AIF से खेत–खलिहान तक क्रांति, 1 लाख करोड़ से अधिक का इंफ्रास्ट्रक्चर होगा तैयार

AIF से खेत–खलिहान तक क्रांति, 1 लाख करोड़ से अधिक का इंफ्रास्ट्रक्चर होगा तैयार

आज राज्यसभा में सांसदों के सवालों के जवाब देते हुए कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि सत्ता सुख नहीं, हमारे लिए किसानों की सेवा ही सर्वोपरि, AIF से खेत–खलिहान तक क्रांति, 1 लाख करोड़ रुपये से अधिक का इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार किया जाएगा.

Advertisement
AIF से खेत–खलिहान तक क्रांति, 1 लाख करोड़ से अधिक का इंफ्रास्ट्रक्चर होगा तैयारशिवराज सिंह चौहान

केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने आज राज्यसभा में सांसदों के सवालों के जवाब दिया.  उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार सत्ता सुख के लिए नहीं, बल्कि किसान, गांव और गरीब के सर्वांगीण विकास के लिए है. शिवराज सिंह ने जोर देकर कहा कि किसान केवल अन्नदाता नहीं, जीवन दाता है, भगवान तो नहीं, पर भगवान से कम भी नहीं, और इसी सोच के साथ AIF से लेकर MSP, दलहन आत्मनिर्भरता मिशन, पीएम-कुसुम, पराली प्रबंधन और फसल विविधीकरण जैसी नीतियां जमीन पर बदलाव ला रही हैं.

AIF से कोल्ड स्टोरेज और मशीनों का नेटवर्क

कृषि मंत्री शिवराज सिंह ने बताया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एग्रीकल्चर इंफ्रास्ट्रक्चर फंड (AIF) के तहत 1 लाख करोड़ से अधिक की संरचनाएं बनाने का ऐतिहासिक फैसला किया, ताकि किसानों के उत्पाद को सुरक्षित रखा जा सके. इस योजना के अंतर्गत 44,243 कस्टम हायरिंग सेंटर, 25,854 प्राइमरी प्रोसेसिंग सेंटर, 25,565 फार्म हार्वेस्ट ऑटोमेशन यूनिट, 17,779 वेयरहाउस, 4,201 सॉर्टिंग और ग्रेडिंग यूनिट, स्मार्ट और प्रिसिजन एग्रीकल्चर के लिए 3,549 इंफ्रास्ट्रक्चर और 2,827 कोल्ड स्टोरेज स्थापित किए जा चुके हैं.  

इन आधुनिक यूनिटों के कारण फसल, फल और सब्जियों के नुकसान में 5 से 15 फीसदी तक कमी आई है और किसान अब अपना उत्पाद सुरक्षित रखकर बेहतर दाम हासिल कर पा रहे हैं. AIF के तहत FPOs और PACS को भी वेयरहाउस, कोल्ड स्टोरेज और कस्टम हायरिंग सेंटर जैसी सुविधाएं विकसित करने का बड़ा अवसर दिया गया है, जिससे किसानों की आय बढ़ाने की सामूहिक कोशिश को मजबूती मिल रही है.

50 साल की उपेक्षा बनाम मोदी सरकार का फोकस

शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ता सत्ता के स्वर्ण सिंहासन पर आरूढ़ होकर सत्ता सुख के लिए नहीं, बल्कि राष्ट्रीय पुनर्निर्माण, किसानों के कल्याण, दरिद्र नारायण की सेवा और आत्मनिर्भर–विकसित भारत के निर्माण के लिए राजनीति करते हैं. उन्होंने किसान को जीवनदाता बताते हुए कहा कि वह भगवान से कम नहीं है, लेकिन 50 साल तक कांग्रेस की सरकारों ने उसकी मूल समस्याओं की ओर गंभीर ध्यान नहीं दिया, फल–सब्जियां और अनाज पैदा होते रहे पर उन्हें सुरक्षित रखने के लिए पर्याप्त व्यवस्था तक नहीं बनी. PM मोदी ने किसानों की इन समस्याओं को पहचाना और यही अंतर आज गांव–गांव दिख रहा है.

पंजाब से तमिलनाडु तक: भेदभाव नहीं

कृषि मंत्री ने स्पष्ट कहा कि हम सब भारत मां के लाल हैं, भेदभाव का सवाल ही नहीं उठता और पंजाब की महान जनता को प्रणाम करते हुए आश्वस्त किया कि मोदी सरकार पंजाब की प्रगति और विकास में कोई कोर–कसर नहीं छोड़ेगी. उन्होंने बताया कि पंजाब में AIF के तहत 32,014 आवेदन आए और प्रारंभिक लक्ष्य 7,425.98 करोड़ के मुकाबले 11,351.54 करोड़ रुपये की परियोजनाएं स्वीकृत की गईं, जिनसे बेहतर स्टोरेज, प्रोसेसिंग और मशीनीकरण से 5 से 15 फीसदी तक नुकसान में कमी आई और एक–एक परियोजना से 4 से 9 लोगों को प्रत्यक्ष रोजगार मिला, जिससे लाखों रोजगार पैदा हुए.

