गेहूं में माहों रोग से ऐसे करें बचावगेहूं की फसल अभी बढ़वार की स्थिति में है. पौधों में अच्छी वृद्धि देखी जा रही है, लेकिन किसानों को पाला, शीतलहर और रोगों से सावधान रहने की सलाह है. कोहरे से गेहूं को फायदा मिलता है, लेकिन किसानों को पाले से जरूर सावधान रहना चाहिए. इससे पौधे मुरझा सकते हैं और पूरी खेती चौपट हो सकती है. कई जगहों पर गेहूं में पहली सिंचाई की जा चुकी है और खाद का छिड़काव भी हो चुका है. खरपतवार का नियंत्रण भी जारी है. ऐसे में किसानों को किन जरूरी बातों का ध्यान रखना चाहिए, आइए जान लेते हैं.
गेहूं की खेती में उर्वरकों का प्रयोग बहुत जरूरी है. फॉस्फोरस और पोटाश खाद बुआई के समय डालनी चाहिए और नाइट्रोजन का प्रयोग पहली और दूसरी सिंचाई पर आधी-आधी मात्रा में करना चाहिए. प्रयोगों में यूरिया का सिंचाई से पहले प्रयोग लाभदायक माना गया है. इस प्रकार हम 5-10 प्रतिशत उपज वृद्धि पा सकते हैं. नाइट्रोजन उर्वरकों के प्रयोग के लिए ग्रीन सीकर का प्रयोग कर उर्वरकों के काम में सुधार किया जा सकता है और उर्वरक की मात्रा में भी 20-25 कि.ग्रा./हेक्टेयर की बचत की जा सकती है.
न्यूट्रीएंट एक्सपर्ट सॉफ्टवेयर के माध्यम से हर खेत के लिए खाद की मात्रा का निश्चित निर्धारण कर उर्वरक की मात्रा में बचत की जा सकती है. साथ ही फसल के लिए पोषण के अलग-अलग सोर्स का उपयोग कर आपूर्ति करना जरूरी है. इसमें गोबर की खाद, वर्मीकंपोस्ट, हरी और भूरी खाद के साथ केमिकल खादों का समझदारी के साथ इस्तेमाल करते हुए मिट्टी की सेहत में सुधार कर पैदावार में वृद्धि की जा सकती है.
खेत में अच्छी सड़ी हुई गोबर या कंपोस्ट खाद दो या तीन साल में 8 से 10 टन प्रति हेक्टेयर की दर से जरूर देनी चाहिए. इसके अलावा गेहूं की फसल को 100 किग्रा. नाइट्रोजन और 60 किग्रा. फास्फोरस प्रति हेक्टेयर की जरूरत होती है. नाइट्रोजन की आधी और फास्फोरस की समस्त मात्रा बुवाई के समय पंक्तियों में देनी चाहिए. उर्वरकों की यह मात्रा 130.50 किलो डी.ए.पी. और 58 किलो यूरिया के रूप में दी जा सकती है.
गेहूं की फसल में जस्ते (जिंक) की कमी भी महसूस की जा रही है. इसके लिए जिंक सल्फेट की 25 किलो मात्रा प्रति हेक्टेयर की दर से खेत में बुआई से पहले देनी चाहिए लेकिन इससे पहले मिट्टी की जांच जरूरी है.
सिंचाई के क्षेत्र में भी कई नए प्रयोग हुए हैं. फ्लड इरिगेशन की तुलना में फव्वारा विधि अधिक कारगर पाई गई है. रिसर्च से पता चला है कि फव्वारा विधि से सिंचाई के पानी की बचत तो होती ही है. साथ ही उत्पादन में भी वृद्धि होती है. भारत सरकार की ओर से चलाई जा रही प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना 'प्रति बूंद से अधिक उपज' की मदद से किसान अपने खेतों में फव्वारा विधि को अपना सकते हैं और इसमें सरकार काफी सब्सिडी भी दे रही है.
कम सिंचाई वाले क्षेत्रों में तो यह तकनीक एक वरदान है. जहां परंपरागत सिंचाई में पानी का उपयोग 30-40 प्रतिशत होता है, वहीं सूक्ष्म सिंचाई सिस्टम में यह 80-90 प्रतिशत तक है.
गेहूं की फसल में चौड़ी और नुकीली पत्ती वाले अनेक खरपतवार जैसे गोयला, चील, पीली सैंजी, प्याजी, गुल्ली डंडा, जंगली जई आदि नुकसान पहुंचाते हैं. फसल की बुआई के दो दिन बाद तक पेंडीमैथालीन (स्टोम्प) नामक खरपतवार नाशी की बाजार में उपलब्ध 3.30 लीटर मात्रा को 500 लीटर पानी में घोल बनाकर समान रूप से छिड़काव करना चाहिए.
इसके बाग फसल जब 30-35 दिन की हो जाए तो बाजार में उपलब्ध 2, 4-डी एस्टर साल्ट 72 ई सी की 1 लीटर मात्रा को 500 लीटर पानी में घोल बनाकर समान रूप से छिड़काव कर देना चाहिए. खेत में यदि गुल्ली डंडा, जंगली जई और फ्लेरिस माइनर की अधिक समस्या हो तो आइसाप्रोटूरोन की बाजार में उपलब्ध 2 किलो मात्रा को प्रति हेक्टेयर की दर से बुवाई के 25-30 दिन बाद छिड़काव कर देना चाहिए.
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