Onion Price: चीनी तो महंगी हुई ही थी, अब क्यों बढ़े प्याज के दाम? जानिए इसकी असली वजह

Onion Price: चीनी तो महंगी हुई ही थी, अब क्यों बढ़े प्याज के दाम? जानिए इसकी असली वजह

जब प्याज 2 रुपये किलो बिका तब किसानों का कोई माई-बाप नहीं था, लेकिन अब जब चार पैसे कमाने की उम्मीद जागी है तो सरकार दाम गिराने के लिए बाजार में कूद पड़ी है. जब खुले मार्केट में प्याज का दाम 60 रुपये प्रति किलो तक पहुंच चुका है, तब सरकार बफर स्टॉक का प्याज सिर्फ 35 रुपये में बेचने की फुर्ती दिखा रही है. लेकिन सवाल यह उठता है कि ऐसी ही फुर्ती चीनी के लिए क्यों नहीं दिखा रही? क्या इसलिए क्योंकि देश की बहुत सारी चीनी मिलें रसूखदार नेताओं की हैं?

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Onion Price: चीनी तो महंगी हुई ही थी, अब क्यों बढ़े प्याज के दाम? जानिए इसकी असली वजहकांग्रेस नेता जयराम रमेश ने महंगाई पर केंद्र सरकार को घेरा (AI Image)

एक तरफ गन्ने का 'कैंसर' कहे जाने वाले लाल सड़न रोग ने मिठास के गढ़ पर हमला बोला, जिससे चीनी महंगी हो गई, तो दूसरी तरफ रबी सीजन की कटाई के वक्त हुई बेमौसम बारिश की नमी ने प्याज के प्राइस में आग लगा दी है. कुदरत की मार और इन दो अलग-अलग सड़न के कॉम्बिनेशन ने चीनी और प्याज की कीमतों को आसमान पर पहुंचा दिया है. यह दोनों राजनीतिक तौर पर बेहद संवेदनशील फसलें हैं. यह महज फसलों की बर्बादी नहीं, बल्कि खेत से लेकर देश की रसोई के बजट को हिला देने वाली एक कड़वी हकीकत है.

चीनी की महंगाई के बाद अब बाजार में प्याज अपना तेवर दिखा रहा है और इसका भाव 60 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गया है. लोग पूछ रहे हैं कि भाई अचानक ऐसा क्या हो गया? तो सीधा जवाब सुनिए, देश में प्याज की कोई किल्लत नहीं है, असली विलेन मार्च-अप्रैल की बेमौसम बारिश और गोदामों में लगी रिकॉर्ड सड़न है. इस साल देश में प्याज का उत्पादन 307.37 लाख टन हुआ है, जो हमारी जरूरत से ज्यादा है. लेकिन खेल तब बिगड़ा जब रबी यानी गर्मियों की मुख्य फसल की कटाई के वक्त अचानक मूसलाधार पानी बरस गया. खेतों में पानी भरने से प्याज की परतों के अंदर भारी नमी बैठ गई.

प्याज की बर्बादी

इसी छुपी हुई नमी के साथ जब प्याज को गोदामों में रखा गया, तो जून-जुलाई की उमस और भीषण गर्मी ने काम तमाम कर दिया. प्याज की परतों के बीच बंद पानी के कारण फंगस लग गई और वह अंदर ही अंदर गलने लगा. आम तौर पर हर साल 25% प्याज खराब होता है, लेकिन इस साल इस दोहरी मार के चलते रिकॉर्ड 35 से 40% प्याज गोदामों में ही सड़कर बर्बाद हो गया.  सड़न से खराब हुए प्याज की मात्रा यह करीब लगभग 110 से 120 लाख टन अनुमानित हैं. इसका सीधा असर यह हुआ कि घरेलू मांग के सामने मंडियों में बिकने के लिए अच्छा और साफ प्याज उम्मीद से बहुत कम बचा, जिसने सट्टेबाजों को बाजार में मनमानी करने का पूरा मौका दे दिया.

