मक्के का दाम धड़ामदेश में इथेनॉल ब्लेंडिंग को सरकार लगातार बढ़ावा दे रही है. पेट्रोल में इथेनॉल की बढ़ती खपत के चलते मक्का अब केवल खाने और पशु आहार फसल नहीं रह गया है, बल्कि ऊर्जा क्षेत्र की एक महत्वपूर्ण फसल बन चुका है. इसके बावजूद मक्का किसानों की स्थिति में बेहतर सुधार दिखाई नहीं दे रहा. अगस्त 2026 के थोक मूल्य आंकड़े बताते हैं कि देश के अधिकांश राज्यों में मक्के के भाव अभी भी न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) से नीचे बने हुए हैं.
अगस्त 2026 के राज्यवार थोक मूल्य विश्लेषण के अनुसार मक्के का राष्ट्रीय औसत भाव 2,157 रुपये प्रति क्विंटल रहा. यह जुलाई के 2,115 रुपये प्रति क्विंटल की तुलना में कुछ बेहतर है, लेकिन किसानों की लागत और अपेक्षित लाभ को देखते हुए यह राहत नाकाफी मानी जा रही है. खास बात यह है कि देश में मक्का आधारित इथेनॉल की मांग लगातार बढ़ रही है और उद्योग को इससे अच्छा मुनाफा मिल रहा है.
कृषि बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि इथेनॉल उत्पादन के लिए मक्के की खपत बढ़ने से किसानों को बेहतर दाम मिलने चाहिए थे. लेकिन मौजूदा बाजार स्ट्रक्चर में इसका लाभ प्रोसेसिंग इंडस्ट्री और तेल कंपनियों तक सीमित दिखाई दे रहा है. किसानों का आरोप है कि जिस मक्के से तैयार इथेनॉल लगभग 70 रुपये प्रति लीटर के आसपास बिक रहा है, उसी मक्के का उत्पादक किसान अपनी उपज का उचित मूल्य हासिल नहीं कर पा रहा.
अगस्त के आंकड़ों पर नजर डालें तो कई राज्यों में कीमतों में तेजी जरूर देखने को मिली. दिल्ली में मक्का 31.9 प्रतिशत और हरियाणा में 30.6 प्रतिशत महंगा हुआ. पंजाब में 14.2 प्रतिशत, असम में 10 प्रतिशत और आंध्र प्रदेश में 6.3 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई. इसके बावजूद किसानों का कहना है कि बाजार में आई यह तेजी MSP आधारित लाभकारी मूल्य में तब्दील नहीं हो सकी है.
कीमतों के लिहाज से पश्चिम बंगाल 2,539 रुपये प्रति क्विंटल के साथ सबसे ऊपर रहा. इसके बाद तमिलनाडु (2,498 रुपये), कर्नाटक (2,485 रुपये) और आंध्र प्रदेश (2,443 रुपये प्रति क्विंटल) का स्थान रहा. वहीं उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, राजस्थान, ओडिशा और मध्य प्रदेश जैसे प्रमुख उत्पादक राज्यों में भाव अपेक्षाकृत दबाव में रहे.
दूसरी तरफ कुछ राज्यों में किसानों को भारी झटका भी लगा. उत्तराखंड में मक्के के भाव एक महीने में 33.5 प्रतिशत गिरकर 1,380 रुपये प्रति क्विंटल रह गए. तेलंगाना और गुजरात में भी कीमतों में गिरावट दर्ज की गई. ऐसे राज्यों में किसानों के लिए लागत निकालना भी चुनौती बनता जा रहा है.
मक्का उत्पादक किसान संगठनों का कहना है कि सरकार इथेनॉल ब्लेंडिंग प्रोग्राम को किसानों की आय बढ़ाने का माध्यम बताती है, लेकिन जमीनी स्तर पर उसका असर दिखाई नहीं देता. यदि मक्का आधारित इथेनॉल उद्योग तेजी से विस्तार कर रहा है, तो उसका लाभ किसानों तक सुनिश्चित करने के लिए खरीद व्यवस्था और मूल्य निर्धारण प्रणाली को भी मजबूत करना होगा.
विशेषज्ञों के मुताबिक वर्तमान स्थिति यह सवाल खड़ा करती है कि जब मक्का ऊर्जा क्षेत्र का रणनीतिक कच्चा माल बन चुका है और उसकी मांग लगातार बढ़ रही है, तब किसानों को MSP के बराबर या उससे अधिक कीमत क्यों नहीं मिल पा रही. बाजार में उपलब्ध मूल्य संकेत बताते हैं कि वैल्यू चेन के ऊपरी हिस्से में लाभ बढ़ रहा है, जबकि सबसे महत्वपूर्ण कड़ी यानी किसान अभी भी लाभकारी मूल्य से दूर है.
आने वाले महीनों में खरीफ मक्का की नई आवक बढ़ेगी. यदि सरकारी खरीद या उद्योग की सीधी भागीदारी नहीं बढ़ी तो बाजार पर और दबाव बन सकता है. ऐसे में किसानों की मांग है कि मक्का को केवल इथेनॉल उद्योग के कच्चे माल के रूप में नहीं बल्कि लाभकारी कृषि फसल के रूप में देखा जाए, ताकि बढ़ती मांग का सीधा फायदा खेत तक पहुंच सके.
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