कमाई का नया ज़रिया बना मक्का साइलेजहमारे देश की खेती-किसानी में पशुपालन का बहुत बड़ा रोलहै. जब कभी सूखा पड़ता है या बाढ़ की वजह से फसलें बर्बाद हो जाती हैं, तो यह पशुपालन ही है जो किसानों को तबाही से बचाता है. दूध और गोबर के ज़रिए किसानों की रोज़ाना की आमदनी बनी रहती है. आज बाज़ार में दूध और डेयरी प्रोडक्ट्स की मांग बहुत तेज़ी से बढ़ रही है. लेकिन इस तरक्की के बीच एक बहुत बड़ी मुश्किल खड़ी हो गई है वह है अच्छे चारे की भारी कमी. आंकड़ों के मुताबिक, देश में हरे चारे की करीब 32 फीसद और सूखे चारे की 23 फीसद किल्लत है. इस कमी की वजह से मवेशियों को पूरा पोषण नहीं मिल पाता, जिससे दूध का उत्पादन घट जाता है और किसानों का खर्च बढ़ जाता है .चारे की इस भारी किल्लत को हमेशा के लिए खत्म करने के लिए लुधियाना के 'भारतीय मक्का अनुसंधान संस्थान' (IIMR) ने एक ज़बरदस्त मुहिम शुरू की है.इस मुहिम के तहत 'मक्का साइलेज' को बड़े पैमाने पर बढ़ावा दिया जा रहा है। इस नई तकनीक को अपनाने से मक्का उगाने वाले किसानों की इनकम में भारी इज़ाफा हुआ है.वहीं दूसरी तरफ, जब यह पौष्टिक साइलेज दुधारू पशुओं को खिलाया गया,तो उनके दूध उत्पादन में भी ज़बरदस्त फायदा देखने को मिला। यही वजह है कि आज पंजाब पूरे देश में साइलेज उत्पादन का एक बहुत बड़ा हब बनकर उभरा है.
पंजाब और हरियाणा में धान की खेती के कारण ज़मीन का पानी तेज़ी से खत्म हो रहा है.इस संकट को दूर करने के लिए IIMR लुधियाना के कृषि वैज्ञानिक डॉ. प्रदीप कुमार का कहना है कि संस्थान ने खरीफ के मौसम में मक्के की खेती को बढ़ावा देकर एक तीर से दो निशाने साधे हैं—इससे पानी की बचत भी हो रही है और पशुओं के लिए बेहतरीन चारा भी मिल रहा है. साइलेज का सीधा सा मतलब है—हरे चारे को वैज्ञानिक तरीके से बिना हवा के सुरक्षित रखना, ठीक वैसे ही जैसे हम घरों में अचार रखते हैं. मक्के को इसके लिए सबसे बेस्ट फसल माना गया है क्योंकि इसके साइलेज में पौधे के साथ उसका पूरा भुट्टा भी पिसा होता है, जो मवेशियों को भरपूर ताकत देता है. इसमें मौजूद स्टार्च, प्रोटीन और फाइबर को पशु आसानी से पचा लेते हैं.जब भुट्टा दूधिया अवस्था में होता है, तब इसकी कटाई की जाती है. यह फसल खरीफ सीजन में 80 से 85 दिन और जायद में 100 से 105 दिन में तैयार हो जाती है, जबकि गड्ढे या बैग में पैक करने के बाद यह साइलेज सिर्फ 40 से 50 दिनों में बनकर तैयार हो जाता है. इसे कई महीनों तक बिना खराब हुए स्टोर किया जा सकता है, जो साल के उस दौर में भी पशुओं को हरा चारा देता है जब खेतों में कुछ उपलब्ध नहीं होता. छोटे-बड़े हर किसान की सहूलियत के लिए साइलेज बनाने के चार अलग-अलग तरीके—गड्ढा, ड्रम, बैग और बेल मॉडल तैयार किए गए हैं.
इस नई तकनीक को अपनाने से मक्का किसानो इनकम की बढ़ोतरी हुई है, और जब यह साइलेज पशुओं को खिलाया गया, तो दूध के उत्पादन में 10 फीसद से 20 फीसद तक का ज़बरदस्त फायदा देखा गया.डेयरी क्षेत्र में क्रांति लाने के साथ-साथ यह धंधा किसानों के लिए भी एक बेहतरीन और पक्का मुनाफे का सौदा साबित हो रहा है। साइलेज के लिए मक्के की खेती करने वाले किसानों को उनकी उपज के हिसाब से प्रति एकड़ 45,000 रुपये से लेकर 60,000 रुपये तक की शानदार कमाई हो जाती है। सबसे अच्छी बात यह है कि अगर इसमें से बीज, खाद, सिंचाई और मेहनत जैसी तमाम खर्चों को निकाल भी दिया जाए, तो भी किसानों को प्रति एकड़ 35,000 रुपये से 50,000 रुपये तक का नेट प्रॉफि आसानी से मिल जाता है. कम समय, कम पानी और कम खर्च में इतनी बड़ी बचत ने इसे किसानों के लिए वाकई डबल मुनाफे का सौदा बना दिया है.
ICAR-IIMR लुधियाना ने जमीन पर उतरकर एक ऐसा बेहतरीन सिस्टम तैयार किया है, जो पंजाब को मक्का साइलेज के बड़े कमर्शियल हब में बदल चुका है. संस्थान अब साइलेज के लिए विशेष हाइब्रिड किस्में तैयार कर रहा है.यहां के किसान अब सिर्फ अपने पशुओं के लिए साइलेज नहीं बना रहे, ल्कि इसे महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे बड़े डेयरी राज्यों में भी बेच रहे हैं प्रोग्रेसिव डेयरी फार्मर्स एसोसिएशन' (PDFA) के मुताबिक, साइलेज का यह बिजनेस ग्रामीण कमाई का बड़ा जरिया बन चुका है. हालात यह हैं कि किसान गेहूं की कटाई के ठीक बाद खाली समय में मक्के की खेती कर रहे हैं और यह पूरी फसल सिर्फ साइलेज बनाने के लिए इस्तेमाल हो रही है.यह पहल किसानों को कम समय में बंपर मुनाफा दे रही है.
विशेषज्ञों के मुताबिक, साइलेज कंपनियों के साथ पहले से एग्रीमेंट करना किसानों के लिए बहुत फायदेमंद है क्योंकि कंपनियां बुवाई के समय ही प्रति एकड़ दाम तय कर लेती हैं,जिससे फसल बेचने की टेंशन पूरी तरह खत्म हो जाती है. दूसरा बड़ा फायदा यह है कि दाने वाले सामान्य मक्के के मुकाबले साइलेज वाला मक्का एक महीना पहले कट जाता है और कंपनियां खुद अपनी मशीनों से कटाई करवाती हैं,जिससे किसानों का लेबर खर्च और समय बचता है. सबसे अच्छी बात यह है कि खेत जल्दी खाली होने से किसान बिना किसी देरी के समय पर गेहूं की बुवाई कर पाता है और मशीन द्वारा पूरे पौधे की कटाई होने के कारण खेत में पराली जैसी कोई झंझट भी नहीं बचती, जिससे पर्यावरण भी सुरक्षित रहता है.
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