आलू, टमाटर, प्याज के भाव में बड़ी गिरावटसब्जियों की बात हो तो तीन नाम सबसे पहले आते हैं-आलू, प्याज और टमाटर. इन्हें टॉप क्रॉप कहते हैं. टॉप क्रॉप मतलब TOP-टोमैटो, अनियन और पोटैटो. ये तीनों सब्जियां हर किसी के किचन में जरूर दिखेंगी. स्वाद के लिहाज से बात करें तो इनके बिना लज्जत बढ़ना मुश्किल है. लेकिन विडंबना देखिए कि लज्जत और जायका बढ़ाने वाले ही अपने अस्तित्व को लेकर जूझ रहे हैं. इस समय देश के कई हिस्सों में किसान आलू-प्याज महज 1 रुपये किलो के भाव पर बेचने को मजबूर हैं. टमाटर के दाम भी गिरकर महज 2 रुपये प्रति किलो रह गया है. जब कभी टमाटर, आलू और प्याज के दाम बढ़ते हैं उपभोक्ताओं के हित के नाम पर सरकार जैसे अपने सिर पर आसमान उठा लेती है, लेकिन आज जब इनकी खेती करने वाले किसानों पर कम दाम की मार पड़ी है तो पूरा सिस्टम मौन हो गया है.
किसान समझ नहीं पा रहा है कि इन उपजों को रखें या फेंकें क्योंकि फेंकने में भी ढुलाई का खर्च आएगा जिसे निकाल पाना मुश्किल है. बात सबसे पहले आलू की. उत्तर प्रदेश भारत का सबसे ज्यादा आलू पैदा करने वाला राज्य है, जो देश के कुल उत्पादन में काफी योगदान देता है. इसके बाद पश्चिम बंगाल और बिहार का नंबर आता है. ये तीनों राज्य उत्पादन में सबसे आगे हैं, जबकि गुजरात और पंजाब भी अहम योगदान देते हैं और प्रोसेसिंग के लिए इस्तेमाल होने वाली किस्मों के लिए जाने जाते हैं. आलू पैदा करने वाले दूसरे बड़े राज्यों में मध्य प्रदेश, असम, हरियाणा और हिमाचल प्रदेश शामिल हैं. इन सभी राज्यों में आलू के भाव का हाल बहुत बुरा है. यहां तक कि खेती की लागत भी नहीं निकल पा रही है.
बंगाल और पंजाब की बात करें तो खेतों में आलू की कीमत (फार्मगेट प्राइस) गिरकर 1 रुपया प्रति किलो तक आ गई है. इससे परेशान होकर पंजाब के कई हिस्सों में किसानों ने अपनी फसल को वापस खेतों में ही जोतना शुरू कर दिया है. बंपर फसल और न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) का अभाव ही इन कम कीमतों के पीछे के कारण बताए जा रहे हैं. बंगाल में भी यही हाल है जहां आलू खाने का अहम हिस्सा है.
राष्ट्रीय स्तर पर देखें तो जनवरी से अब तक आलू के भाव में 40%, प्याज 50% और टमाटर में 80% तक गिरावट दर्ज की गई है. इसकी सबसे बड़ी वजह मंडियों में अचानक बढ़ी आवक है. इन तीनों सब्जियों की आवक इतनी बढ़ गई कि मांग और आपूर्ति का पूरा समीकरण बिगड़ गया. इस बिगड़े समीकरण ने किसानों की हालत पतली कर दी. किसान अब पछता रहे हैं कि इससे अच्छा तो कोई और फसल की खेती कर ली होती.
भाव गिरने का ट्रेंड देखें तो सबसे पहले आलू, फिर टमाटर और अब प्याज, ने दाम में गिरावट का रिकॉर्ड बना दिया. अगर आलू 1 रुपया बिक रहा है तो टमाटर और प्याज भी इससे बहुत अच्छी हालत में नहीं हैं.
PIB के हवाले से जारी सरकार की एक रिपोर्ट बताती है, 2025 के आखिर और 2026 की शुरुआत में भारत में टमाटर की कीमतें 45–65% तक गिरीं. इसकी मुख्य वजह महाराष्ट्र, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में खरीफ की बंपर पैदावार के कारण बाजार में टमाटर की भारी आवक रही. थोक कीमतें गिरकर 1,000–2,000 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंच गईं, जिससे किसानों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ा. कुछ किसानों को तो 1–2 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से टमाटर बेचने पड़े. मांग में कमी और टमाटर के जल्दी खराब हो जाने की तासीर ने कीमतों में इस अचानक गिरावट को और बढ़ा दिया.
