Success farmer: अब गाय को नहीं होगा दर्द, न गिरेगा दूध, किसान ने देसी दिमाग से बना दी देशी मशीन, पशुपालकों की टेंशन दूर

Success farmer: अब गाय को नहीं होगा दर्द, न गिरेगा दूध, किसान ने देसी दिमाग से बना दी देशी मशीन, पशुपालकों की टेंशन दूर

अक्सर बाजार में मिलने वाली दूध निकालने वाली मशीनें विदेशी नस्ल की गायों के हिसाब से बनी होती हैं, जिनके कप देसी और छोटी गायों के थनों पर फिट नहीं बैठते. इससे न केवल दूध गिरता है बल्कि गायों को काफी दर्द भी होता है. इसी मजबूरी को खत्म करने के लिए असम के किसान मिलन ज्योति दास ने पशुपालकों की इस जमीनी समस्या को गहराई से समझा और इस बड़ी समस्या का समाधान कर दिया है. दास ने सस्ता और देसी जुगाड़ मशीन बना दी है. इससे दूध की बर्बादी रुक गई है, मजदूरों का खर्चा बचा है और सबसे बड़ी बात, अब देसी गायों को मिल्किंग के दौरान कोई तकलीफ नहीं होती है.

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अब गाय को नहीं होगा दर्द, न गिरेगा दूध, किसान ने देसी दिमाग से बना दी देशी मशीन, पशुपालकों की टेंशन दूरअब दूध निकालते समय गायों को दर्द नहीं होगा.

भारतीय खेती और पशुपालन की सबसे बड़ी खूबसूरती इसकी विविधता है. हमारे देश में हर कुछ किलोमीटर पर जलवायु बदल जाती है, और उसी के हिसाब से हमारे पशुओं की बनावट, उनका खान-पान और उनकी जरूरतें भी अलग होती हैं. लेकिन तकनीक के मामले में अक्सर हम एक ही सांचे को हर जगह फिट करने की कोशिश करते हैं, जो हमेशा सही नहीं होता. डेयरी सेक्टर में भी यही समस्या लंबे समय से बनी हुई थी. बाजार में उपलब्ध ज्यादातर आधुनिक मिल्किंग मशीनें विदेशी नस्लों जैसे होल्स्टीन फ्रीजियन एचएफ या जर्सी गायों के हिसाब से डिजाइन की गई हैं. इन विदेशी गायों के थन बड़े और मोटे होते हैं, जबकि हमारी अपनी देसी और स्वदेशी नस्लों के थन आकार में छोटे और नाजुक होते हैं. जब किसान मजबूरी में इन विदेशी मशीनों का इस्तेमाल देसी गायों पर करते हैं, तो वे सही से फिट नहीं बैठतीं. इससे न केवल दूध की बर्बादी होती है, बल्कि पशुओं को दर्द और बेचैनी भी झेलनी पड़ती है.

इनोवेटिव सोच वाले असम के कामरूप जिले के एक साधारण किसान मिलन ज्योति दास ने डेयरी क्षेत्र  इस जमीनी समस्या को गहराई से समझा. उन्होंने यह साबित कर दिया कि इनोवेसन केवल बड़ी प्रयोगशालाओं में ही नहीं, बल्कि खेतों और गोठों में भी जन्म ले सकता है. जब कोई किसान अपनी रोजमर्रा की मुश्किल का समाधान खुद ढूंढता है, तो वह केवल अपने लिए ही नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए एक नया रास्ता खोल देता है. मिलन ज्योति दास ने डेयरी क्षेत्र की एक बहुत बड़ी समस्या का समाधान ढूंढ निकाला है. 

छोटी गायों के लिए 'परफेक्ट फिट' डिजाइन

आमतौर पर बाजार में मिलने वाली दूध निकालने वाली मशीनें विदेशी नस्लों जैसे एचएफ या जर्सी के लिए बनी होती हैं, जिनके थन बड़े होते हैं. हमारे देश की देशी और छोटी नस्ल की गायों के थन छोटे और पतले होते हैं, जिसकी वजह से विदेशी मशीनें उन पर फिट नहीं बैठतीं. इससे न केवल दूध गिरता है, बल्कि गाय को दर्द और बेचैनी भी होती है. मिलन ज्योति ने इसी समस्या को समझा और देशी और लोकल गायों के लिए खास 'कस्टमाइज्ड टीट कप' तैयार किए. इस नई मशीन की सबसे बड़ी खासियत इसके 'टीट कप' यानि थन में लगने वाले कप का आकार है. मिलन ज्योति ने इसे स्वदेशी गायों की शारीरिक बनावट के हिसाब से डिजाइन किया है. इसके कप का घेरा 3 से 5 सेंटीमीटर और लंबाई 11 से 13 सेंटीमीटर रखी गई है. यह छोटा आकार छोटे थनों पर पूरी तरह फिट बैठता है, जिससे वैक्यूम का प्रेशर सही बना रहता है और दूध की एक बूंद भी बर्बाद नहीं होती. यह मशीन एक घंटे में आसानी से 8 से 10 गायों का दूध निकाल सकती है.

 देसी जुगाड़ से गायों को आराम और अधिक मुनाफा

यह मिल्किंग मशीन काफी हल्की और पोर्टेबल है, जिसे कहीं भी ले जाया जा सकता है. इसमें एक छोटा वैक्यूम पंप और 0.75 से 1 HP की मोटर लगी है, जो घर की सामान्य बिजली 220 बोल्टेज  पर चलती है. इसमें सिंगल या डबल बाल्टी का विकल्प भी मिलता है. मिलन ज्योति ने इसे इतना सरल बनाया है कि कोई भी किसान थोड़ी सी ट्रेनिंग के बाद इसे आसानी से चला सकता है. इससे मजदूरों पर निर्भरता कम होती है और समय की भारी बचत होती है. पुरानी मशीनों से होने वाले दर्द के कारण अक्सर स्वदेशी गायें दूध देना कम कर देती थीं या चिड़चिड़ी हो जाती थीं. लेकिन इस 'देशी टीट मिल्कर' से गाय को बिल्कुल भी तकलीफ नहीं होती. जब पशु आरामदायक महसूस करता है, तो दूध का उत्पादन भी बेहतर होता है. मात्र 3,000 रुपये की उत्पादन लागत वाली यह मशीन छोटे किसानों की जेब पर बोझ नहीं डालती और दूध की शुद्धता व स्वच्छता को भी बनाए रखती है.

महंगी मशीन की जगह देशी टीट मिल्कर'

अपने देश में मुख्यरूप से नार्थ इस्ट के असम की 'लखीमी' जैसी छोटी नस्ल की गायों के लिए यह तकनीक एक क्रांति से कम नहीं है. यह न केवल डेयरी क्षेत्र को बढ़ावा दे रही है, बल्कि प्राकृतिक खेती करने वाले उन किसानों के लिए भी मददगार है जो देशी नस्लों को पालना चाहते हैं. हालांकि इस तकनीक को और बेहतर बनाने के लिए अभी वैज्ञानिक जांच और सुधार की जरूरत है, लेकिन भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों और अन्य हिस्सों में, जहां छोटी नस्ल की गायें अधिक हैं, वहां यह मशीन गेम-चेंजर साबित हो सकती है.

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