चीनी के दाम में बढ़ोतरीमहाराष्ट्र के छत्रपति संभाजीनगर में खुली चीनी का खुदरा भाव बढ़कर 75-80 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गया है. एक सुपरमार्केट के मालिक ने यह दावा किया. एक्सपर्ट्स का कहना है कि चीनी की कीमतों में इस तेज उछाल के पीछे गन्ने की घटती पैदावार, चीनी उत्पादन में कमी और कारोबारियों की ओर से बड़े पैमाने पर स्टॉक जमा करना जैसे कई कारण हैं. विशेषज्ञों ने मौजूदा तेजी के लिए इथेनॉल उत्पादन के लिए चीनी के डायवर्जन को मुख्य वजह मानने से इनकार किया है. महाराष्ट्र के पूर्व चीनी आयुक्त शेखर गायकवाड़ के मुताबिक, देश में गन्ने की खेती का रकबा और प्रति इकाई उत्पादन दोनों प्रभावित हुए हैं. इसका सीधा असर चीनी के कुल उत्पादन पर पड़ रहा है. उन्होंने कहा कि देश में गन्ना उत्पादन करने वाले प्रमुख राज्यों की संख्या भी घट रही है. सरकार अगर उत्पादन बढ़ाने के लिए नई नीति लागू करती है, तो उसके असर को जमीन पर दिखने में करीब 30-36 महीने लग सकते हैं.
केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, 2022-23 में देश में गन्ने का रकबा 58.85 लाख हेक्टेयर से अधिक था. 2024-25 में यह घटकर करीब 54.50 लाख हेक्टेयर रह गया. इसी अवधि में गन्ने का उत्पादन भी 49.05 करोड़ टन से घटकर करीब 45.32 करोड़ टन रह गया.
नेशनल फेडरेशन ऑफ कोऑपरेटिव शुगर फैक्टरीज के पूर्व अध्यक्ष जयप्रकाश दांडेगांवकर ने कहा कि देश के सबसे बड़े चीनी उत्पादक राज्यों में शामिल महाराष्ट्र में भी गन्ने की पेराई का सीजन छोटा हुआ है. पहले कई चीनी मिलें करीब 150 दिन तक पेराई करती थीं, लेकिन अब यह अवधि घटकर लगभग 100 दिन रह गई है. बढ़ती लागत के कारण मिलों के लिए लंबे समय तक पेराई करना आर्थिक रूप से मुश्किल हो रहा है.
दांडेगांवकर ने कहा कि किसानों को गन्ने के लिए 3,650 रुपये प्रति टन का उचित और लाभकारी मूल्य यानी एफआरपी दिया जा रहा है, जबकि चीनी का मिनिमम सेलिंग प्राइस (एमएसपी) 3,100 रुपये प्रति क्विंटल है. किसानों को मिलने वाली कीमत और चीनी की कीमत के बीच का अंतर मिलों पर आर्थिक दबाव बढ़ा रहा है. इस अंतर को लेकर नीति स्तर पर समाधान की जरूरत है.
वेस्ट इंडियन शुगर मिल्स एसोसिएशन के अध्यक्ष भैरवनाथ थोम्बरे ने कहा कि मौजूदा चीनी महंगाई के लिए इथेनॉल उत्पादन को जिम्मेदार ठहराना सही नहीं है. 2020 में इथेनॉल का करीब 100 प्रतिशत उत्पादन चीनी के डायवर्जन से होता था, लेकिन अब यह हिस्सा घटकर लगभग 30 प्रतिशत रह गया है. इथेनॉल उत्पादन में अनाज की हिस्सेदारी बढ़ी है.
भैरवनाथ थोम्बरे के मुताबिक, सरकार ने शुरुआत में 390 लाख टन चीनी उत्पादन का अनुमान लगाया था, लेकिन वास्तविक उत्पादन करीब 310 लाख टन रहा. इसके बाद सरकार ने करीब 8 लाख टन चीनी के निर्यात की अनुमति दी. विशेषज्ञों के मुताबिक, उत्पादन अनुमान और वास्तविक उपलब्धता के बीच अंतर का असर घरेलू बाजार पर पड़ा.
भैरवनाथ थोम्बरे ने कहा कि कारोबारियों ने अल नीनो के कारण गन्ने और चीनी उत्पादन पर असर पड़ने की आशंका को देखते हुए बड़ी मात्रा में चीनी खरीदकर स्टॉक कर लिया. इससे बाजार में उपलब्ध चीनी पर दबाव बढ़ा और कीमतों में तेजी आई. सरकार ने अब चीनी की खरीद से जुड़े कुछ नियम लागू किए हैं.
नई पेराई शुरू होने के बाद चीनी मिलें हर महीने करीब 15-20 लाख टन चीनी बाजार में ला सकती हैं. इससे आने वाले समय में बाजार में सप्लाई बढ़ने और कीमतों पर दबाव कम होने की संभावना है.
कृषि मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, 2022-23 में भारत का गन्ना उत्पादन 49.05 करोड़ टन से ज्यादा था, जो 2024-25 में घटकर करीब 45.32 करोड़ टन रह गया. गन्ने के रकबे और उत्पादन में आए बदलाव को चीनी बाजार में मौजूदा दबाव की प्रमुख वजहों में गिना जा रहा है. (पीटीआई)
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