कारणों की बात करें तो टमाटर के प्रमुख उत्पादक राज्यों, विशेष रूप से महाराष्ट्र और कर्नाटक से मिली अनुमान से अधिक पैदावार ने मंडी और बाजारों को भर दिया. इसके अलावा, पर्याप्त कोल्ड स्टोरेज की कमी के कारण, एक ही समय पर भारी मात्रा में पैदावार के बाजार में आने से तुरंत ही बाजार में माल की भरमार हो गई. ईरान-इजरायल की लड़ाई ने एलपीजी की किल्लत खड़ी की जिससे होटल और रेस्टोरेंट के चूल्हे बंद हो गए. इससे होटल इंडस्ट्री से मांग कम बनी रही, और परिवहन में लगने वाले अधिक समय के कारण माल खराब हो गया, जिससे निर्यात के अवसर सीमित हो गए. इन सभी कारणों ने टमाटर को बैरंग बना दिया और यह उपज दाम के लिए तरस गई.
अब बात प्याज की जिसकी कीमतें हमेशा हेडलाइन बनती हैं. देश में जनवरी 2026 से प्याज की कीमतों में 50% तक की भारी गिरावट आई है. लासलगांव जैसे प्रमुख केंद्रों में थोक कीमतें गिरकर 10–11 रुपये/किलो पर आ गई हैं. इसकी मुख्य वजह है—बाजार में प्याज की बहुत अधिक आपूर्ति, फसल की कटाई के बाद भारी मात्रा में आवक और निर्यात की कमजोर मांग. महाराष्ट्र और अन्य क्षेत्रों में प्याज का भारी उत्पादन और नई फसल की भारी आवक ने बाजार को पूरी तरह से भर दिया है. पश्चिम एशिया में चल रहे युद्ध के कारण निर्यात की मांग में भारी रुकावट आई है, जिसके चलते घरेलू बाजार में प्याज की आपूर्ति जरूरत से अधिक हो गई है. इस गिरावट ने किसानों के लिए गंभीर संकट खड़ा कर दिया है. स्थिति ये है कि रेट उत्पादन लागत से भी नीचे गिर गए हैं.
1 अप्रैल 2026 की कीमतों की बात करें तो महाराष्ट्र की अलग-अलग मंडियों में काफी उतार-चढ़ाव देखने को मिला. कोल्हापुर मंडी में आवक 5880 क्विंटल रही, जहां न्यूनतम भाव 500 रुपये और अधिकतम 1400 रुपये प्रति क्विंटल दर्ज किया गया, जबकि मॉडल रेट 900 रुपये रहा. अकोला मंडी में 625 क्विंटल आवक के साथ भाव 400 से 1100 रुपये के बीच रहे और मॉडल कीमत 800 रुपये प्रति क्विंटल दर्ज की गई. छत्रपति संभाजीनगर मंडी में 4911 क्विंटल आवक रही, जहां न्यूनतम भाव 300 रुपये और अधिकतम 1100 रुपये रहा, जबकि मॉडल रेट 700 रुपये रहा.
मुंबई (ऑनियन एंड पोटैटो मार्केट) में 8738 क्विंटल आवक दर्ज हुई, जहां कीमतें 600 से 1200 रुपये के बीच रहीं और मॉडल रेट 900 रुपये रहा. वहीं खेड़-चाकण मंडी में 7000 क्विंटल आवक के साथ भाव 800 से 1400 रुपये के बीच रहे और मॉडल कीमत 1200 रुपये प्रति क्विंटल रही.
लासूर स्टेशन मंडी में 6090 क्विंटल आवक के साथ न्यूनतम भाव 225 रुपये और अधिकतम 1103 रुपये रहा, जबकि मॉडल रेट 700 रुपये दर्ज किया गया. सतारा मंडी में आवक 140 क्विंटल रही, जहां कीमतें 1000 से 1300 रुपये के बीच रहीं और मॉडल रेट 1100 रुपये रहा.
जुन्नार (नारायणगांव) मंडी में चिंचवड़ किस्म की आवक 52 क्विंटल रही, जहां भाव 250 से 1250 रुपये के बीच रहे और मॉडल कीमत 750 रुपये रही. कराड मंडी में हलवा किस्म की 198 क्विंटल आवक के साथ कीमतें 1000 से 1300 रुपये के बीच रहीं और मॉडल रेट 1300 रुपये दर्ज किया गया.
सोलापुर मंडी में सबसे अधिक 30543 क्विंटल आवक रही, जहां लाल किस्म के लिए न्यूनतम भाव 100 रुपये और अधिकतम 1400 रुपये रहा, जबकि मॉडल रेट 600 रुपये दर्ज किया गया. सोलापुर मंडी ने 1 रुपया किलो रेट का सबसे निचला रिकॉर्ड कायम किया है जिससे प्याज के भाव का हाल समझा जा सकता है. अमरावती (फल और सब्जी मंडी) में लाल किस्म की 408 क्विंटल आवक के साथ अधिकतम भाव 1700 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंच गया, जबकि न्यूनतम भाव 500 रुपये रहा.
ये सभी आंकड़े बताते हैं कि किसान और उपभोक्ता दोनों को आलू, प्याज और टमाटर की जरूरत है, लेकिन जब किसानों को कमाने का मौका आता है, तो कीमतें रुलाने वाले स्तर पर पहुंच जाती हैं. सवाल है कि भाव में गिरावट का यह ट्रेंड कब और कहां जाकर रुकेगा?
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