बासमती चावलभारत दुनिया का सबसे बड़ा चावल निर्यातक है और वैश्विक बाजार में इसकी भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है. वित्त वर्ष 2024–25 में भारत ने 20.1 मिलियन टन चावल निर्यात किया, जिसकी कीमत 12.95 बिलियन डॉलर से अधिक रही. लेकिन अब देश की निर्यात व्यवस्था एक नए दौर में प्रवेश कर रही है, क्योंकि सरकार घरेलू खाद्य सुरक्षा को मजबूत करने पर ध्यान दे रही है. यह बदलाव केवल भारत तक सीमित नहीं है. भारत की नीति में कोई भी परिवर्तन पूरे वैश्विक चावल बाजार को हिला सकता है.
केंद्र सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती है देश के लोगों के लिए पर्याप्त चावल उपलब्ध कराना. इसके पीछे कई कारण हैं, मौसम में अनियमितता, पैदावार में उतार–चढ़ाव, घरेलू खपत में बढ़ोतरी, महंगाई और बाजार में अनिश्चितता. अंग्रेजी अखबार 'बिजनेसलाइन' के एक लेख में DRRK फूड्स के जॉइंट मैनेजिंग डायरेक्टर लिखते हैं कि बीते कुछ वर्षों में अनियमित मानसून, हीटवेव और फसल खराब होने जैसी स्थितियों ने सरकार को अधिक सतर्क होने के लिए मजबूर किया है. भारत में राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (NFSA) के तहत करीब 80 करोड़ लोग सब्सिडी वाले अनाज पर निर्भर हैं. इतनी बड़ी आबादी के लिए अनाज उपलब्ध कराना आसान नहीं है, खासकर तब जब उत्पादन मौसम के अनुसार बदलता रहता है.
इसी कारण सरकार ने कई कदम उठाए हैं:
इन उपायों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि देश में चावल की पर्याप्त आपूर्ति बनी रहे.
इन कड़े नियमों की वजह से निर्यातकों को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है. नीतियों में बार-बार बदलाव से शिपमेंट की योजना प्रभावित होती है. “फ्री”, “रिस्ट्रिक्टेड”, और “प्रोहिबिटेड” श्रेणियों के बीच लगातार बदलाव, दस्तावेजों की जांच और मंजूरी में देरी के साथ ही कड़े MEP के कारण वैश्विक बाजार में कीमत प्रतिस्पर्धी बनाना मुश्किल हो जाता है. इसका छोटे और मध्यम निर्यातकों पर सबसे ज्यादा असर पड़ता है. कुल मिलाकर, निर्यातकों को हर महीने नहीं, बल्कि कई बार हर हफ्ते अपनी रणनीति बदलनी पड़ रही है.
भारत के कड़े नियमों का असर दुनिया के कई देशों पर पड़ा है, खासकर पश्चिमी अफ्रीका, मध्य पूर्व और दक्षिण-पूर्व एशिया में इसका असर हुआ है. इन देशों को भारत का चावल सबसे सस्ता और भरोसेमंद मिलता था, लेकिन प्रतिबंधों के बाद उन्होंने थाईलैंड, वियतनाम, पाकिस्तान और म्यांमार जैसे देशों से खरीद बढ़ा दी है. हालांकि ये विकल्प महंगे साबित हो रहे हैं.
अब ऐसे में भारत को अपनी घरेलू जरूरतें पूरी भी करनी हैं और वैश्विक बाजार में अपनी स्थिति भी बनाए रखनी है. यही कारण है कि नीतियों में बदलाव अक्सर उत्पादन अनुमान, महंगाई, सरकार के चावल भंडार और अंतरराष्ट्रीय कीमतों पर निर्भर करता है. यह स्थिति बताती है कि अगले कुछ सालों में भी चावल निर्यात से जुड़ी नीतियां स्थिर नहीं रहने वाली हैं.
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