मेहंदी की खेती (सांकेतिक तस्वीर)मेहंदी बेहद ही जरूरी चीज होती है. शादी ब्याह और त्योहार जैसे मौके पर महिलाएं इसे लगाना पसंद करती हैं. इसे सुहाग की निशानी कहा जाता है. यह भारत से निर्यात की जाने वाली एक महत्वपूर्ण रजक फसल है. इसकी खेती मुख्य तौर पर पत्तों के लिए की जाती है. मेहंदी में लासोन नामक रंगने वाला तत्व होता है. इसका उपयोग बालों और शरीर को रंगने के लिए किया जाता है. इसके फूल से निकाले गए तेल का उपयोग इत्र उद्योग में किया जाता है. देश में सबसे अधिक राजस्थान में मेहंदी की खेती की जाती है. यहां पर काफी पहले से 41450 हेक्टेयर क्षेत्र में मेहंदी की खेती की जाती है. इसका 95 प्रतिशत पाली में किया जाता है.
पाली जिले के सोजन, मारवाड़ जंक्शन और रायपुर तहसीलों में 90 प्रतिशत मेहंदी का उत्पादन किया जाता है. यही पर सबसे बेहतर क्वालिटी वाली सोजत मेहंदी का उत्पादन होता है. यह मेहंदी अपनी क्वालिटी के लिए पूरे विश्व में पहचान रखती है. पश्चिमी राजस्थान की गरम और सूखा जलवायु में वर्षा आधारित खरीफ फसलें जैसे बाजरा, ज्वार, तिल, मूंग और ग्वार की खेती मॉनसून की अनियमितता के कारण कभी भी असफल हो जाती है. पर ऐसे हालात में भी मेहंदी की खेती किसानों के लिए एक बेहतर आय देती है क्योंकि इसकी जड़ें गहरी होती हैं. इसलिए एक बार रोपाई करने के बाद 20-25 साल तक इससे पत्ते लिए जा सकते हैं.
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देश में सबसे अधिक मेहंदी की खेती राजस्थान में की जाती है. किसान यहां पर एक हेक्टेयर से मेहंदी की 600-1000 किलोग्राम तक सूखी पत्तियां हासिल कर सकते हैं. हालांकि उन्नत कृषि की विधियों को अपनाकर 1500-2000 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर तक का उत्पादन हासिल किया जा सकता है. इसकी खेती में प्रचलित विधियों को अपना कर कमाई भी बढ़ाई जा सकती है. इसकी खेती में शुद्ध लाभ 8000-10000 प्रति हेक्टेयर से बढ़ाकर 14000-18000 तक किया जा सकता है. बशर्ते इसके लिए किसानों को कृषि की उन्नत विधियों को अपनाना पड़ेगा. किसान इसकी खेती में खाद का प्रयोग नहीं करते हैं.
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यह न्यूनतम कृषि प्रबंधन की तकनीक को अपनाकर की जाने वाली वर्षा आधारित खेती है. यह एक कम आयु का झाड़ी वाला पौधा होता है, इसलिए किसानों को कमाई के लिए यह बेहतर विकल्प देती है. वैसे तो मेहंदी अलग-अलग तरह की जलवायु में उगाई जा सकती है. लेकिन इसका पौधा शुष्क और उष्णकटिबंधीय और सामान्य गर्म जलवायु में अच्छी वृद्धि करता है. इसकी खेती के लिए 400 एमएम बारिश की जरूरत होती है. साथ ही बारिश के मौसम में 30-40 डिग्री सेल्सियस तक के तापमान की जरूरत होती है. इसकी क्वालिटी वाली पत्तियों की पैदावार के लिए जलवायु का प्रमुख योगदान होता है. इसकी अच्छी पैदावार के लिए बारिश सही होनी चाहिए. राजस्थान इसकी खेती के लिए बेहतर माना जाता है.
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