजारों परिवारों का रोजगार छिन जाएगा.
किसान संगठन का कहना है कि परिवारों को आवासीय मकान, बाड़ा, नोहरा, कुएं और ट्यूबवेल जैसी अचल संपत्तियों से वंचित होना पड़ेगा. उनकी जीवन भर की कमाई नष्ट हो जाएगी और शिक्षा, स्वास्थ्य-चिकित्सा, परिवहन, खेलकूद और सामुदायिक भवनों के बदले उन्हें मीठे सपने और आश्वासन ही मिलेंगे.
किसान महापंचायत ने कहा है कि कई गांव दो भागों में बंट जाएंगे. इससे गांव की पारिवारिकता और मेल-जोल की संस्कृति समाप्त हो जाएगी, खेत तक आना-जाना दुर्गम होगा और पशुओं के लिए रोज चारा-घास लाना असुरक्षित व संकटपूर्ण बन जाएगा.
राम जाट ने आरोप लगाया है कि भूमि अर्जन, पुनर्वासन एवं पुनर्व्यवस्थापन में उचित प्रतिकर और पारदर्शिता अधिकार अधिनियम 2013 के न्यूनतम भूमि अधिग्रहण के उलट अधिकतम भूमि अधिग्रहण की तैयारी की जा रही है.
इसीलिए भूमिगत पाइपलाइन से पानी ले जाने के स्थानीय सुझाव पर विचार नहीं हो रहा है. उन्होंने ज्ञापन में कहा कि नहर मार्ग के गांवों को पानी से वंचित रखा जाएगा. यह जनभावनाओं को कुचलने जैसा है और अलोकतांत्रिक व्यवहार है.
संगठन का आरोप है कि अधिनियम की पालना के बजाय रिक्त स्थानों की पूर्ति की तरह काम किया जा रहा है. टेंडर और कार्यादेश होने के बाद भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू करना इसकी पुष्टि करता है. ज्ञापन में कहा गया है कि कंपनियां पैसा कमाने में व्यस्त हैं और सरकार लोक प्रयोजन के नाम पर दिखावे की कार्रवाई में मस्त है.
संगठन ने सवाई माधोपुर जिले की बौली तहसील के कोडियाई और बरनाला तहसील के सुंदरी गांव की जनसभाओं में किसानों ने संकल्प लिया कि वे खुली नहर के लिए जमीन नहीं देंगे, चाहे इसके लिए उन्हें अपनी जान ही क्यों न देनी पड़े. संगठन का कहना है कि इस संबंध में बौली, बामनवास जैसे उपखंडों के अधिकारियों के जरिए मुख्यमंत्री कार्यालय को ज्ञापन भेजे जा चुके हैं.
किसान महापंचायत ने राज्य सरकार को को चेतावनी देते हुए कहा है कि अगर उनकी मांगें नहीं मानी गईं तो वे 4 अक्टूबर 2026 को चौथ का बरवाड़ा तहसील के गांव सारसोप में होने वाली किसान महापंचायत में आंदोलन शुरू करने की घोषणा करेंगे. जाट ने कहा कि 27 सितंबर 2026 की किसान महापंचायत में भी इसका जिक्र किया जा चुका है. उन्होंने कहा कि इससे पहले ठोस फैसला न होने पर आंदोलन की पूरी जिम्मेदारी सरकार की होगी.
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