लीची पैदावार पर संकटलीची के पेड़ मंजर से भर रहे हैं. अधिकांश पेड़ों पर मंजर आ गए हैं, जिनमें बाकी है उनमें आने का सिलसिला जारी है. बिहार की बात करें जहां मुजफ्फरपुर में सबसे अधिक लीची का उत्पादन होता है. यहां के लीची किसान खुश हैं, लेकिन एक छोटी चिंता भी है. दरअसल, लीची पर मंजर लग रहे हैं, लेकिन साथ में नए पत्ते भी आ रहे हैं. किसानों के लिए यह चिंता की बात है. ऐसा होना लीची उत्पादन के लिए अच्छा नहीं माना जाता.
मुजफ्फरपुर के अधिकांश इलाकों में यह घटना देखी जा रही है. पेड़ों पर मंजर के साथ नए पत्तों का आना जारी है. यह बसंत का महीना है और इसमें नए पत्ते आते हैं. लेकिन मंजर के साथ ऐसा कम ही देखने को मिलता है. जानकारों के मुताबिक, अगर मंजर के साथ नए पत्ते आने लगें तो मान कर चलें कि इस बार लीची उत्पादन में गिरावट आ सकती है. जानकार बताते हैं कि मंजर के साथ पत्तों के आने से पेड़ की ऊर्जा बंट जाती है. जो ऊर्जा मंजर और फल बनने पर लगनी चाहिए, उसका कुछ हिस्सा पत्ते मार जाते हैं. इससे उत्पादन प्रभावित होता है.
मुजफ्फरपुर लीची अनुसंधान केंद्र के निदेशक डॉ. विकास दास के मुताबिक, लीची के पेड़ों पर अक्तूबर तक नए पत्ते आ जाएं तो उत्पादन के लिहाज से इसे अच्छा माना जाता है. लेकिन पत्तों के निकलने का क्रम इसके बाद दिसंबर तक जारी रहे तो यह उत्पादन के लिए अच्छा नहीं है. लीची के लिए नवंबर मध्य से जनवरी मध्य तक का समय बहुत खास होता है जब मंजर निकलने और उसके बढ़ने का समय होता है. ऐसे समय में अगर पत्ते निकलें तो उत्पादन गिर सकता है.
यह वही अवधि है जब तापमान भी कम होता है. 12 डिग्री से लेकर 20 डिग्री तक तापमान सही माना जाता है. लेकिन इस बार जनवरी में ही तापमान में वृद्धि देखी जा रही है. साथ में मंजर के साथ पत्तों का विकास भी जारी है. ऐसे में लीची के उत्पादन को लेकर चिंता जाहिर सी बात है. पेड़ के पोषक तत्व मंजर और फल को मिलने चाहिए, लेकिन पत्ते भी उसे सोखने लगते हैं जिससे फल का साइज छोटा रह सकता है या कम पोषित रह सकता है. इससे उत्पादन घटने के साथ फल की क्वालिटी भी गिर सकती है.
फल की क्वालिटी गिरने के साथ ही पेड़ों पर फल की संख्या भी गिर सकती है. इसका सीधा नुकसान किसानों को झेलना होगा. एक रिपोर्ट के मुताबिक, इस बार मुजफ्फरपुर में लीची का उत्पादन 70 हजार से 1 लाख टन तक रह सकता है जो पिछले साल से कम होगा. इसका सीधा असर किसानों की कमाई पर होगा. जानकार इस घटनाक्रम के पीछे लगातार बढ़ती गर्मी और क्लाइमेट चेंज जैसे कारणों को मान रहे हैं.
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