सीआईआरजी में बकरी के बच्चों की मृत्यु दर को कंट्रोल करने के लिए लगातार काम चल रहा है. फोटो क्रेडिट-किसान तक बकरी के बच्चों को बीमारियों और संक्रमण से बचाने के लिए उनका प्रजनन तय होने लगा है. जैसे बच्चों को दिसम्बर-जनवरी वाली कड़ाके की सर्दी से बचाने के लिए बकरी पालक अब सितम्बर-अक्टूबर में ही बकरी से बच्चा लेने लगे हैं. आने वाला महीना सितम्बर का है. सितम्बर में भी हल्की-हल्की बारिश होती है. इसलिए जरूरी है कि बकरी के प्रजनन को लेकर अभी से तैयारियां कर ली जाएं. क्योंकि जैसे ही बकरी बच्चा देने वाली होती है तो हर बकरी पालक के एक जैसे ही सवाल होते हैं, जैसे बकरी दूध ज्यादा कैसे देगी.
बकरी जो दूध देगी वो क्वालिटी वाला कैसे बनेगा. वहीं बकरी पालक ये भी चाहते हैं कि बकरी का आने वाला बच्चा हेल्दी हो. इसके लिए जरूरी है कि खुली जगह हो या खेत. क्योंकि गोट फार्म में 100 बकरी पाली जाएं या 5 बकरियां, उन्हें चरने के लिए खुली जगह की जरूरत होती है. गर्भवती और दूध देने वाली बकरियों की अच्छी सेहत का राज भी यही होता है. बकरियों को तीन तरह से चराया जाता है. पहला चराकर, दूसरा खूंटे पर बांधकर और तीसरा चराने के साथ खूंटे पर बांधकर.
केन्द्रीय बकरी अनुसंधान संस्थान (सीआईआरजी), मथुरा के साइंटिस्ट के मुताबिक जब बकरी को गर्भवती कराना हो तो उसी के साथ बकरी की खुराक बढ़ा दें. हरा चारा और दाने की मात्रा बढ़ा दें. गर्भवती कराने से दो हफ्ते पहले ही बकरी की सामान्य खुराक 3 किलो दाना प्रतिमाह में 100 से 200 ग्राम दाना और बढ़ा दें. इतना ही नहीं जब बकरी बच्चा देने वाली हो तो उससे एक-दो हफ्ते पहले सामान्य खुराक में दाने की मात्रा 300 से 400 ग्राम तक बढ़ा दें. बकरी को उत्तम किस्म का हरा चारा भी खिलाएं.
दूध देने वाली बकरी को भी ज्यादा खुराक की जरूरत होती है. एक लीटर तक दूध देने वाली बकरी को हर रोज 300 ग्राम तक दाना खिलाना चाहिए. दाना दिन में कम से कम दो बार में दें. साथ ही दिनभर में हरा और सूखा चारा मिलाकर करीब 4 किलो वजन तक खाने को दें. सामान्य मौसम में 20 किलो वजन की बकरी को 700 एमएल तक पानी पिलाना चाहिए. वहीं गर्मी के मौसम में यह मात्रा डेढ़ गुनी कर देनी चाहिए.
गोट एक्सपर्ट की मानें तो 10 अप्रैल से लेकर और 15 जून तक ये वो वक्त है जब बकरियां प्राकृतिक रूप से हीट में आती हैं. ऐसे में पशुपालक अपनी बकरियों को सुबह-शाम चेक करते रहें. क्योंकि अप्रैल से लेकर जून तक जिन बकरियों को गाभिन कराया जाएगा उससे सितम्बर से बच्चा मिलना शुरू हो जाएगा. इससे होगा ये कि सितम्बर-अक्टूबर में बच्चा मिलने से एक तो बच्चा बारिश में होने वाली बीमारियों से बच जाएगा.
वहीं सितम्बर-अक्टूबर में बच्चा होने से दिसम्बर-जनवरी की कड़ाके की सर्दी तक बच्चा थोड़ा बड़ा हो जाता है. जिससे सर्दी में होने वालीं मौसमी बीमारियों से लड़ने के लिए तैयार हो जाता है. इसी तरह से अगर बकरी को अक्टूबर से नवंबर के बीच गाभिन कराएंगे तो वो मार्च-अप्रैल में बच्चा दे देगी. मार्च-अप्रैल में बच्चा मिलने से वो सर्दी से बच जाएगा.
साथ ही मई-जून की गर्मियों और आने वाले बारिश के महीने तक बीमारियों से लड़ने लायक तैयार हो जाएगा. गोट एक्सपर्ट का कहना है कि बकरियों को गाभिन कराए जाने वाले कैलेंडर का पालन करने से बकरियों के शेड में बच्चों की मृत्यु दर को जीरो किया जा सकता है.
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