कमजोर मॉनसून और अल-नीनो से महंगाई बढ़ने की संभावना, दालों-तिलहनों पर सबसे ज्यादा असर का अनुमान: रिपोर्ट

कमजोर मॉनसून और अल-नीनो से महंगाई बढ़ने की संभावना, दालों-तिलहनों पर सबसे ज्यादा असर का अनुमान: रिपोर्ट

मॉनसून का संशोधित अनुमान घटने के बाद खेती और महंगाई को लेकर चिंता बढ़ गई है. रिपोर्ट के अनुसार कम बारिश और अल नीनो की आशंका से खरीफ सीजन प्रभावित हो सकता है. दाल, तिलहन और मोटे अनाज पर सबसे ज्यादा असर रहने का अनुमान है.

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कमजोर मॉनसून और अल-नीनो से महंगाई बढ़ने की संभावना, दालों-तिलहनों पर सबसे ज्यादा असर का अनुमान: रिपोर्टखरीफ फसलों और महंगाई बढ़ने का असर

देश में इस साल दक्षिण-पश्चिम मॉनसून को लेकर तस्वीर पहले के मुकाबले और कमजोर होती दिखाई दे रही है. भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) द्वारा मॉनसून का संशोधित अनुमान जारी किए जाने के बाद खेती, ग्रामीण मांग और खाद्य महंगाई को लेकर नई चिंताएं सामने आई हैं. आईसीआईसीआई बैंक रिसर्च की रिपोर्ट के मुताबिक, बारिश सामान्य से कम रहने की स्थिति में खरीफ सीजन की फसलों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ सकता है. साथ ही खाद्य महंगाई बढ़ने की भी आशंका है.

कम बारिश, लेट मॉनसून का दिख सकता है असर

रिपोर्ट के अनुसार, अब मॉनसून का अनुमान दीर्घकालिक औसत (LPA) के 90 प्रतिशत पर रखा गया है, जबकि इससे पहले यह 92 प्रतिशत अनुमानित था. जून से सितंबर के बीच सामान्य से कम बारिश की संभावना अधिक मानी जा रही है. साथ ही मॉनसून की शुरुआत में देरी और जून महीने में अधिकांश हिस्सों में कमजोर वर्षा का अनुमान शुरुआती बुवाई गतिविधियों को प्रभावित कर सकता है.

देश के बड़े कृषि क्षेत्र पर पड़ सकता है दबाव

रिपोर्ट में कहा गया है कि सबसे अधिक असर मॉनसून कोर जोन वाले राज्यों पर पड़ने की आशंका है. इनमें गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, ओडिशा, महाराष्ट्र और झारखंड जैसे बड़े कृषि राज्य शामिल हैं. देश के कुल खाद्य उत्पादन में इन क्षेत्रों की हिस्सेदारी महत्वपूर्ण मानी जाती है, ऐसे में यहां बारिश की कमी का असर व्यापक स्तर पर दिखाई दे सकता है.

अल नीनो की आहट से खरीफ उत्पादन पर जोखिम

रिपोर्ट के मुताबिक, लगातार गर्मी और समय पर पर्याप्त बारिश नहीं मिलने की स्थिति शुरुआती बुवाई को कमजोर कर सकती है. इसके साथ अगर अल नीनो की स्थिति बनती है तो खरीफ फसलों के उत्पादन पर अतिरिक्त दबाव बन सकता है. उत्तर-पश्चिम, मध्य और दक्षिण भारत में सामान्य से कम बारिश की संभावना जताई गई है, जबकि पूर्वोत्तर क्षेत्र में स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर रह सकती है.

कृषि क्षेत्र में सबसे अधिक जोखिम वर्षा आधारित फसलों पर माना गया है. रिपोर्ट के अनुसार दालें, मोटे अनाज, तिलहन और मसाला फसलें सिंचाई कवरेज कम होने के कारण बारिश पर अधिक निर्भर रहती हैं.  खासतौर पर दालों और मोटे अनाज के उत्पादन वाले क्षेत्र संभावित रूप से प्रभावित इलाकों में आते हैं. दूसरी ओर धान और गेहूं पर असर अपेक्षाकृत सीमित रहने की संभावना जताई गई है, क्योंकि इन फसलों को बेहतर सिंचाई सुविधा और जल भंडारण का सहारा मिलता है.

कुछ राहत देने वाले संकेत भी मौजूद

हालांकि, रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि स्थिति पूरी तरह नकारात्मक नहीं है. देश के जलाशयों में उपलब्ध पानी का स्तर दीर्घकालिक औसत से बेहतर बना हुआ है. इसके अलावा पिछले फसल वर्ष में खाद्यान्न उत्पादन में अच्छी बढ़ोतरी दर्ज की गई थी. चावल और गेहूं का पर्याप्त बफर स्टॉक भी उपलब्ध है, जिससे आपूर्ति पर अचानक दबाव आने की स्थिति को कुछ हद तक संभाला जा सकता है.

इसके बावजूद खाद्य महंगाई को लेकर चिंता बनी हुई है. विशेष रूप से दाल, खाद्य तेल और अन्य वर्षा आधारित कृषि उत्पादों की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है. रिपोर्ट के मुताबिक, आने वाले महीनों में मॉनसून का वास्तविक प्रदर्शन और अल नीनो की स्थिति यह तय करेगी कि कृषि उत्पादन, महंगाई और अर्थव्यवस्था की दिशा किस ओर जाती है. (एएनआई)

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