दुनियाभर में कम होगा चावल का उत्पादनदेश में प्याज और चीनी के बाद अब चावल की कीमतों को लेकर भी चिंता बढ़ने लगी है. इस खरीफ सीजन धान की बुवाई में बड़ी गिरावट देखने को मिल रही है. केंद्रीय कृषि मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, 4 सितंबर तक खरीफ धान की बुवाई पिछले साल की समान अवधि के मुकाबले 16.37 लाख हेक्टेयर कम रही है. कर्नाटक, तेलंगाना, झारखंड और मध्य प्रदेश में इसका असर सबसे ज्यादा देखा गया है. इसकी सबसे बड़ी वजह अल नीनो के असर से मॉनसून के दौरान बारिश की कमी है.
IMD के मुताबिक, अगस्त 2026 में देश में सामान्य से 16.3 फीसदी कम बारिश दर्ज हुई, जबकि जून से अगस्त के बीच कुल बारिश में करीब 13.8 फीसदी की कमी रही. 31 अगस्त तक देश के करीब 47 फीसदी जिलों में बारिश सामान्य से कम रही. सितंबर में भी बारिश के सामान्य से कम रहने का अनुमान है, जिससे धान की उत्पादकता और क्वालिटी दोनों पर असर पड़ सकता है.
आधिकारिक आंकड़ाें के अनुसार, खरीफ धान की औसत पैदावार यानी 2,732 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर के हिसाब से 16.37 लाख हेक्टेयर रकबा कम होने से करीब 44.73 लाख टन धान का उत्पादन घट सकता है. मिलिंग के बाद यह आंकड़ा करीब 29.97 लाख टन चावल के बराबर बैठता है, क्योंकि धान से मिलिंग प्रक्रिया में करीब 67 प्रतिशत चावल निकलता है. वहीं, अगर उत्पादकता घटती है तो चावल उत्पादन में और कमी दर्ज की जा सकती है.
घरेलू संकट के बीच वैश्विक तस्वीर भी उलझी हुई है. 2026-27 में दुनियाभर में चावल उत्पादन 90 लाख टन घटकर 536.4 मिलियन टन रहने का अनुमान है. इंडियन राइस एक्सपोर्टर्स फेडरेशन (IREF) के मुताबिक, मजबूत अल नीनो, बढ़ती लागत और भू-राजनीतिक तनाव फसल को और प्रभावित कर सकते हैं. दूसरी ओर, वैश्विक आयात मांग 40 लाख टन बढ़कर 59.7 मिलियन टन होने का अनुमान है यानी मांग बढ़ रही है और सप्लाई घट रही है.
वहीं, घरेलू थोक कीमतों का हाल देखें तो एगमार्कनेट पोर्टल के आंकड़े बताते हैं कि अगस्त 2026 में ज्यादातर राज्यों में धान के थोक औसत भाव में अच्छी तेजी देखी गई थी. सितंबर में कीमतें थोड़ी नरम पड़ती दिख रही हैं. लेकिन भाव कब बढ़ जाएं कुछ कहा नहीं जा सकता.
इस बीच, सरकार का एक और फैसला भी चर्चा में बना हुआ है. वित्त वर्ष 2026-27 में FCI के गोदामों से 72 लाख टन चावल इथेनॉल बनाने के लिए दिया जाएगा. जुलाई 2026 तक करीब 23 लाख टन चावल डिस्टिलरीज को पहले ही बेचा जा चुका है. इसके अलावा करीब 55 लाख टन शत-प्रतिशत टूटे चावल को राइस मिलिंंग ट्रांसफोर्मेशन स्कीम के तहत ई-ऑक्शन के लिए अलग रखा गया है. बता दें कि पिछले वित्त वर्ष 2025-26 में केंद्र सरकार ने 52 लाख टन चावल इथेनॉल के लिए देने लक्ष्य तय किया था.
देश में जरूरत से ज्यादा चावल का भंडार होने से राहत की स्थिति बनी रहने वाली है. 1 जुलाई 2026 को भारत के सेंट्रल पूल में करीब 403.11 लाख टन चावल का स्टॉक मौजूद था. जुलाई से अक्टूबर के लिए तय बफर नॉर्म सिर्फ करीब 135.40 लाख टन है यानी मौजूदा स्टॉक नई फसल आने से पहले जरूरत के मुकाबले करीब 3 गुना ज्यादा है.
यही वजह है कि नई फसल और मौजूदा बफर स्टॉक फिलहाल घरेलू बाजार में चावल की कीमतों को कंट्रोल में रखने के लिए एक बड़ी सुरक्षा दीवार का काम कर सकते हैं. हालांकि, वैश्विक मांग और निर्यात बढ़ने पर घरेलू बाजार में भी चावल के भाव बढ़ने की आशंका बनी हुई है.
‘रायटर्स’ की एक रिपेार्ट के मुताबिक, पिछले हफ्ते ही भारतीय चावल के निर्यात भाव बढ़कर करीब एक साल के उच्च स्तर पर पहुंच गए थे. अंतरराष्ट्रीय बाजार में कमजोर मॉनसून और घटती सप्लाई से फसल को लेकर चिंता बढ़ी हुई है. रिपोर्ट के मुताबिक, मुंबई स्थित एक ग्लोबल ट्रेड हाउस के डीलर ने कहा कि दक्षिणी राज्यों में अब बारिश नहीं हुई तो फसल की उत्पादकता पर बड़ा असर पड़ सकता है. बीते हफ्ते भारत के 5% टूटे पारबॉयल्ड चावल का भाव 369-375 डॉलर प्रति टन पहुंच गया, जो इसके पिछले हफ्ते 366-371 डॉलर था. वहीं 5% टूटे सफेद चावल का भाव 364-369 डॉलर प्रति टन रहा. थाईलैंड और वियतनाम के चावल के भाव भी बढ़े हैं.
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