तमिलनाडु के संदर्भ में उन्होंने कहा कि ‘दलहन आत्मनिर्भरता मिशन’ समान रूप से पूरे देश में लागू है, अच्छे बीज, क्लस्टर आधारित उत्पादन, डेमोंस्ट्रेशन प्लॉट, प्रति हेक्टेयर 10,000 रुपये तक सहायता, खरीदी और दाल मिलों के लिए सहायता जैसे हर घटक तमिलनाडु में भी मिलेगा और राज्य सरकार के साथ मिलकर दाल उत्पादन बढ़ाने को लेकर केंद्र प्रतिबद्ध है.

MSP, दलहन मिशन से किसानों को लाभ

MSP के मुद्दे पर शिवराज सिंह चौहान ने विपक्ष पर सीधा हमला बोला और कहा कि जब उनकी सरकार थी, तब स्वामीनाथन आयोग की सिफारिश, उत्पादन लागत पर 50 फीसदी मुनाफा जोड़कर MSP को उन्होंने कोर्ट में हलफनामा देकर ठुकरा दिया. उन्होंने कहा कि मोदी सरकार ने 50 फीसदी लागत पर मुनाफा जोड़कर MSP घोषित करने का काम किया है और इस अंतर को किसानों ने जमीनी स्तर पर महसूस किया है.

दलहन खरीद के उदाहरण में उन्होंने बताया कि UPA सरकार के 10 साल में मात्र 6 लाख टन दलहन खरीदा गया, जबकि मोदी सरकार ने 1 करोड़ 92 लाख टन दलहन की खरीद की है, यानी नाम मात्र की खरीद से कई गुना अधिक खरीद कर दोगुने दाम किसानों तक पहुंचाए गए. उन्होंने घोषणा की कि तुअर, मसूर और उड़द की 100 फीसदी खरीदी सुनिश्चित की जाएगी, किसान जितना उत्पादन करेगा और बेचना चाहेगा, केंद्र सरकार पूरी मात्रा खरीदेगी. इसके लिए NAFED और NCCF को अधिकृत किया गया है, साथ ही राज्य सरकारें भी अपनी एजेंसियों के माध्यम से खरीदी कर सकती हैं, जबकि बाकी दलहनों की खरीद PM-AASHA के तहत होगी और समयबद्ध भुगतान के लिए डीबीटी के माध्यम से सिंगल क्लिक से पैसे सीधे किसानों के खाते में भेजने की व्यवस्था बनाई गई है.

दलहन आत्मनिर्भरता मिशन, ‘दलहन क्रांति’

केंद्रीय मंत्री ने बताया कि दलहन में भारत का क्षेत्रफल हिस्सा 38 फीसदी था, लेकिन उत्पादन 28 प्रतिशत ही, यानी कम उत्पादकता, पुराने बीज, कम बीज रिप्लेसमेंट और मौसम की मार की वजह से कई राज्यों में किसानों ने दलहन की खेती छोड़कर अन्य फसलें अपनानी शुरू कर दीं. 2016 तक भारत दालों का सबसे बड़ा आयातक था, लेकिन टेक्नोलॉजी, उन्नत किस्में, वैज्ञानिक शोध, किसानों को सुविधाएं और नीति समर्थन के जरिए ‘दलहन क्रांति’ का प्रारंभ हुआ, जिससे 2021-22 में 27.30 मिलियन टन का अब तक का सबसे अधिक उत्पादन दर्ज हुआ.

उन्होंने कहा कि ‘दलहन आत्मनिर्भरता मिशन’ के तहत अच्छी किस्मों के बीजों का विकास, बीज रिप्लेसमेंट दर बढ़ाना, किसानों को ट्रेनिंग, क्लस्टर अप्रोच, मुफ्त मिनी किट, प्रदर्शन प्लॉट, प्रति हेक्टेयर 10,000 रुपये तक सब्सिडी, पारदर्शी खरीद और प्रोसेसिंग के लिए दाल मिल खोलने पर 25 लाख रुपये तक सहायता जैसे प्रावधान किए गए हैं.  

मध्य प्रदेश की बात करते हुए उन्होंने कहा कि कांग्रेस सरकार के समय जहां केवल एक फसल होती थी. वहीं, अब तीन–तीन फसलें, जिनमें मूंग भी शामिल है, उग रही हैं और सिंचाई और नीतिगत समर्थन के कारण गर्मी के मौसम में 20 लाख टन तक मूंग उत्पादन हो रहा है, जिसके लिए पारदर्शी खरीदी और ‘भावांतर भुगतान’ जैसी योजनाएं लागू हैं. उनका विश्वास है कि इस मिशन के माध्यम से भारत 2030-31 तक दालों में पूरी तरह आत्मनिर्भर हो जाएगा.

