कश्मीर में सेब बागानों में लैवेंडर की खेती और मधुमक्खी पालन होगा, किसानों की आय बढ़ाने के लिए नए मॉडल पर फोकस

कश्मीर में सेब बागानों में लैवेंडर की खेती और मधुमक्खी पालन होगा, किसानों की आय बढ़ाने के लिए नए मॉडल पर फोकस

कश्मीर के सेब किसानों के लिए आय बढ़ाने का नया मॉडल सामने आया है. वैज्ञानिकों ने सेब बागानों में लैवेंडर खेती और मधुमक्खी पालन को जोड़ने की सलाह दी है. इससे न सिर्फ अतिरिक्त कमाई के रास्ते खुल सकते हैं, बल्कि बागानों की उत्पादकता भी बढ़ सकती है.

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कश्मीर में सेब बागानों में लैवेंडर की खेती और मधुमक्खी पालन होगा, किसानों की आय बढ़ाने के लिए नए मॉडल पर फोकसबागवानों को मधुमक्‍खीपालन की जानकारी देते हुए एक्‍सपर्ट (फोटो-एएनआई)

कश्मीर घाटी के सेब उत्पादक किसानों को अब आय बढ़ाने के लिए फसल विविधीकरण की दिशा में नई पहल से जोड़ा जा रहा है. इसी क्रम में पुलवामा स्थित सीएसआईआर-इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ इंटीग्रेटिव मेडिसिन (CSIR-IIIM) ने एक विशेष कार्यशाला आयोजित कर सेब बागानों में लैवेंडर खेती और मधुमक्खी पालन को एक साथ जोड़ने का मॉडल किसानों के सामने रखा. इस पहल का उद्देश्य किसानों की आमदनी बढ़ाने के साथ-साथ खेती को पर्यावरण के अनुकूल और टिकाऊ बनाना है.

वर्कशॉप में 100 किसान शामिल हुए

पुलवामा के बोनेरा फील्ड स्टेशन पर आयोजित इस एक दिवसीय कार्यशाला में कश्मीर के अलग-अलग जिलों से करीब 100 सेब बागान मालिकों और किसानों ने भाग लिया. कार्यशाला में वैज्ञानिकों ने किसानों को बताया कि किस तरह से सेब के बागानों में मौजूद खाली जगह का बेहतर उपयोग कर अतिरिक्त आय के स्रोत तैयार किए जा सकते हैं.

उत्‍पादन लागत कम कर आय बढ़ाएगा मॉडल

सीएसआईआर के निदेशक डॉ. जबीर अहमद ने बताया कि वैज्ञानिकों ने एक ऐसा मॉडल विकसित किया है, जिसमें सेब के बागानों के साथ लैवेंडर की खेती और मधुमक्खी पालन को जोड़ा जाता है. इस मॉडल का उद्देश्य सेब उत्पादन की लागत को कम करना और किसानों को लैवेंडर आधारित उत्पादों और शहद उत्पादन से अतिरिक्त कमाई का अवसर देना है. उन्होंने कहा कि इस तरह का बहु-फसली मॉडल खेती को पर्यावरणीय रूप से भी अधिक टिकाऊ बनाता है.

सीएसआईआर-IIIM के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. शाहिद रसूल ने बताया कि संस्थान फूलों की खेती और मधुमक्खी पालन को एकीकृत करने के मिशन पर काम कर रहा है. इसी के तहत कश्मीर के सेब किसानों को इस मॉडल के बारे में जानकारी देने और उन्हें इसे अपनाने के लिए प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से यह कार्यशाला आयोजित की गई.

किसानों को दी गई ये जान‍कारियां

कार्यशाला के दौरान वैज्ञानिकों और तकनीकी विशेषज्ञों ने किसानों को लैवेंडर की वैज्ञानिक खेती, मधुमक्खी पालन प्रबंधन, कीट और रोग नियंत्रण तथा मूल्य संवर्धन से जुड़ी तकनीकों की जानकारी दी. इसके अलावा शहद निकालने और उसके प्रसंस्करण की आधुनिक तकनीकों का भी प्रदर्शन किया गया. किसानों को यह भी बताया गया कि लैवेंडर से आवश्यक तेल जैसे उत्पाद तैयार कर बाजार में अच्छी कीमत प्राप्त की जा सकती है.

किसानों ने वर्कशॉप को बताया फायदेमंद

किसानों ने इस पहल को काफी उपयोगी बताया. श्रीनगर के एक सेब उत्पादक किसान राजा मुजतबा ने कहा कि कार्यशाला से उन्हें लैवेंडर की खेती और उसके फायदों के बारे में काफी नई जानकारी मिली है, जिससे भविष्य में किसानों को लाभ मिल सकता है. वहीं, बाराग्राम के किसान मोहम्मद अशरफ डार ने बताया कि सेब के बागानों में पेड़ों के बीच काफी जगह खाली रहती है, जिसे अब लैवेंडर उगाकर उपयोग में लाया जा सकता है और इससे आय बढ़ाने में मदद मिलेगी.

विशेषज्ञों के अनुसार, सेब के बागानों में लैवेंडर की खेती से मधुमक्खियों के लिए पराग स्रोत बढ़ता है, जिससे परागण बेहतर होता है और फल उत्पादन में भी सुधार आता है. साथ ही शहद और लैवेंडर उत्पादों से किसानों को अतिरिक्त आय मिल सकती है. इस तरह का एकीकृत मॉडल किसानों को एक ही फसल पर निर्भर रहने के जोखिम से भी बचाता है और जलवायु परिवर्तन से जुड़ी चुनौतियों के बीच खेती को अधिक सुरक्षित बनाने में मदद करता है. (एएनआई)

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