लागत का बिगड़ा समीकरण

हमारे देश में हर महीने लगभग 17 लाख मीट्रिक टन प्याज की घरेलू खपत होती है, जो सालाना करीब 204 लाख टन बैठती है. अब गणित सीधा है, 307 लाख टन के उत्पादन में से जब करीब सवा सौ लाख टन प्याज सड़ गया, तो बाजार में टेंशन बढ़ना लाजिमी था. इस भारी सड़न के कारण किसानों की लागत का पूरा समीकरण ही बदल गया है. असल में, जब गोदामों में रखा 35% से 40% प्याज सड़कर बाहर फेंकना पड़ा, तो बचे हुए महज 60% अच्छे प्याज पर ही पूरे खेत की बुआई, खाद, मजदूरी और कल्टीवेशन का 100 फीसदी खर्च आ गया. नुकसान की इसी मार के चलते मंडियों तक पहुंचने वाले अच्छे प्याज की वास्तविक नेट लागत खुद-ब-खुद बढ़कर 30 से 32 रुपये प्रति किलो बैठ गई है.

आंदोलन की चेतावनी

महाराष्ट्र प्याज उत्पादक संगठन के अध्यक्ष भारत दिघोले का कहना है कि कटाई के वक्त की बेमौसम बारिश और बड़े पैमाने पर हुई सड़न ने किसानों की जेब पर भारी बोझ डाला है. जब आधा माल गोदामों में ही गल गया, तो किसान की औसत उत्पादन लागत बहुत ज्यादा बढ़ गई. ऐसे में किसानों को जब तक कम से कम 40 रुपये किलो का थोक दाम नहीं मिलेगा, तब तक वे फायदे में नहीं आ सकते. दिघोले ने चेतावनी देते हुए यह भी कहा कि अगर सरकार ने बाजार में जबरन हस्तक्षेप करके प्याज के दाम गिराने की कोशिश की, तो महाराष्ट्र में बहुत बड़ा किसान आंदोलन खड़ा होगा. महाराष्ट्र देश का सबसे बड़ा प्याज उत्पादक राज्य है. कुल प्याज उत्पादन में इसकी हिस्सेदारी अकेले लगभग 43 फीसदी है.

कांदा एक्सप्रेस पर गुस्सा

प्याज का दाम गिराने के लिए केंद्र सरकार ने अपना बफर स्टॉक बाजार में उतारने का फैसला किया है. अब सरकार सीधे स्पेशल 'कांदा एक्सप्रेस' ट्रेनें चलाकर दिल्ली, चेन्नई, कोच्चि और गुवाहाटी जैसे बड़े शहरों की मंडियों में रोजाना हजारों टन प्याज उतार रही है. परिवहन और सड़न का पूरा घाटा खुद सहते हुए सरकार इस प्याज को आम जनता के लिए मात्र 35 रुपये प्रति किलो की रियायती दर पर बेच रही है, ताकि जमाखोरों का खेल खत्म हो और कीमतें तुरंत नीचे आएं.

किसानों की बढ़ी चिंता

लेकिन इस सरकारी फुर्ती ने किसानों के पुराने जख्मों को हरा कर दिया है. किसानों का दर्द है कि जब कुछ समय पहले उन्हें अपनी उपज की लागत तक नहीं मिल रही थी और वे मंडियों में 2 से 4 रुपये किलो प्याज बेचने को मजबूर थे, तब इस प्याज का कोई माई-बाप नहीं था. तब न तो किसी को किसान की बर्बादी दिखी और न ही किसी ने सुध ली. मगर अब, जब मौसम की मार झेलने के बाद किसानों को थोड़े बेहतर दाम मिलने की उम्मीद बंधी है, तो कीमतें गिराने के लिए सरकार बफर स्टॉक लेकर बाजार में कूद पड़ी है. किसानों को यही चिंता सता रही है कि सरकार के इस दखल से कहीं उनके लिए 'चार दिन की चांदनी, फिर अंधेरी रात' न हो जाए.

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