पराली पर किसानों की बदनामी हो बंद

शिवराज सिंह चौहान ने साफ कहा कि दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण का कारण केवल पराली और किसान नहीं हैं, वैज्ञानिक रूप से सिद्ध हो चुका है कि शीतकाल में भी पराली का योगदान 5 फीसदी से अधिक नहीं, जबकि बड़ा हिस्सा औद्योगिक इकाइयों और वाहनों से निकलने वाले धुएं का है, ऐसे में हर बार केवल किसान को दोषी ठहराना न्यायसंगत नहीं है. उन्होंने माना कि पराली जलाने से मित्र कीट, न्यूट्रिएंट्स, ऑर्गेनिक कार्बन नष्ट होते हैं, मिट्टी की उर्वरता घटती है और प्रदूषण भी बढ़ता है, इसलिए सरकार ने Crop Residue Management (CRM) योजना के तहत किसानों को पराली प्रबंधन मशीनों पर 50 फीसदी सब्सिडी और FPO/संस्थाओं को कस्टम हायरिंग सेंटर खोलने पर 80 प्रतिशत सब्सिडी दी है.

उन्होंने बताया कि पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में अब तक 3.5 लाख से अधिक मशीनें वितरित की गई हैं, जिसमें पंजाब में 1,60,296, हरियाणा में 1,10,550 और उत्तर प्रदेश में 76,135 हैं. जिसके चलते पराली जलाने की घटनाएं लगातार घटी हैं और पंजाब में पिछली बार यह घटनाएं लगभग 5,000 तक सीमित रहीं. उत्तर प्रदेश में घटनाओं में 17 फीसदी कमी दर्ज की गई, भले ही एक बार भारी बारिश के बाद एक साथ कटाई और नमी के चलते कुछ किसानों ने पराली जलाई हो. वहीं, मेरठ, शामली, हापुड़, मुजफ्फरनगर, बुलंदशहर, गाजियाबाद, बागपत और गौतमबुद्ध नगर में 11 पैलेटिंग विनिर्माण संयंत्र और 32.63 हजार टन भंडारण क्षमता विकसित कर पराली को संसाधन में बदला जा रहा है.  

हरियाणा मॉडल की सराहना करते हुए उन्होंने बताया कि राज्य सरकार In-situ और Ex-situ प्रबंधन के लिए प्रति एकड़ 1,000 रुपये, ‘मेरा पानी–मेरी विरासत’ के तहत धान के स्थान पर अन्य फसलों के लिए प्रति एकड़ 7,000 रुपये, DSR के लिए प्रति एकड़ 4,000 रुपये, पराली न जलाने पर रेड ज़ोन पंचायतों को 1,00,000 रुपये, येलो जोन पंचायतों को 50,000 रुपये और गौशालाओं तक पराली पहुंचाने के लिए प्रति ट्रांसपोर्ट 500 रुपये (अधिकतम 15,000 रुपये) तक सहायता दे रही है.

उन्होंने धान की पराली को कीमती संसाधन बताते हुए कहा कि Ex-situ मैनेजमेंट के तहत क्लस्टर आधारित सप्लाई चेन, बंडलिंग और ट्रांसपोर्ट से इसे पैलेटिंग, थर्मल पावर प्लांट, बायोमास इंडस्ट्री, बायो-CNG और फ्यूल जैसी इंडस्ट्री के लिए फीडस्टॉक बनाया जा रहा है.

चावल–गेहूं में आत्मनिर्भर, अब लक्ष्य पानी की संतुलित सुरक्षा

शिवराज सिंह चौहान ने बताया कि सरकार का पहला लक्ष्य गेहूं और चावल में आत्मनिर्भरता था, जिसे हासिल कर आज भारत चावल और गेहूं दोनों का निर्यात कर रहा है और चावल के उत्पादन में 15 करोड़ टन के साथ चीन को पीछे छोड़कर विश्व में नंबर एक हो चुका है. उन्होंने माना कि चावल में पानी की खपत बहुत अधिक है, इसलिए कम समय और कम पानी वाली किस्मों का विकास और डायरेक्ट सीडेड राइस (DSR) को बढ़ावा दिया जा रहा है, जिसमें खेत में स्थायी रूप से पानी भरने की आवश्यकता नहीं रहती.

इसके समानांतर, पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में फसल विविधीकरण कार्यक्रम के तहत दलहन, तिलहन, मोटे और पोषक अनाज, मक्का, जौ, कपास और कृषि वानिकी जैसी वैकल्पिक फसलों को प्रोत्साहित किया जा रहा है और राज्य सरकारों के माध्यम से दलहन के लिए 9,000 रुपये प्रति हेक्टेयर, मक्का और जौ के लिए 7,500 रुपये, हाइब्रिड मक्का के लिए 11,500 रुपये और पोषक अनाजों के लिए 7,500 रुपये प्रति हेक्टेयर तक सहायता दी जा रही है.

उन्होंने कहा कि दलहन की सुनिश्चित खरीद, इंपोर्ट ड्यूटी के जरिए सस्ते आयात पर नियंत्रण और किसानों को उचित दाम दिलाने के लगातार प्रयासों के साथ–साथ AIF, पीएम-कुसुम और ग्रामीण विकास के मोर्चे पर चल रहे कदम मिलकर किसान को केवल अन्नदाता नहीं, बल्कि ऊर्जादाता और आत्मनिर्भर भारत के वास्तविक निर्माता के रूप में स्थापित कर रहे हैं. 

POST A COMMENT