बंगाल में आलू किसानों पर छाए संकटअगर चिप्स बनाने वाले आलू की वैराइटी को छोड़ दें तो आलू के दाम 1.5 से 2 रुपये किलो पर आ गए हैं. कोल्ड स्टोरेज से तो आलू इसी भाव बिक रहा है. वो बात अलग है कि रिटेल बाजार में अभी भी आलू के दाम 20 रुपये किलो हैं. लेकिन आलू किसान को अभी भी आलू की लागत तक नहीं मिल पा रही है. आज भी यूपी के कोल्ड स्टोरेज में आलू के करीब 28 करोड़ पैकेट रखे होने का दावा किया जा रहा है. आलू को फेंकने तक की नौबत आ रही है.
ऐसे में फोडर एक्सपर्ट सलाह देते हैं कि आलू और पराली को मिलाकर उसका साइलेज तैयार किया जा सकता है. जब आलू के फेंकने की नौबत हो तो ऐसे वक्त में साइलेज की लागत भी ज्यादा नहीं आती है. वहीं दूसरी ओर पर्यावरण भी ठीक रहता है. क्योंकि न पराली जलेगी और न आलू फिकेगा तो प्रदूषण भी नहीं होगा. वहीं दूध देने वाले पशुओं को खुराक भी अच्छी मिल जाती है.
फोडर एक्सपर्ट की मानें तो पराली और आलू को बराबर मात्रा में लेकर साइलेज बैग में भर दें. इसके बाद बैग को 60 दिनों के लिए उठाकर रख दें. इसके बाद पराली और आलू में एन-एरोबिक कंडीशन के चलते फॉर्मेंटेशन होगा. जिसके बाद यह बकरी ही नहीं गाय-भैंस के लिए भी खाने लायक हो जाएगा. सबसे बड़ी बात यह है कि इसे बकरियों को खिलाने के लिए एक लम्बे वक्त तक चलाया जा सकता है. हमारे संस्थान में हुई रिसर्च के तहत इसे जब बकरियों को खिलाया गया तो सामने आया कि इस चारे को खाने के बाद बकरियों का वजन 40 ग्राम रोजाना के हिसाब से बढ़ता है. इसे साइलेज भी कहा जाता है.
फोडर एक्सपर्ट का कहना है कि 50 किलो साइलेज तैयार करने में ज्यादा से ज्यादा 450 रुपये से लेकर 500 रुपये तक का खर्च आता है. हालांकि बहुत सारी जगहों पर तो पराली किसान फ्री में भी दे देते हैं. जबकि साइलेज बनाने के लिए आलू हमे वो चाहिए जो बाजार में बिकने लायक नहीं होता है या फिर इस तरह का होता है कि एक से दो रुपये किलो तक भी आसानी से मिल जाता है.
अब तो शायद ही साल का कोई ऐसा महीना हो जब इस बात की गारंटी ली जा सके कि आलू फेंकना नहीं पड़ेगा. आगरा, अलीगढ़, हाथरस, फिरोजाबाद में कभी भी आलू को फेंकने की नौबत आ जाती है या फिर कौड़ियों के भाव बेचना पड़ता हो. बीते साल भी दो-ढाई महीने पहले आगरा का आलू एक से डेढ़ रुपये किलो तक बिका था. इतना ही नहीं अलीगढ़, हाथरस की आलू से भरी गाड़ियां कई दिन तक दिल्ली में आजादपुर मंडी के बाहर खरीदार के इंतजार में खड़ी रहीं थी. हाथरस की कुछ गाड़ियां को तो आलू फेंककर खाली हाथ लौटना पड़ा था.
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