MSP पर आखिर क्यों नहीं बिक पा रही फसलें?आर्थिक परेशानी के कारण किसानों की आत्महत्याओं में लगातार बढ़ोतरी हो रही है. इसी के चलते देश भर के किसान नेता फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर कानूनी गारंटी की जरूरत पर ना सिर्फ जोर देते हैं बल्कि लगातार आंदोलन भी करते हैं. हाल ही में सुप्रीम कोर्ट में भी किसानों ने दलील दी कि यह गलत धारणा है कि पंजाब और हरियाणा जैसे राज्यों में किसानों को फसलों का पूरा MSP मिल रहा है, जबकि असल में, क्वालिटी स्पेसिफिकेशन्स में गड़बड़ी या प्रति एकड़ कुल खरीद की लिमिट तय करने का हवाला देकर फसलों पर रेट में कटौती की जा रही है.
दरअसल, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, गुजरात, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और तमिलनाडु के किसान नेता सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त कमेटी के सदस्यों से मिलने पहुचे थे, जिसकी अध्यक्षता जस्टिस नवाब सिंह (रिटायर्ड) कर रहे हैं. इस कमेटी का गठन सितंबर 2024 में किसानों की शिकायतों को शांतिपूर्ण तरीके से सुलझाने के लिए किया गया था. गुजरात के कपास किसानों, राजस्थान के मूंगफली किसानों और पंजाब, हरियाणा, मध्य प्रदेश और तमिलनाडु के धान किसानों ने MSP से कम कीमत पर फसल बेचे जाने की शिकायतें कीं. वहीं जिन राज्यों में भावांतर योजनाएं (कीमत स्थिरीकरण फंड योजनाएं) लागू की गई हैं, वहां किसान नेताओं ने दुख जताया कि किसानों को दिया गया मुआवजा फसल के लिए तय MSP के बराबर नहीं था.
इस दौरान SKM (गैर-राजनीतिक) के संयोजक जगजीत सिंह डल्लेवाल, जिन्होंने MSP की मांग को लेकर हरियाणा के साथ पंजाब बॉर्डर पर एक साल तक आंदोलन किया था, उन्होंने कहा कि वे सभी फसलों के लिए MSP पर कानूनी गारंटी चाहते हैं क्योंकि "किसानों की आत्महत्याएं बढ़ रही हैं". उन्होंने कहा कि फसलों की गारंटीड कीमत न मिलने के कारण किसानों को 43 लाख करोड़ रुपये से ज़्यादा का नुकसान हुआ है. उन्होंने पूछा कि कुछ लोग कहते रहते हैं कि इसके लिए 20,000 करोड़ रुपये से लेकर 1.50 लाख करोड़ रुपये तक की ज़रूरत होगी और यह देश पर एक फाइनेंशियल बोझ होगा, लेकिन फिर कॉर्पोरेट घरानों को दिए गए हजारों करोड़ रुपये के लोन क्यों माफ किए जाते हैं? डल्लेवाल ने अमृतसर, गुरदासपुर और तरनतारन में धान को MSP से कम कीमत पर बेचे जाने के उदाहरण दिए.
वहीं हरियाणा के किसान नेता अभिमन्यु कोहाड़ ने कहा कि किसानों ने बाजरा MSP से 1,000 रुपये प्रति क्विंटल कम कीमत पर बेचा. लेकिन उन्हें जो प्राइस डिफरेंस दिया गया, वह सिर्फ 575 रुपये था. उन्होंने आगे कहा कि धान में ज्यादा नमी की मात्रा के झूठे दावों के कारण किसानों को 150 रुपये से 250 रुपये प्रति क्विंटल का नुकसान हुआ. मध्य प्रदेश के किसान नेता अनिल पटेल ने कहा कि उनके राज्य में 100 परसेंट धान MSP पर नहीं खरीदा गया.
उन्होंने कहा कि सरकार प्रति एकड़ के हिसाब से मात्रा तय करके हर किसान से कितना धान खरीदेगी, इसकी एक लिमिट है. मक्का भी MSP पर नहीं खरीदा गया, जिससे किसानों को करोड़ों रुपये का नुकसान हुआ. उत्तर प्रदेश के किसान नेता राजिंदर सिंह और अनिल तालान ने कहा कि सरकार सीधे व्यापारियों से खरीद रही है, किसानों से नहीं. उन्होंने कहा कि इसका नतीजा यह हुआ कि व्यापारियों को पूरा MSP मिला, लेकिन किसानों को MSP से बहुत कम मिला.
न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) क्या है?
MSP वह न्यूनतम दाम है, जिस पर सरकार किसानों से उनकी फसल खरीदने की गारंटी देती है, ताकि बाजार में दाम गिरने पर किसान को नुकसान न हो.
MSP का फायदा किसानों को कैसे मिलता है?
MSP किसानों को न्यूनतम आय की सुरक्षा देता है और मजबूरी में फसल औने-पौने दाम पर बेचने से बचाता है.
किसान MSP पर कानूनी गारंटी क्यों मांग रहे हैं?
MSP अभी कानून नहीं है, सिर्फ नीति है. किसान चाहते हैं कि कानून बने ताकि कोई व्यापारी MSP से कम दाम पर फसल न खरीदे.
क्या सभी फसलें MSP पर खरीदी जाती हैं?
नहीं. MSP घोषित तो कई फसलों पर होता है, लेकिन सरकारी खरीद मुख्य रूप से गेहूं और धान तक ही सीमित रहती है.
MSP को लेकर किसानों की मुख्य मांग क्या है?
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